संस्कृत
भाषा में वाक्य-रचना का मूल आधार 'शब्द रूप' और
'धातु रूप' हैं।
व्याकरण के नियम 'अपदं न प्रयुञ्जीत' के अनुसार संस्कृत में बिना प्रत्यय लगाए किसी भी मूल शब्द
का वाक्य में प्रयोग नहीं किया जा सकता। किसी संज्ञा, सर्वनाम या विशेषण के मूल रूप को 'प्रातिपदिक' कहते हैं (जैसे— बालक, लता, फल, मुनि, अस्मद्
आदि)। जब इन प्रातिपदिक शब्दों में सातों विभक्तियों और तीनों वचनों के अनुसार
21
'सुप्' प्रत्यय (सु, औ, जस्, अम्, औट्, शस्, टा, भ्याम्, भिस्, ङे, भ्याम्, भ्यस्, ङसि, भ्याम्, भ्यस्, ङस्, ओस्, आम्, ङि, ओस्, सुप्) जोड़े जाते हैं, तब वे 'सुबन्त पद' (शब्द रूप) बनते हैं और वाक्य में प्रयोग के योग्य होते हैं।
1. आधारभूत संकल्पनाएँ: लिङ्ग, वचन और कारक-विभक्ति संबंध
संस्कृत
में तीन लिङ्ग होते हैं:
1. पुल्लिङ्ग: पुरुष जाति का बोध कराने वाले शब्द (जैसे— बालकः, मुनिः, साधुः, पिता)।
2. स्त्रीलिङ्ग: स्त्री जाति का बोध कराने वाले शब्द (जैसे— लता, मतिः, नदी, माता)।
3. नपुंसकलिङ्ग: जड़ पदार्थ या स्त्री-पुरुष से भिन्न जाति का बोध कराने
वाले शब्द (जैसे— फलम्, पुस्तकम्, वारि, मधु)।
संस्कृत
में तीन वचन होते हैं:
1. एकवचनम्: एक संख्या का बोध कराने के लिए (जैसे— बालकः = एक बालक)।
2. द्विवचनम्: दो संख्याओं का बोध कराने के लिए (जैसे— बालकौ = दो बालक)।
3. बहुवचनम्: दो से अधिक (तीन या अनेक) का बोध कराने के लिए (जैसे—
बालकाः = अनेक बालक)।
सातों
विभक्तियों और कारक चिह्नों की पहचान तालिका:
|
विभक्तिः |
कारकम् |
हिन्दी पहचान चिह्न (परसर्ग) |
वाक्य में प्रयोग का उदाहरण |
|
प्रथमा |
कर्ता कारक |
ने (या चिह्न रहित) |
बालकः पठति। (बालक पढ़ता है।) |
|
द्वितीया |
कर्म कारक |
को |
बालकः विद्यालयं गच्छति। (बालक विद्यालय को जाता है।) |
|
तृतीया |
करण कारक |
से, के द्वारा (साधन अर्थ में) |
सः कलमेन लिखति। (वह कलम से लिखता है।) |
|
चतुर्थी |
सम्प्रदान कारक |
के लिए, को (दान अर्थ में) |
गुरुः शिष्याय ज्ञानं यच्छति। (गुरु शिष्य के लिए ज्ञान देता है।) |
|
पञ्चमी |
अपादान कारक |
से (अलग होने/पृथक् होने के अर्थ में) |
वृक्षात् पत्रं पतति। (वृक्ष से पत्ता गिरता है।) |
|
षष्ठी |
सम्बन्ध (अकारक) |
का, के, की, रा, रे, री, ना, ने, नी |
अयम् रामस्य भ्राता अस्ति। (यह राम का भाई है।) |
|
सप्तमी |
अधिकरण कारक |
में, पर |
वने सिंहाः वसन्ति। (वन में शेर रहते हैं।) |
|
सम्बोधनम् |
सम्बोधन |
हे!, अरे!, भोः! (पुकारने के लिए) |
हे बालक! अत्र आगच्छ। (हे बालक! यहाँ आओ।) |
2. विशेष व्याकरणिक नियम एवं स्मरण-सूत्र (याद करने की सरल
विधियाँ)
(क) 'न' को 'ण' होने का नियम (णत्व विधानम्)
छात्रों
को अक्सर यह संदेह रहता है कि तृतीया एकवचन और षष्ठी बहुवचन में कब
'न' आता है (जैसे— बालकेन, बालकानाम्) और कब 'ण' हो जाता है (जैसे— रामेण, रामाणाम्)।
- नियम
(रषाभ्यां नो णः समानपदे): यदि किसी एक ही शब्द में
'र्',
'ष्',
या
'ऋ / ॠ'
वर्ण आए और उसके बाद अंत में 'न' (पूरा न, हलन्त 'न्' नहीं) आए, तो वह 'न' बदलकर 'ण'
हो जाता है।
- कब
नियम लागू रहता है (अट्कुप्वाङ्नुम्व्यवायेऽपि):
यदि 'र्/ष्/ऋ' और 'न' के बीच में कोई स्वर (अ, आ, इ, ई आदि), 'ह्', 'य्', 'व्', 'र्',
कवर्ग
(क, ख, ग, घ, ङ), या पवर्ग (प, फ, ब, भ, म) के वर्ण आ जाएँ, तब भी 'न' का 'ण' हो जाता है।
- उदाहरण
(जहाँ 'ण' होगा):
- राम:
र् + आ + म् + ए + न =
रामेण,
रामाणाम्
(बीच में 'आ', 'म', 'ए' हैं जो नियम के अनुकूल हैं)।
- पुष्प:
पुष्पेण,
पुष्पाणाम्
('ष्'
के कारण)।
- मित्र:
मित्रेण,
मित्राणाम्
('त्र'
में 'त् + र्' है)।
- पितृ
/ मातृ: पितॄणाम्, मातॄणाम् ('ॠ' के कारण)।
- हरि
/ गुरु: हरिणा, हरीणाम्, गुरुणा, गुरूणाम् ('र्' के कारण)।
- कब 'ण' नहीं होता (अपवाद):
यदि बीच में
चवर्ग
(च, छ, ज, झ, ञ), टवर्ग (ट, ठ, ड, ढ, ण), तवर्ग (त, थ, द, ध, न), या 'ल्', 'श्', 'स्'
आ जाएँ,
तो 'न' का 'ण' नहीं होता।
- जैसे—
अर्जुन
शब्द में 'र्' के बाद 'ज्' (चवर्ग) आ गया, इसलिए अर्जुनेन, अर्जुनानाम्
ही रहेगा।
- रचना
शब्द में 'र्' के बाद 'च्' आ गया, इसलिए रचनानाम् रहेगा।
- दर्शन्
/ प्रश्न में यदि 'न' शब्द के अंत में हलन्त (न्)
हो,
तो भी 'ण' नहीं होता, जैसे द्वितीया बहुवचन में—
रामान्,
मुनीन्,
साधून्।
(ख) सभी शब्द रूपों को याद करने के सार्वभौमिक स्मरण-सूत्र
1. द्विवचन का जादुई पैटर्न: लगभग सभी संज्ञा और सर्वनाम शब्दों के द्विवचन में केवल तीन
ही रूप याद करने होते हैं:
o प्रथमा और द्वितीया द्विवचन = समान (जैसे—
बालकौ-बालकौ, मुनी-मुनी, साधू-साधू, लते-लते)।
o तृतीया, चतुर्थी
और पञ्चमी द्विवचन = सदैव '-भ्याम्' जुड़ता है (बालकाभ्याम्, मुनिभ्याम्, लताभ्याम्)।
o षष्ठी और सप्तमी द्विवचन = सदैव '-योः' या '-ओः' जुड़ता है (बालकयोः, मुन्योः, पित्रोः, लतयोः)।
2. बहुवचन का जादुई पैटर्न:
o तृतीया बहुवचन = अकारान्त शब्दों में '-ऐः' (बालकैः, फलैः)
और शेष सभी शब्दों में '-भिः' जुड़ता है (मुनिभिः, साधुभिः, लताभिः, नदीभिः, मातृभिः)।
o चतुर्थी और पञ्चमी बहुवचन = सदैव '-भ्यः' जुड़ता है और दोनों समान होते हैं (बालकेभ्यः, मुनिभ्यः, लताभ्यः)।
o षष्ठी बहुवचन = अजन्त शब्दों में '-नाम् / -णाम्' (दीर्घ स्वर के साथ— बालकानाम्, मुनीनाम्, साधूनाम्, नदीनाम्) और हलन्त शब्दों में '-आम्' जुड़ता है (भवताम्, गच्छताम्, विदुषाम्)।
o सप्तमी बहुवचन = केवल आकारान्त शब्दों और 'अस्मद्/युष्मद्/राजन्/आत्मन्' में '-सु' (दन्त्य स) आता है (लतासु, अस्मासु, राजसु); अन्य सभी स्वरों (ए, इ, उ, ऋ) व क्/त् के बाद '-षु' (मूर्धन्य ष) हो जाता है (बालकेषु, मुनिषु, साधुषु, नदीषु, पितृषु)।
3. पञ्चमी और षष्ठी एकवचन की समानता: अकारान्त (बालकात्/बालकस्य) को छोड़कर, इकारान्त, उकारान्त, ऋकारान्त, आकारान्त, ईकारान्त और हलन्त सभी शब्दों में पञ्चमी एकवचन और षष्ठी एकवचन का रूप 100% समान होता है! (जैसे— मुनेः-मुनेः, साधोः-साधोः, पितुः-पितुः, लतायाः-लतायाः, नद्याः-नद्याः, भवतः-भवतः)।
3. अजन्त पुल्लिङ्ग शब्द रूप (विस्तृत तालिकाएँ एवं शब्द-सूची)
जिन
शब्दों के अंत में स्वर (अच्) होता है, उन्हें 'अजन्त' कहते हैं।
(1) अकारान्त पुल्लिङ्ग — 'बालक' शब्द (अर्थ: लड़का)
(अन्त में 'अ' स्वर आने वाले पुल्लिङ्ग शब्द)
|
विभक्तिः |
एकवचनम् |
द्विवचनम् |
बहुवचनम् |
|
प्रथमा |
बालकः |
बालकौ |
बालकाः |
|
द्वितीया |
बालकम् |
बालकौ |
बालकान् |
|
तृतीया |
बालकेन |
बालकाभ्याम् |
बालकैः |
|
चतुर्थी |
बालकाय |
बालकाभ्याम् |
बालकेभ्यः |
|
पञ्चमी |
बालकात् |
बालकाभ्याम् |
बालकेभ्यः |
|
षष्ठी |
बालकस्य |
बालकयोः |
बालकानाम् |
|
सप्तमी |
बालके |
बालकयोः |
बालकेषु |
|
सम्बोधनम् |
हे बालक! |
हे बालकौ! |
हे बालकाः! |
(2) अकारान्त पुल्लिङ्ग — 'राम' शब्द ('णत्व' नियम के साथ)
|
विभक्तिः |
एकवचनम् |
द्विवचनम् |
बहुवचनम् |
|
प्रथमा |
रामः |
रामौ |
रामाः |
|
द्वितीया |
रामम् |
रामौ |
रामान् |
|
तृतीया |
रामेण |
रामाभ्याम् |
रामैः |
|
चतुर्थी |
रामाय |
रामाभ्याम् |
रामेभ्यः |
|
पञ्चमी |
रामात् |
रामाभ्याम् |
रामेभ्यः |
|
षष्ठी |
रामस्य |
रामयोः |
रामाणाम् |
|
सप्तमी |
रामे |
रामयोः |
रामेषु |
|
सम्बोधनम् |
हे राम! |
हे रामौ! |
हे रामाः! |
अकारान्त
पुल्लिङ्ग शब्दों की सम्पूर्ण सूची (जो बिल्कुल 'बालक' और 'राम' के समान चलते हैं):
- 'बालक' के समान ('न' वाले शब्द):
देव (देवता),
गज (हाथी),
अश्व (घोड़ा),
सिंह (शेर),
मृग (हिरण),
काक (कौआ),
पिक (कोयल),
शुक (तोता),
हंस,
बक (बगुला),
भल्लूक (भालू),
विडाल (बिलाव),
गर्दभ (गधा),
उष्ट्र (ऊँट),
मूषक (चूहा),
कुक्कुर (कुत्ता),
सर्प (साँप),
मण्डूक (मेंढक),
मत्स्य (मछली),
जनक (पिता),
सुत / आत्मज (पुत्र),
सेवक (नौकर),
भृत्य,
शिष्य,
अध्यापक,
शिक्षक,
गायक,
नायक,
लेखक,
पाठक,
धावक,
चालक,
नर्तक,
रजक (धोबी),
कुम्भकार (कुम्हार),
स्वर्णकार (सुनार),
मालाकार (माली),
चिकित्सक (वैद्य),
विद्यालय,
देवालय,
हिमालय,
मेघ (बादल),
पवन (हवा),
अनल (आग),
आकाश,
लोक (संसार),
देश,
काल (समय),
दिवस (दिन),
मास (महीना),
घट (घड़ा),
दीप (दीपक),
पाद (पैर),
हस्त (हाथ),
दन्त (दाँत),
कर्ण (कान),
कण्ठ (गला),
केश (बाल),
ओष्ठ (होंठ),
कपोत (कबूतर),
स्यूत (थैला),
कन्दुक (गेंद),
आसन्द (कुर्सी),
चषक (गिलास),
मार्ग (रास्ता),
पाषाण (पत्थर),
प्रस्तर,
श्लोक,
ग्रन्थ,
पाठ,
प्रश्न,
अंक,
भाग,
दोष,
गुण,
धर्म,
यज्ञ,
उत्सव।
- 'राम' के समान ('रामेण / रामाणाम्'
की तरह 'ण' वाले शब्द):
नर (मनुष्य),
वानर (बन्दर),
मयूर (मोर),
व्याघ्र (बाघ),
मगर,
मकर,
अश्वतर (खच्चर),
छात्र,
पुत्र,
पौत्र (पोता),
भ्रातृज (भतीजा),
नृप (राजा),
ईश्वर (भगवान),
सुर (देवता),
असुर (राक्षस),
राक्षस,
दानव,
मानव,
ब्राह्मण,
क्षत्रिय,
शूद्र,
कृषक (किसान),
श्रमिक (मजदूर),
चार (जासूस),
चोर,
मित्र (सूर्य),
सूर्य,
चन्द्र,
तारागण,
वृक्ष (पेड़),
पादप,
शर (बाण),
कर (हाथ/किरण),
अधर (होंठ),
उर (हृदय),
जठर (पेट),
ग्राम (गाँव),
नगर (यदि पुल्लिङ्ग हो),
प्राकार (दीवार),
प्रकार,
आकार,
विकार,
संसार,
आहार,
विहार,
व्यापार,
आचार,
विचार,
उपकार,
अहङ्कार,
पुरस्कार,
नमस्कार,
दर्पण (शीशा),
समुद्र,
सागर,
सरोवर,
निर्झर (झरना),
पर्वत,
गिरिवर,
रथ, वर (दूल्हा), ज्वर (बुखार), स्वर, वर्ण (अक्षर/रंग), मन्त्र, यन्त्र, तन्त्र।
(3) इकारान्त पुल्लिङ्ग — 'मुनि' एवं 'कवि' शब्द
(अन्त में ह्रस्व 'इ' स्वर आने वाले पुल्लिङ्ग शब्द)
|
विभक्तिः |
एकवचनम् (मुनि / कवि) |
द्विवचनम् |
बहुवचनम् |
|
प्रथमा |
मुनिः / कविः |
मुनी / कवी |
मुनयः / कवयः |
|
द्वितीया |
मुनिम् / कविम् |
मुनी / कवी |
मुनीन् / कवीन् |
|
तृतीया |
मुनिना / कविना |
मुनिभ्याम् / कविभ्याम् |
मुनिभिः / कविभिः |
|
चतुर्थी |
मुनये / कवये |
मुनिभ्याम् / कविभ्याम् |
मुनिभ्यः / कविभ्यः |
|
पञ्चमी |
मुनेः / कवेः |
मुनिभ्याम् / कविभ्याम् |
मुनिभ्यः / कविभ्यः |
|
षष्ठी |
मुनेः / कवेः |
मुन्योः / कव्योः |
मुनीनाम् / कवीनाम् |
|
सप्तमी |
मुनौ / कवौ |
मुन्योः / कव्योः |
मुनिषु / कविषु |
|
सम्बोधनम् |
हे मुने! / हे कवे! |
हे मुनी! / हे कवी! |
हे मुनयः! / हे कवयः! |
इकारान्त
पुल्लिङ्ग शब्दों की सम्पूर्ण सूची:
- 'मुनि/कवि' के समान ('न' वाले शब्द):
कपि (बन्दर),
यति (संन्यासी),
अतिथि (मेहमान),
विधि (भाग्य/नियम),
निधि (खजाना),
उदधि (समुद्र),
जलधि (समुद्र),
पयोधि,
वारिधि,
भूपति (राजा),
नरपति,
महीपति,
सेनापति,
गृहपति,
कुलपति,
सभापति,
प्रजापति,
रघुपति,
सीतापति,
धनपति,
वनस्पति,
अग्नि (आग),
मणि (रत्न),
ध्वनि (आवाज),
पाणि (हाथ),
असि (तलवार),
कलि (कलियुग/झगड़ा),
बलि (राजा बलि/उपहार),
शालि (चावल)।
- 'णत्व' नियम वाले इकारान्त पुल्लिङ्ग शब्द (जिनमें तृतीया
एकवचन में '-णा' और षष्ठी बहुवचन में '-णाम्' होगा):
- हरि
(विष्णु/बन्दर): तृतीया एकवचन =
हरिणा,
षष्ठी बहुवचन =
हरीणाम्।
- रवि
(सूर्य): रविणा, रवीणाम्।
- गिरि
(पर्वत): गिरिणा, गिरीणाम्।
- अरि
(शत्रु): अरिणा, अरीणाम्।
- ऋषि:
ऋषिणा,
ऋषीणाम्।
- राशि
(ढेर): राशिना (यहाँ 'श्' है, 'ष्' नहीं, अतः 'न' ही रहेगा— राशिना, राशीनाम्)।
- अपवाद
('सखि'
शब्द - अर्थ: मित्र):
'सखि'
इकारान्त पुल्लिङ्ग है,
परन्तु इसके रूप 'मुनि' से भिन्न चलते हैं (प्रथमा: सखा,
सखायौ,
सखायः |
द्वितीया: सखायम्,
सखायौ,
सखीन् |
तृतीया: सख्या |
चतुर्थी: सख्ये |
पञ्चमी-षष्ठी: सख्युः |
सप्तमी: सख्यौ)।
(4) उकारान्त पुल्लिङ्ग — 'साधु', 'भानु' एवं 'गुरु' शब्द
(अन्त में ह्रस्व 'उ' स्वर आने वाले पुल्लिङ्ग शब्द)
|
विभक्तिः |
एकवचनम् (साधु / गुरु) |
द्विवचनम् |
बहुवचनम् |
|
प्रथमा |
साधुः / गुरुः |
साधू / गुरू |
साधवः / गुरवः |
|
द्वितीया |
साधुम् / गुरुम् |
साधू / गुरू |
साधून् / गुरून् |
|
तृतीया |
साधुना / गुरुणा |
साधुभ्याम् / गुरुभ्याम् |
साधुभिः / गुरुभिः |
|
चतुर्थी |
साधवे / गुरवे |
साधुभ्याम् / गुरुभ्याम् |
साधुभ्यः / गुरुभ्यः |
|
पञ्चमी |
साधोः / गुरोः |
साधुभ्याम् / गुरुभ्याम् |
साधुभ्यः / गुरुभ्यः |
|
षष्ठी |
साधोः / गुरोः |
साध्वोः / गुर्वोः |
साधूनाम् / गुरूणाम् |
|
सप्तमी |
साधौ / गुरौ |
साध्वोः / गुर्वोः |
साधुषु / गुरुषु |
|
सम्बोधनम् |
हे साधो! / हे गुरो! |
हे साधू! / हे गुरू! |
हे साधवः! / हे गुरवः! |
उकारान्त
पुल्लिङ्ग शब्दों की सम्पूर्ण सूची:
- 'साधु' के समान ('न' वाले शब्द):
भानु (सूर्य),
इन्दु (चन्द्रमा),
विधु (चन्द्रमा),
शिशु (बच्चा),
पशु (जानवर),
बन्धु (भाई/रिश्तेदार),
भिक्षु (भिखारी/संन्यासी),
वायु (हवा),
बाहु (भुजा),
केतु (ध्वज),
सेतु (पुल),
तन्तु (धागा),
बिन्दु (बूँद),
वेणु (बाँसुरी),
परशु (फरसा),
इषु (बाण),
ऋतु (मौसम)।
- 'गुरु' के समान ('ण' वाले शब्द - तृतीया में '-णा' और षष्ठी बहुवचन में '-णाम्'):
तरु (वृक्ष - तरुणा,
तरूणाम्),
शत्रु (दुश्मन - शत्रुणा,
शत्रूणाम्),
रिपु (शत्रु - रिपुणा,
रिपूणाम्),
प्रभू / प्रभु (स्वामी - प्रभुणा,
प्रभूणाम्),
विष्णु (विष्णुना/विष्णुणा -
इसमें 'ष्'
के साथ 'ण' पहले से ही जुड़ा है, इसलिए तृतीया में 'विष्णुना' और षष्ठी बहुवचन में 'विष्णूनाम्' होता है), मृत्यु (मृत्युना)।
(5) ऋकारान्त पुल्लिङ्ग — 'पितृ' एवं 'दातृ' शब्द
(अन्त में 'ऋ' स्वर आने वाले पुल्लिङ्ग शब्दों के दो वर्ग होते हैं: १.
सम्बन्धवाचक जैसे पितृ, भ्रातृ; २. कर्तृवाचक जैसे दातृ, कर्तृ, नेतृ)
वर्ग
(क): सम्बन्धवाचक 'पितृ' शब्द (अर्थ: पिता) — ह्रस्व 'अ' गुण (पितरौ, पितरः)
|
विभक्तिः |
एकवचनम् |
द्विवचनम् |
बहुवचनम् |
|
प्रथमा |
पिता |
पितरौ |
पितरः |
|
द्वितीया |
पितरम् |
पितरौ |
पितॄन् (त में दीर्घ 'ॠ') |
|
तृतीया |
पित्रा |
पितृभ्याम् |
पितृभिः |
|
चतुर्थी |
पित्रे |
पितृभ्याम् |
पितृभ्यः |
|
पञ्चमी |
पितुः |
पितृभ्याम् |
पितृभ्यः |
|
षष्ठी |
पितुः |
पित्रोः |
पितॄणाम् (त में दीर्घ 'ॠ') |
|
सप्तमी |
पितरि |
पित्रोः |
पितृषु |
|
सम्बोधनम् |
हे पितः! |
हे पितरौ! |
हे पितरः! |
वर्ग
(ख): कर्तृवाचक 'दातृ' शब्द (अर्थ: देने वाला) — दीर्घ 'आ' वृद्धि (दातारौ, दातारः)
|
विभक्तिः |
एकवचनम् |
द्विवचनम् |
बहुवचनम् |
|
प्रथमा |
दाता |
दातारौ |
दातारः |
|
द्वितीया |
दातारम् |
दातारौ |
दातॄन् |
|
तृतीया |
दात्रा |
दातृभ्याम् |
दातृभिः |
|
चतुर्थी |
दात्रे |
दातृभ्याम् |
दातृभ्यः |
|
पञ्चमी |
दातुः |
दातृभ्याम् |
दातृभ्यः |
|
षष्ठी |
दातुः |
दात्रोः |
दातॄणाम् |
|
सप्तमी |
दातरि |
दात्रोः |
दातृषु |
|
सम्बोधनम् |
हे दातः! |
हे दातारौ! |
हे दातारः! |
ऋकारान्त
पुल्लिङ्ग शब्दों की सम्पूर्ण सूची:
- 'पितृ' के समान चलने वाले शब्द (प्रथमा: -ता,
-तरौ,
-तरः):
भ्रातृ (भाई — भ्राता,
भ्रातरौ,
भ्रातरः),
जामातृ (दामाद — जामाता,
जामातरौ,
जामातरः),
देवृ (देवर — देवा,
देवरौ,
देवरः)।
- 'दातृ' के समान चलने वाले शब्द (प्रथमा: -ता,
-तारौ,
-तारः):
कर्तृ (करने वाला — कर्ता,
कर्तारौ,
कर्तारः),
नेतृ (नेता — नेता,
नेतारौ,
नेतारः),
हर्तृ (हरण करने वाला),
भर्तृ (स्वामी/पति),
श्रोतृ (सुनने वाला),
वक्तृ (बोलने वाला),
पाठयितृ (पढ़ाने वाला),
रक्षितृ (रक्षा करने वाला),
जेतृ (जीतने वाला),
क्रेतृ (खरीदने वाला),
विक्रेतृ (बेचने वाला),
विधातृ (ब्रह्मा/रचयिता),
सवितृ (सूर्य)।
- विशेष
अपवाद: 'नप्तृ'
(पोता) और
'स्वसृ'
(बहन) सम्बन्धवाचक होते हुए भी 'दातृ' की तरह दीर्घ 'आ' लेते हैं (नप्ता, नप्तारौ, नप्तारः)।
4. अजन्त स्त्रीलिङ्ग शब्द रूप (विस्तृत तालिकाएँ एवं
शब्द-सूची)
(1) आकारान्त स्त्रीलिङ्ग — 'लता' एवं 'रमा' शब्द
(अन्त में दीर्घ 'आ' स्वर आने वाले स्त्रीलिङ्ग शब्द)
|
विभक्तिः |
एकवचनम् (लता / रमा) |
द्विवचनम् |
बहुवचनम् |
|
प्रथमा |
लता / रमा |
लते / रमे |
लताः / रमाः |
|
द्वितीया |
लताम् / रमाम् |
लते / रमे |
लताः / रमाः |
|
तृतीया |
लतया / रमया |
लताभ्याम् / रमाभ्याम् |
लताभिः / रमाभिः |
|
चतुर्थी |
लतायै / रमायै |
लताभ्याम् / रमाभ्याम् |
लताभ्यः / रमाभ्यः |
|
पञ्चमी |
लतायाः / रमायाः |
लताभ्याम् / रमाभ्याम् |
लताभ्यः / रमाभ्यः |
|
षष्ठी |
लतायाः / रमायाः |
लतयोः / रमयोः |
लतानाम् / रमाणाम् |
|
सप्तमी |
लतायाम् / रमायाम् |
लतयोः / रमयोः |
लतासु / रमासु |
|
सम्बोधनम् |
हे लते! / हे रमे! |
हे लते! / हे रमे! |
हे लताः! / हे रमाः! |
आकारान्त
स्त्रीलिङ्ग शब्दों की सम्पूर्ण सूची:
बालिका
(लड़की),
कन्या, सुता
(बेटी),
आत्मजा, तनया, महिला, ललना, वनिता, भार्या
(पत्नी),
सेविका, गायिका, नायिका, लेखिका, अध्यापिका, शिक्षिका, छात्रा, शिष्या, सखीवत् 'वयस्या' (सहेली), अजा
(बकरी),
मक्षिका (मक्खी), पिपीलिका (चींटी), चटका (चिड़िया), कोकिला, सारिका
(मैना),
मूषिका (चुहिया), शाला (घर), पाठशाला, पाकशाला (रसोईघर), प्रयोगशाला, धर्मशाला, गोशाला, माला, लता, शाखा (डाली), वाटिका (बगीचा), उद्यानलता, नौका
(नाव),
पेटिका (पेटी), मञ्जूषा (सन्दूक), घटिका (घड़ी), द्विचक्रिका (साइकिल), मुद्रिका (अँगूठी), छुरिका (छुरी), सूचिका (सुई), मापिका (स्केल), सञ्चिका (फाइल/कॉपी), पुस्तिका, पत्रिका, गुलिका (गोली), स्थालिका (थाली), नासिका (नाक), जिह्वा (जीभ), ग्रीवा (गर्दन), जङ्घा (जाँघ), अम्बा (माता — ध्यान दें: सम्बोधन एकवचन में
'हे अम्ब!' होता है), विद्या, कला, शोभा, प्रभा, आभा, छाया, माया, दया, कृपा, क्षमा, लज्जा, श्रद्धा, मेधा
(बुद्धि),
प्रज्ञा, आज्ञा, पूजा, अर्चना, वन्दना, प्रार्थना, इच्छा, आशा, तृष्णा, पिपासा
(प्यास),
क्षुधा (भूख), निद्रा (नींद), चिन्ता, कथा, गाथा, भाषा, सभा, सेना, प्रजा, गङ्गा, यमुना, गोदावरीवत्
नर्मदा,
चन्द्रभागा, सीता, गीता, राधा, उमा, दुर्गा, तारा, वसुधा (पृथ्वी), धरा, वसुन्धरा, निशा (रात), सन्ध्या, वेला
(समय),
दिवा, शिला
(चट्टान),
तुला (तराजू), क्रीडा (खेल), परीक्षा, शिक्षा, भिक्षा, दीक्षा।
(2) इकारान्त स्त्रीलिङ्ग — 'मति' शब्द (अर्थ: बुद्धि)
(विशेषता: चतुर्थी, पञ्चमी, षष्ठी और सप्तमी एकवचन में इसके दो-दो रूप बनते हैं— एक 'नदी' के समान और दूसरा 'मुनि' से मिलता-जुलता)
|
विभक्तिः |
एकवचनम् |
द्विवचनम् |
बहुवचनम् |
|
प्रथमा |
मतिः |
मती |
मतयः |
|
द्वितीया |
मतिम् |
मती |
मतीः |
|
तृतीया |
मत्या |
मतिभ्याम् |
मतिभिः |
|
चतुर्थी |
मत्यै / मतये |
मतिभ्याम् |
मतिभ्यः |
|
पञ्चमी |
मत्याः / मतेः |
मतिभ्याम् |
मतिभ्यः |
|
षष्ठी |
मत्याः / मतेः |
मत्योः |
मतीनाम् |
|
सप्तमी |
मत्याम् / मतौ |
मत्योः |
मतिषु |
|
सम्बोधनम् |
हे मते! |
हे मती! |
हे मतयः! |
इकारान्त
स्त्रीलिङ्ग शब्दों की सम्पूर्ण सूची (जो 'मति' के समान चलते हैं):
गति
(चाल/दशा), रति (प्रेम), धृति (धैर्य), नीति, रीति, प्रीति, भीति
(डर),
कीर्ति (यश), मूर्ति, पूर्ति, स्फूर्ति, शान्ति, क्रान्ति, भ्रान्ति, कान्ति (चमक), श्रान्ति (थकान), क्लान्ति, शक्ति, भक्ति, युक्ति
(उपाय),
मुक्ति (मोक्ष), उक्ति (कथन), सूक्ति (सुन्दर वचन), व्यक्ति, विभक्ति, आसक्ति, विरक्ति, सृष्टि (रचना), दृष्टि (नजर), वृष्टि (वर्षा), पुष्टि, तुष्टि
(सन्तोष),
पुण्यकृति, प्रकृति
(स्वभाव/कुदरत), संस्कृति, विकृति, आकृति, कृति, स्मृति
(याद),
श्रुति (वेद), स्तुति (प्रशंसा), अवनति, उन्नति, प्रगति, दुर्गति, सद्गति, संगति, सम्पत्ति, विपत्ति, आपत्ति, उत्पत्ति, सिद्धि, वृद्धि, बुद्धि, शुद्धि, समृद्धि, रात्रि
(रात),
भूमि (जमीन), जाति, श्रेणी, पङ्क्ति, रुचि
(इच्छा),
शुचि, छवि, कृषि (खेती), अङ्गुलि, ओषधि।
(3) ईकारान्त स्त्रीलिङ्ग — 'नदी' शब्द
(अन्त में दीर्घ 'ई' स्वर आने वाले स्त्रीलिङ्ग शब्द)
|
विभक्तिः |
एकवचनम् |
द्विवचनम् |
बहुवचनम् |
|
प्रथमा |
नदी (विसर्ग नहीं आता) |
नद्यौ |
नद्यः |
|
द्वितीया |
नदीम् |
नद्यौ |
नदीः |
|
तृतीया |
नद्या |
नदीभ्याम् |
नदीभिः |
|
चतुर्थी |
नद्यै |
नदीभ्याम् |
नदीभ्यः |
|
पञ्चमी |
नद्याः |
नदीभ्याम् |
नदीभ्यः |
|
षष्ठी |
नद्याः |
नद्योः |
नदीनाम् |
|
सप्तमी |
नद्याम् |
नद्योः |
नदीषु |
|
सम्बोधनम् |
हे नदि! (ह्रस्व 'इ') |
हे नद्यौ! |
हे नद्यः! |
ईकारान्त
स्त्रीलिङ्ग शब्दों की सम्पूर्ण सूची (जो 'नदी' के समान चलते हैं):
जननी
(माता),
भगिनी (बहन), पुत्री (बेटी), पत्नी, नारी, कुमारी, किशोरी, तरुणी, युवती, सुन्दरी, मानुषी, देवी, ईश्वरी, पार्वती, सरस्वती, महती, श्रीमती, बुद्धिमती, गुणवती, धनवती, रूपवती, बलवती, सखी
(अकारान्त न होकर विशेष ईकारान्त है, परन्तु सामान्य ईकारान्त में— सहचरी), दासी, सहेली, नर्तकी, गायकी, अभिनेत्री, नेत्री, कर्त्री, धात्री, सावित्री, गायत्री, गार्गी, मैत्रेयी, द्रौपदी, कुन्ती, गान्धारी, कैकेयी, जानकी, मैथिली, वैदेही, रुक्मिणी, कालिन्दी (यमुना), भागीरथी (गङ्गा), गोदावरी, कावेरी, नगरी (शहर), पुरी, अटवी
(जंगल),
पृथ्वी, मेदिनी, धरित्री, उर्वी, रजनी (रात), यामिनी, शर्वरी, त्रियामा, कौमुदी
(चाँदनी),
दामिनी (बिजली), सौदामिनी, तडित्-वली, नलिनी (कमलिनी), पद्मिनी, वाणी
(आवाज/सरस्वती), भारती, गीतावली, दीपावली, लेखनी (कलम), अङ्कनी (पेंसिल), घटी (घड़ी/छोटा घड़ा), कूपى (बोतल), कर्तरी
(कैंची),
मार्जनी (झाड़ू), द्रोणी (बाल्टी), दर्वी (कड़छी), चालनी (छलनी), स्थाली (थाली), आसन्दी (कुर्सी), अवकरिका-धानी, श्रेणी, राजधानी, वापी (बावड़ी), वीथी (गली), देहली (दहलीज), अङ्गुलि/अङ्गुली, मयूरी (मोरनी), सिंहनी/सिंही, व्याघ्री, मृगी, हंसी, काकी, शुक-पत्नी, अरण्यी, भवती (आप - स्त्रीलिङ्ग), गच्छन्ती, पठन्ती, लिखन्ती (शतृ प्रत्ययान्त स्त्रीलिङ्ग शब्द)।
- विशेष
अपवाद: 'लक्ष्मी',
'श्री'
और
'स्त्री'
ईकारान्त स्त्रीलिङ्ग होते हुए भी
प्रथमा एकवचन में विसर्ग लेते हैं (लक्ष्मीः,
श्रीः)
और स्त्री शब्द के रूप थोड़े
भिन्न चलते हैं (प्रथमा: स्त्री, स्त्रियौ, स्त्रियः | द्वितीया: स्त्रियम्/स्त्रीम्,
स्त्रियौ,
स्त्रियः/स्त्रीः |
षष्ठी बहुवचन: स्त्रीणाम्)।
(4) ऋकारान्त स्त्रीलिङ्ग — 'मातृ' शब्द (अर्थ: माता)
(यह 'पितृ' के समान ही चलता है, केवल द्वितीया बहुवचन में अन्तर है— पितृ में 'पितॄन्' होता है, जबकि मातृ में 'मातॄः' होता है)
|
विभक्तिः |
एकवचनम् |
द्विवचनम् |
बहुवचनम् |
|
प्रथमा |
माता |
मातरौ |
मातरः |
|
द्वितीया |
मातरम् |
मातरौ |
मातॄः (त में दीर्घ 'ॠ' और विसर्ग) |
|
तृतीया |
मात्रा |
मातृभ्याम् |
मातृभिः |
|
चतुर्थी |
मात्रे |
मातृभ्याम् |
मातृभ्यः |
|
पञ्चमी |
मातुः |
मातृभ्याम् |
मातृभ्यः |
|
षष्ठी |
मातुः |
मात्रोः |
मातॄणाम् |
|
सप्तमी |
मातरि |
मात्रोः |
मातृषु |
|
सम्बोधनम् |
हे मातः! |
हे मातरौ! |
हे मातरः! |
ऋकारान्त
स्त्रीलिङ्ग शब्दों की सूची:
- 'मातृ' के समान: दुहितृ (बेटी — दुहिता, दुहितरौ, दुहितरः; द्वितीया बहुवचन: दुहितॄः),
ननान्दृ (ननद — ननान्दा,
ननान्दरौ,
ननान्दरः),
यातृ (देवरानी/जेठानी — याता,
यातरौ,
यातरः)।
- 'स्वसृ' (बहन): प्रथमा और द्वितीया में दीर्घ 'आ' होता है (स्वसा, स्वसारौ, स्वसारः | स्वसारम्, स्वसारौ, स्वसॄः), तृतीया से सप्तमी तक 'मातृ' के समान (स्वस्रा, स्वसृभ्याम् आदि)।
5. अजन्त नपुंसकलिङ्ग शब्द रूप (विस्तृत तालिकाएँ एवं
शब्द-सूची)
नपुंसकलिङ्ग
का स्वर्णिम नियम: किसी
भी नपुंसकलिङ्ग शब्द में प्रथमा विभक्ति और द्वितीया विभक्ति के तीनों वचन 100% समान होते हैं।
तृतीया विभक्ति से सप्तमी विभक्ति तक अकारान्त नपुंसकलिङ्ग शब्द बिल्कुल
अकारान्त पुल्लिङ्ग (बालक/राम)
के समान ही चलते हैं!
(1) अकारान्त नपुंसकलिङ्ग — 'फल' एवं 'पुस्तक' शब्द
|
विभक्तिः |
एकवचनम् |
द्विवचनम् |
बहुवचनम् |
|
प्रथमा |
फलम् / मित्रम् |
फले / मित्रे |
फलानि / मित्राणि |
|
द्वितीया |
फलम् / मित्रम् |
फले / मित्रे |
फलानि / मित्राणि |
|
तृतीया |
फलेन / मित्रेण |
फलाभ्याम् / मित्राभ्याम् |
फलैः / मित्रैः |
|
चतुर्थी |
फलाय / मित्राय |
फलाभ्याम् / मित्राभ्याम् |
फलेभ्यः / मित्रेभ्यः |
|
पञ्चमी |
फलात् / मित्रात् |
फलाभ्याम् / मित्राभ्याम् |
फलेभ्यः / मित्रेभ्यः |
|
षष्ठी |
फलस्य / मित्रस्य |
फलयोः / मित्रयोः |
फलानाम् / मित्राणाम् |
|
सप्तमी |
फले / मित्रे |
फलयोः / मित्रयोः |
फलेषु / मित्रेषु |
|
सम्बोधनम् |
हे फल! / हे मित्र! |
हे फले! / हे मित्रे! |
हे फलानि! / हे मित्राणि! |
अकारान्त
नपुंसकलिङ्ग शब्दों की सम्पूर्ण सूची:
- 'फल' के समान ('-आनि / -एन / -आनाम्'
वाले शब्द):
पुस्तक (किताब),
वन (जंगल),
जल (पानी),
सलिल,
तोय,
पान,
गृह (घर — इसमें 'ऋ' है, परन्तु बीच में 'ह' आने से प्रथमा बहुवचन
गृहाणि,
तृतीया
गृहेण,
षष्ठी
गृहाणाम्
होगा!),
भवन (महल/घर — भवनम्,
भवने,
भवनानि),
सदन,
निकेतन,
आलय,
कमल (कमल का फूल),
उत्पल,
पद्म,
कुसुम (फूल),
उद्यान (बगीचा),
उपवन,
कानन,
यान (गाड़ी),
विमान (हवाई जहाज),
लोकयान (बस),
धूम्रयान (रेलगाड़ी),
शकट (बैलगाड़ी),
धन (पैसा),
वित्त,
रत्न,
सुवर्ण / स्वर्ण (सोना —
स्वर्णानि), रजत (चाँदी), लौह (लोहा), ताम्र (ताँबा), अन्न (अनाज), भोजन, शाक
(सब्जी), दुग्ध
(दूध), दधि
(यह इकारान्त है), घृत (घी — घृतानि), नवनीत (मक्खन), मिष्टान्न (मिठाई), लवण (नमक), वस्त्र (कपड़ा), वसन, अम्बर (आकाश/कपड़ा — अम्बराणि),
दुकूल,
छत्र (छाता — छत्राणि),
उपनेत्र (चश्मा — उपनेत्राणि),
कङ्कण (कंगन),
आभूषण (गहना — आभूषणानि),
मुख (मुँह),
नयन (आँख),
लोचन,
ललाट (माथा),
मस्तक (सिर),
उदर (पेट — उदराणि),
पृष्ठ (पीठ — पृष्ठानि),
हृदय,
अङ्ग,
शरीर (शरीराणि),
मांस,
रक्त,
अस्थि (इकारान्त),
सुख,
दुःख,
ज्ञान,
विज्ञान,
ध्यान,
दान,
मान,
सम्मान,
अपमान,
गान (गीत),
स्नान,
पान,
स्थान,
आसन,
शयन,
जीवन,
मरण (मरणाणि),
जन्म (यह 'अन्' हलन्त है), कर्म (हलन्त), नाम (हलन्त), सत्य, असत्य, पाप, पुण्य, मूल, कुल, बल, दल, तैल (तेल), बीज, गीत, नृत्य, नाटक, काव्य, साहित्य, गणित, चलच्चित्र (सिनेमा), दूरदर्शन (टीवी), सङ्गणक (कम्प्यूटर), चलदूरभाषयन्त्र (मोबाइल),
व्यजन (पंखा),
वातायन (खिड़की),
द्वार (दरवाजा — द्वाराणि),
सोपान (सीढ़ी),
छदि (छत),
क्रीडनक (खिलौना),
रूप्यक (रुपया),
पञ्जर (पिंजरा — पञ्जराणि)।
- 'मित्र' के समान ('-आणि / -एण / -आणाम्'
वाले शब्द — जिनमें र,
ष,
ऋ आता है):
पत्र (पत्ता/चिट्ठी — पत्रम्,
पत्रे,
पत्राणि),
पुष्प (फूल — पुष्पाणि),
चित्र (तस्वीर — चित्राणि),
नेत्र (आँख — नेत्राणि),
मित्र (दोस्त — ध्यान दें: 'मित्र' शब्द संस्कृत में नपुंसकलिङ्ग है!),
चरित्र (चरित्राणि),
सूत्र (धागा/नियम — सूत्राणि),
शस्त्र (हथियार — शस्त्राणि),
अस्त्र (अस्त्राणि),
शास्त्र (शास्त्राणि),
पात्र (बर्तन — पात्राणि),
क्षेत्र (खेत — क्षेत्राणि),
नक्षत्र (तारा — नक्षत्राणि),
छत्र (छाता — छत्राणि),
गोत्र,
मात्र,
यन्त्र,
तन्त्र,
मन्त्र,
राष्ट्र (देश — राष्ट्राणि),
नगर (शहर — नगराणि),
शरीर (शरीराणि),
द्वार (द्वाराणि),
क्षीर (दूध — क्षीराणि),
नीर (पानी — नीराणि),
तीर (किनारा — तीराणि),
मन्दिर (मन्दिराणि),
गृह (गृहाणि),
तृण (तिनका — तृणानि,
क्योंकि अंत में पहले से ही 'ण' है), पर्ण (पत्ता — पर्णानि), स्वर्ण (स्वर्णानि), कारण (कारणानि), मरण, हरण, भरण, पोषण, भूषण, आभूषण (आभूषणानि), प्रमाण (प्रमाणानि), परिणाम, निर्माण।
(2) इकारान्त नपुंसकलिङ्ग 'वारि' (जल) एवं उकारान्त नपुंसकलिङ्ग 'मधु' (शहद)
|
विभक्तिः |
एकवचनम् (वारि / मधु) |
द्विवचनम् |
बहुवचनम् |
|
प्रथमा |
वारि / मधु |
वारिणी / मधुनी |
वारीणि / मधूनि |
|
द्वितीया |
वारि / मधु |
वारिणी / मधुनी |
वारीणि / मधूनि |
|
तृतीया |
वारिणा / मधुना |
वारिभ्याम् / मधुभ्याम् |
वारिभिः / मधुभिः |
|
चतुर्थी |
वारिणे / मधुने |
वारिभ्याम् / मधुभ्याम् |
वारिभ्यः / मधुभ्यः |
|
पञ्चमी |
वारिणः / मधुनः |
वारिभ्याम् / मधुभ्याम् |
वारिभ्यः / मधुभ्यः |
|
षष्ठी |
वारिणः / मधुनः |
वारिणोः / मधुनोः |
वारीणाम् / मधूनाम् |
|
सप्तमी |
वारिणि / मधुनि |
वारिणोः / मधुनोः |
वारिषु / मधुषु |
|
सम्बोधनम् |
हे वारे! (वारि!) / हे मधो! (मधु!) |
हे वारिणी! / हे मधुनी! |
हे वारीणि! / हे मधूनि! |
- समान
शब्द: 'वारि'
के समान— अक्षि,
अस्थि,
दधि,
सक्थि (तृतीया से अक्ष्णा,
दध्ना आदि बनते हैं,
पर प्रथमा-द्वितीया में दधि,
दधिनी,
दधीनि)। 'मधु' के समान— अम्बु (जल), अश्रु (आँसू), जानु (घुटना), दारु (लकड़ी), वस्तु (चीज), तालु।
6. हलन्त (व्यञ्जनान्त) शब्द रूप (कक्षा 9 पाठ्यक्रम हेतु अति महत्त्वपूर्ण)
जिन
शब्दों के अंत में व्यञ्जन (हल्) अर्थात हलन्त वर्ण होता है, उन्हें 'हलन्त' कहते हैं।
(1) तकारान्त पुल्लिङ्ग — 'भवत्' शब्द (अर्थ: आप)
(सूचना: 'भवत्' सर्वनाम/संज्ञा शब्द के साथ सदैव
प्रथम पुरुष
की क्रिया लगती है, जैसे— भवान् पठति = आप पढ़ते हैं; भवन्तौ पठतः; भवन्तः पठन्ति। स्त्रीलिङ्ग में 'भवती' रूप 'नदी' के समान चलता है— भवती पठति, भवत्यौ पठतः, भवत्यः पठन्ति)
|
विभक्तिः |
एकवचनम् |
द्विवचनम् |
बहुवचनम् |
|
प्रथमा |
भवान् |
भवन्तौ |
भवन्तः |
|
द्वितीया |
भवन्तम् |
भवन्तौ |
भवतः |
|
तृतीया |
भवता |
भवद्भ्याम् |
भवद्भिः |
|
चतुर्थी |
भवते |
भवद्भ्याम् |
भवद्भ्यः |
|
पञ्चमी |
भवतः |
भवद्भ्याम् |
भवद्भ्यः |
|
षष्ठी |
भवतः |
भवतोः |
भवताम् |
|
सप्तमी |
भवति (अर्थ: आप में) |
भवतोः |
भवत्सु |
|
सम्बोधनम् |
हे भवन्! |
हे भवन्तौ! |
हे भवन्तः! |
(2) शतृ-प्रत्ययान्त पुल्लिङ्ग — 'गच्छत्' (जाता हुआ) एवं मतुप्-प्रत्ययान्त 'बुद्धिमत् / श्रीमत्'
- 'गच्छत्' (जाता हुआ), 'पठत्' (पढ़ता हुआ), 'लिखत्' (लिखता हुआ), 'धावत्' (दौड़ता हुआ), 'हसत्' (हँसता हुआ), 'खादत्' (खाता हुआ), 'क्रीडत्' (खेलता हुआ):
इन सभी शब्दों के रूप तृतीया से
सप्तमी तक बिल्कुल 'भवत्' के
समान चलते हैं, केवल प्रथमा एकवचन
में दीर्घ 'आ' न होकर ह्रस्व 'अ' रहता है!
- प्रथमा
विभक्ति: गच्छन् (भवान् की तरह 'गच्छान्' नहीं!), गच्छन्तौ, गच्छन्तः।
- द्वितीया
विभक्ति: गच्छन्तम्, गच्छन्तौ, गच्छतः।
- तृतीया
से सप्तमी: गच्छता, गच्छते, गच्छतः, गच्छति (बिल्कुल 'भवत्' के समान)।
- 'श्रीमत्' (श्रीमन्), 'बुद्धिमत्' (बुद्धिमान्), 'बलवत्' (बलवान्), 'धनवत्' (धनवान्), 'गुणवत्' (गुणवान्), 'रूपवत्' (रूपवान्), 'भगवत्' (भगवान्): इन मतुप्/वतुप् प्रत्ययान्त शब्दों के रूप प्रथमा से
सप्तमी तक 100% 'भवत्'
के समान चलते हैं!
- प्रथमा:
बुद्धिमान्, बुद्धिमन्तौ, बुद्धिमन्तः | द्वितीया: बुद्धिमन्तम्, बुद्धिमन्तौ, बुद्धिमतः | तृतीया: बुद्धिमता आदि।
(3) नकारान्त पुल्लिङ्ग — 'राजन्' (राजा), 'आत्मन्' (आत्मा) एवं 'गुणिन्' (गुणी)
|
विभक्तिः |
राजन् (एक / द्वि / बहु) |
आत्मन् (एक / द्वि / बहु) |
गुणिन् (एक / द्वि / बहु) |
|
प्रथमा |
राजा / राजानौ / राजानः |
आत्मा / आत्मानौ / आत्मानः |
गुणी / गुणिनौ / गुणिनः |
|
द्वितीया |
राजानम् / राजानौ / राज्ञः |
आत्मानम् / आत्मानौ / आत्मनः |
गुणिनम् / गुणिनौ / गुणिनः |
|
तृतीया |
राज्ञा / राजभ्याम् / राजभिः |
आत्मना / आत्मभ्याम् / आत्मभिः |
गुणिना / गुणिभ्याम् / गुणिभिः |
|
चतुर्थी |
राज्ञे / राजभ्याम् / राजभ्यः |
आत्मने / आत्मभ्याम् / आत्मभ्यः |
गुणिने / गुणिभ्याम् / गुणिभ्यः |
|
पञ्चमी |
राज्ञः / राजभ्याम् / राजभ्यः |
आत्मनः / आत्मभ्याम् / आत्मभ्यः |
गुणिनः / गुणिभ्याम् / गुणिभ्यः |
|
षष्ठी |
राज्ञः / राज्ञोः / राज्ञाम् |
आत्मनः / आत्मनोः / आत्मनाम् |
गुणिनः / गुणिनोः / गुणिनाम् |
|
सप्तमी |
राज्ञि (राजनि) / राज्ञोः / राजसु |
आत्मनि / आत्मनोः / आत्मसु |
गुणिनि / गुणिनोः / गुणिषु |
|
सम्बोधनम् |
हे राजन्! / हे राजानौ! / हे राजानः! |
हे आत्मन्! / हे आत्मानौ! / हे आत्मानः! |
हे गुणिन्! / हे गुणिनौ! / हे गुणिनः! |
- 'गुणिन्' (इन्-अन्त) के समान चलने वाले अति महत्त्वपूर्ण शब्द:
धनिन् (धनी,
धनिनौ,
धनिनः),
बलिन् (बली,
बलिनौ,
बलिनः),
ज्ञानिन् (ज्ञानी),
स्वामिन् (स्वामी),
मन्त्रिन् (मन्त्री),
विद्यार्थिन् (विद्यार्थी,
विद्यार्थिनौ,
विद्यार्थिनः),
पक्षिन् (पक्षी),
करिन् (हाथी — करी,
करिणौ,
करिणः),
दण्डिन्,
संन्यासिन्,
तपस्विन्,
मनस्विन्,
यशस्विन्,
मेधाविन्,
रोगिन्,
योगिन्,
भोगिन्,
साक्षिन्,
प्राणिन् (प्राणी)।
(4) सकारान्त पुल्लिङ्ग — 'विद्वस्' (विद्वान्) एवं नपुंसकलिङ्ग 'मनस्' (मन)
|
विभक्तिः |
विद्वस् (पुल्लिङ्ग: एक / द्वि / बहु) |
मनस् (नपुंसकलिङ्ग: एक / द्वि / बहु) |
|
प्रथमा |
विद्वान् / विद्वांसौ / विद्वांसः |
मनः / मनसी / मनांसि |
|
द्वितीया |
विद्वांसम् / विद्वांसौ / विदुषः |
मनः / मनसी / मनांसि |
|
तृतीया |
विदुषा / विद्वद्भ्याम् / विद्वद्भिः |
मनसा / मनोभ्याम् / मनोभिः |
|
चतुर्थी |
विदुषे / विद्वद्भ्याम् / विद्वद्भ्यः |
मनसे / मनोभ्याम् / मनोभ्यः |
|
पञ्चमी |
विदुषः / विद्वद्भ्याम् / विद्वद्भ्यः |
मनसः / मनोभ्याम् / मनोभ्यः |
|
षष्ठी |
विदुषः / विदुषोः / विदुषाम् |
मनसः / मनसोः / मनसाम् |
|
सप्तमी |
विदुषि / विदुषोः / विद्वत्सु |
मनसि / मनसोः / मनःसु (मनस्सु) |
|
सम्बोधनम् |
हे विद्वन्! / हे विद्वांसौ! / हे विद्वांसः! |
हे मनः! / हे मनसी! / हे मनांसि! |
- 'मनस्' के समान चलने वाले नपुंसकलिङ्ग शब्द:
पयस् (दूध/जल — पयः,
पयसी,
पयांसि),
यशस् (यशः,
यशसी,
यशांसि),
तेजस् (तेजः),
तपस् (तपः),
तमस् (अन्धकार — तमः),
सरस् (तालाब — सरः),
उरस् (हृदय),
शिरस् (सिर — शिरः,
शिरसी,
शिरांसि),
वयस् (आयु),
चेतस् (चित्त),
नभस् (आकाश),
वचस् (वाणी)।
7. सर्वनाम शब्द रूप (तीनों लिङ्गों में सम्पूर्ण तालिकाएँ)
सर्वनाम
शब्दों की दो मुख्य विशेषताएँ:
1. सर्वनाम शब्दों में सम्बोधन विभक्ति नहीं होती (केवल सात विभक्तियाँ होती हैं)।
2. 'अस्मद्' (मैं/हम)
और 'युष्मद्' (तुम)
को छोड़कर, अन्य सभी सर्वनाम
शब्द (तद्, एतद्, किम्, इदम्, यद्, सर्व)
तीनों लिङ्गों में अलग-अलग रूप
बनाते हैं।
(1) उत्तम पुरुष 'अस्मद्' (मैं/हम) एवं मध्यम पुरुष 'युष्मद्' (तुम) — तीनों लिङ्गों में समान
|
विभक्तिः |
अस्मद् (एक / द्वि / बहु) |
युष्मद् (एक / द्वि / बहु) |
|
प्रथमा |
अहम् / आवाम् / वयम् |
त्वम् / युवाम् / यूयम् |
|
द्वितीया |
माम् (मा) / आवाम् (नौ) / अस्मान् (नः) |
त्वाम् (त्वा) / युवाम् (वाम्) / युष्मान् (वः) |
|
तृतीया |
मया / आवाभ्याम् / अस्माभिः |
त्वया / युवाभ्याम् / युष्माभिः |
|
चतुर्थी |
मह्यम् (मे) / आवाभ्याम् (नौ) / अस्मभ्यम् (नः) |
तुभ्यम् (ते) / युवाभ्याम् (वाम्) / युष्मभ्यम् (वः) |
|
पञ्चमी |
मत् / आवाभ्याम् / अस्मत् |
त्वत् / युवाभ्याम् / युष्मत् |
|
षष्ठी |
मम (मे) / आवयोः (नौ) / अस्माकम् (नः) |
तव (ते) / युवयोः (वाम्) / युष्माकम् (वः) |
|
सप्तमी |
मयि / आवयोः / अस्मासु |
त्वयि / युवयोः / युष्मासु |
(नोट: कोष्ठक में दिए गए वैकल्पिक रूप— मा, मे, नौ, नः तथा त्वा, ते, वाम्, वः— द्वितीया, चतुर्थी और षष्ठी में बनते हैं, परन्तु इनका प्रयोग वाक्य के आरम्भ में कभी नहीं होता।)
(2) 'तद्' (वह) एवं 'किम्' (कौन/क्या) — तीनों लिङ्गों में तुलनात्मक तालिका
स्मरण-सूत्र: 'तद्' के रूपों
में जहाँ शुरुआत में 'स/त' है, वहाँ
'क' लगा देने से 100% 'किम्' के रूप बन जाते हैं! इसी प्रकार 'य' लगा देने से 'यद्' (जो) के रूप और 'तद्' के आगे 'ए' जोड़ देने से 'एतद्' (यह) के रूप बन जाते हैं!
(क) पुल्लिङ्ग रूप: तद् (वह), एतद् (यह), किम् (कौन), यद् (जो)
|
विभक्तिः |
तद् (पुल्लिङ्ग) |
किम् (पुल्लिङ्ग) |
एतद् (पुल्लिङ्ग) |
यद् (पुल्लिङ्ग) |
|
प्रथमा |
सः / तौ / ते |
कः / कौ / के |
एषः / एतौ / एते |
यः / यौ / ये |
|
द्वितीया |
तम् / तौ / तान् |
कम् / कौ / कान् |
एतम् / एतौ / एतान् |
यम् / यौ / यान् |
|
तृतीया |
तेन / ताभ्याम् / तैः |
केन / काभ्याम् / कैः |
एतेन / एताभ्याम् / एतैः |
येन / याभ्याम् / यैः |
|
चतुर्थी |
तस्मै / ताभ्याम् / तेभ्यः |
कस्मै / काभ्याम् / केभ्यः |
एतस्मै / एताभ्याम् / एतेभ्यः |
यस्मै / याभ्याम् / येभ्यः |
|
पञ्चमी |
तस्मात् / ताभ्याम् / तेभ्यः |
कस्मात् / काभ्याम् / केभ्यः |
एतस्मात् / एताभ्याम् / एतेभ्यः |
यस्मात् / याभ्याम् / येभ्यः |
|
षष्ठी |
तस्य / तयोः / तेषाम् |
कस्य / कयोः / केषाम् |
एतस्य / एतयोः / एतेषाम् |
यस्य / ययोः / येषाम् |
|
सप्तमी |
तस्मिन् / तयोः / तेषु |
कस्मिन् / कयोः / केषु |
एतस्मिन् / एतयोः / एतेषु |
यस्मिन् / ययोः / येषु |
(ख) स्त्रीलिङ्ग रूप: तद् (वह), किम् (कौन), एतद् (यह), यद् (जो)
|
विभक्तिः |
तद् (स्त्रीलिङ्ग) |
किम् (स्त्रीलिङ्ग) |
एतद् (स्त्रीलिङ्ग) |
यद् (स्त्रीलिङ्ग) |
|
प्रथमा |
सा / ते / ताः |
का / के / काः |
एषा / एते / एताः |
या / ये / याः |
|
द्वितीया |
ताम् / ते / ताः |
काम् / के / काः |
एताम् / एते / एताः |
याम् / ये / याः |
|
तृतीया |
तया / ताभ्याम् / ताभिः |
कया / काभ्याम् / काभिः |
एतया / एताभ्याम् / एताभिः |
यया / याभ्याम् / याभिः |
|
चतुर्थी |
तस्यै / ताभ्याम् / ताभ्यः |
कस्यै / काभ्याम् / काभ्यः |
एतस्यै / एताभ्याम् / एताभ्यः |
यस्यै / याभ्याम् / याभ्यः |
|
पञ्चमी |
तस्याः / ताभ्याम् / ताभ्यः |
कस्याः / काभ्याम् / काभ्यः |
एतस्याः / एताभ्याम् / एताभ्यः |
यस्याः / याभ्याम् / याभ्यः |
|
षष्ठी |
तस्याः / तयोः / तासाम् |
कस्याः / कयोः / कासाम् |
एतस्याः / एतयोः / एतासाम् |
यस्याः / ययोः / यासाम् |
|
सप्तमी |
तस्याम् / तयोः / तासु |
कस्याम् / कयोः / कासु |
एतस्याम् / एतयोः / एतासु |
यस्याम् / ययोः / यासु |
(ग) नपुंसकलिङ्ग रूप: तद्, किम्, एतद्, यद्
(नियम: केवल प्रथमा और द्वितीया नीचे अनुसार चलेंगे, तृतीया से सप्तमी तक 100% पुल्लिङ्ग के समान चलते हैं!)
- तद्
(नपुंसकलिङ्ग): प्रथमा व द्वितीया =
तत्,
ते,
तानि
(तृतीया से: तेन,
तस्मै,
तस्मात्,
तस्य,
तस्मिन्...)।
- किम्
(नपुंसकलिङ्ग): प्रथमा व द्वितीया =
किम्,
के,
कानि
(तृतीया से: केन,
कस्मै,
कस्मात्,
कस्य,
कस्मिन्...)।
- एतद्
(नपुंसकलिङ्ग): प्रथमा व द्वितीया =
एतत्,
एते,
एतानि
(तृतीया से: एतेन,
एतस्मै,
एतस्मात्...)।
- यद्
(नपुंसकलिङ्ग): प्रथमा व द्वितीया =
यत्,
ये,
यानि
(तृतीया से: येन, यस्मै, यस्मात्...)।
(3) 'इदम्' (यह) एवं 'सर्व' (सब) — तीनों लिङ्गों में सम्पूर्ण रूप
(क) 'इदम्' (यह) शब्द रूप — तीनों लिङ्ग
|
विभक्तिः |
पुल्लिङ्ग (एक / द्वि / बहु) |
स्त्रीलिङ्ग (एक / द्वि / बहु) |
नपुंसकलिङ्ग (एक / द्वि / बहु) |
|
प्रथमा |
अयम् / इमौ / इमे |
इयम् / इमे / इमाः |
इदम् / इमे / इमानि |
|
द्वितीया |
इमम् / इमौ / इमान् |
इमाम् / इमे / इमाः |
इदम् / इमे / इमानि |
|
तृतीया |
अनेन / आभ्याम् / एभिः |
अनया / आभ्याम् / आभिः |
(तृतीया से सप्तमी पुल्लिङ्ग समान) |
|
चतुर्थी |
अस्मै / आभ्याम् / एभ्यः |
अस्यै / आभ्याम् / आभ्यः |
अस्मै / आभ्याम् / एभ्यः |
|
पञ्चमी |
अस्मात् / आभ्याम् / एभ्यः |
अस्याः / आभ्याम् / आभ्यः |
अस्मात् / आभ्याम् / एभ्यः |
|
षष्ठी |
अस्य / अनयोः / एषाम् |
अस्याः / अनयोः / आसाम् |
अस्य / अनयोः / एषाम् |
|
सप्तमी |
अस्मिन् / अनयोः / एषु |
अस्याम् / अनयोः / आसु |
अस्मिन् / अनयोः / एषु |
(ख) 'सर्व' (सब) शब्द रूप — तीनों लिङ्ग (णत्व नियम लागू होता है:
सर्वेण, सर्वेषाम्, सर्वाणाम्)
|
विभक्तिः |
पुल्लिङ्ग (एक / द्वि / बहु) |
स्त्रीलिङ्ग (एक / द्वि / बहु) |
नपुंसकलिङ्ग (एक / द्वि / बहु) |
|
प्रथमा |
सर्वः / सर्वौ / सर्वे |
सर्वा / सर्वे / सर्वाः |
सर्वम् / सर्वे / सर्वाणि |
|
द्वितीया |
सर्वम् / सर्वौ / सर्वान् |
सर्वाम् / सर्वे / सर्वाः |
सर्वम् / सर्वे / सर्वाणि |
|
तृतीया |
सर्वेण / सर्वाभ्याम् / सर्वैः |
सर्वया / सर्वाभ्याम् / सर्वाभिः |
(तृतीया से सप्तमी पुल्लिङ्ग समान) |
|
चतुर्थी |
सर्वस्मै / सर्वाभ्याम् / सर्वेभ्यः |
सर्वस्यै / सर्वाभ्याम् / सर्वाभ्यः |
सर्वस्मै / सर्वाभ्याम् / सर्वेभ्यः |
|
पञ्चमी |
सर्वस्मात् / सर्वाभ्याम् / सर्वेभ्यः |
सर्वस्याः / सर्वाभ्याम् / सर्वाभ्यः |
सर्वस्मात् / सर्वाभ्याम् / सर्वेभ्यः |
|
षष्ठी |
सर्वस्य / सर्वयोः / सर्वेषाम् |
सर्वस्याः / सर्वयोः / सर्वासाम् |
सर्वस्य / सर्वयोः / सर्वेषाम् |
|
सप्तमी |
सर्वस्मिन् / सर्वयोः / सर्वेषु |
सर्वस्याम् / सर्वयोः / सर्वासु |
सर्वस्मिन् / सर्वयोः / सर्वेषु |
8. सीबीएसई (एनसीईआरटी) परीक्षा पैटर्न अनुसार वाक्य-प्रयोग के
नियम
कक्षा
9
की परीक्षा में सीधे तालिका लिखने को नहीं आती, बल्कि वाक्य के सन्दर्भ में कोष्ठक में दिए गए मूल शब्द का उचित
विभक्ति एवं वचन रूप भरने को आता है। इसके लिए इन 4 सूत्रों का प्रयोग करें:
1. क्रिया के अनुसार कर्ता (प्रथमा विभक्ति):
यदि वाक्य में कर्ता का स्थान खाली है, तो क्रिया का पुरुष और वचन देखें।
o जैसे— ..........
(मुनि) वने तपः चरन्ति।
यहाँ क्रिया 'चरन्ति' बहुवचन
है,
अतः प्रथमा बहुवचन 'मुनयः' आएगा।
2. विशेषण-विशेष्य अन्वय (समान लिङ्ग, विभक्ति, वचन): यदि रिक्त स्थान के ठीक बाद कोई संज्ञा पद दिया है और
कोष्ठक में सर्वनाम या विशेषण (तद्, इदम्, एतद्, सर्व, विद्वस्, गुणिन् आदि) है, तो संज्ञा में जो लिङ्ग, विभक्ति और वचन है, वही विशेषण में लगाएँ!
o जैसे— ..........
(इदम्) बालिकायै मोदकं यच्छ।
यहाँ 'बालिकायै' स्त्रीलिङ्ग, चतुर्थी एकवचन है, अतः 'इदम्' का स्त्रीलिङ्ग चतुर्थी एकवचन 'अस्यै' आएगा।
o जैसे— ..........
(तद्) वृक्षात् फलानि पतन्ति।
यहाँ 'वृक्षात्' पुल्लिङ्ग पञ्चमी एकवचन है, अतः 'तस्मात्' आएगा।
3. उपपद विभक्ति की पहचान: वाक्य में कुछ विशेष शब्दों के आने पर निश्चित विभक्ति ही
लगती है:
o द्वितीया: उभयतः, परितः, सर्वतः, प्रति, विना, धिक्, निकषा, समया
के साथ। (जैसे— .......... (ग्राम) परितः वृक्षाः सन्ति -----
ग्रामम्)।
o तृतीया: सह, साकम्, समम्, सार्धम्, अलम् (निषेध), विना, हीन, काण, बधिर के
साथ। (जैसे— पुत्रः
.......... (पितृ) सह गच्छति -----
पित्रा)।
o चतुर्थी: नमः, स्वस्ति, स्वाहा, अलम्
(पर्याप्त), दा/यच्छ् (देना), रुच् (अच्छा लगना), क्रुध् (क्रोध करना) के साथ। (जैसे— ..........
(गुरु) ----- गुरवे)।
o पञ्चमी: बहिः, भी
(डरना),
रक्ष् (रक्षा करना), प्रभृति, ऋते, अनन्तरम्, प्र
+ भू (निकलना) के साथ। (जैसे— गङ्गा .......... (गिरि) प्रभवति ----- गिरेः)।
o सप्तमी: निपुण, कुशल, प्रवीण, स्निह्
(स्नेह करना), विश्वस् (विश्वास
करना) के साथ। (जैसे— माता
.......... (शिशु) स्निह्यति ----- शिशौ)।
4. प्रश्न निर्माण का आधार (किम् शब्द रूप):
रेखाङ्कित शब्द में जो लिङ्ग, विभक्ति और वचन होता है, प्रश्न बनाते समय 'किम्' शब्द
का वही लिङ्ग, विभक्ति और वचन रखा
जाता है।
o जैसे— लतायाः (स्त्रीलिङ्ग, पञ्चमी/षष्ठी एकवचन) ----- कस्याः
9. विस्तृत अभ्यास के प्रश्न (वर्णनात्मक अभ्यास - उत्तर सहित)
अभ्यासः
1:
अधोलिखितपदानां मूलशब्दं, लिङ्गं, विभक्तिं, वचनं च लिखत—
(निम्नलिखित पदों के मूल शब्द, लिङ्ग, विभक्ति
और वचन लिखिए)
|
क्र.सं. |
पदम् |
मूलशब्दः |
लिङ्गम् |
विभक्तिः |
वचनम् |
|
1. |
राज्ञे |
राजन् |
पुल्लिङ्गम् |
चतुर्थी |
एकवचनम् |
|
2. |
मातॄः |
मातृ |
स्त्रीलिङ्गम् |
द्वितीया |
बहुवचनम् |
|
3. |
पितॄन् |
पितृ |
पुल्लिङ्गम् |
द्वितीया |
बहुवचनम् |
|
4. |
भवतः |
भवत् |
पुल्लिङ्गम् |
द्वितीया (बहु.) / पञ्चमी-षष्ठी (एक.) |
बहुवचनम् / एकवचनम् |
|
5. |
विदुषा |
विद्वस् |
पुल्लिङ्गम् |
तृतीया |
एकवचनम् |
|
6. |
साध्वोः |
साधु |
पुल्लिङ्गम् |
षष्ठी / सप्तमी |
द्विवचनम् |
|
7. |
नदीः |
नदी |
स्त्रीलिङ्गम् |
द्वितीया |
बहुवचनम् |
|
8. |
अस्मासु |
अस्मद् |
त्रिषु लिङ्गेषु समानम् |
सप्तमी |
बहुवचनम् |
|
9. |
अनया |
इदम् |
स्त्रीलिङ्गम् |
तृतीया |
एकवचनम् |
|
10. |
मित्राणि |
मित्र |
नपुंसकलिङ्गम् |
प्रथमा / द्वितीया |
बहुवचनम् |
अभ्यासः
2:
कोष्ठके प्रदत्तशब्दानां
समुचितं रूपं निर्माय रिक्तस्थानानि पूरयत—
(कोष्ठक में दिए गए शब्दों के उचित रूप बनाकर रिक्त स्थान
भरिए — सीबीएसई परीक्षा स्तर)
1. आकाशे बहवः .................... (कपोत) उत्पतन्ति।
2. ....................
(मातृ) चरणयोः सादरं प्रणामः।
3. उद्याने सुन्दराणि .................... (पुष्प) विकसन्ति।
4. ....................
(भवत् - स्त्रीलिङ्ग) कुत्र गच्छति?
5. राजा .................... (विद्वस्) सम्मानं करोति।
(बहुवचन में)
6. ....................
(इदम्) बालकेन शोभनः लेखः लिखितः।
7. सीता .................... (राम) सह वनं अगच्छत्।
8. वृक्षात् .................... (फल) पततः। (द्विवचन में)
9. ....................
(अस्मद्) देशः भारतवर्षः अस्ति। (बहुवचन
में - 'हमारा')
10. सः .................... (मुनि) फलं यच्छति।
उत्तराणि
(अभ्यासः 2):
1. कपोताः (प्रथमा बहुवचन, क्योंकि 'बहवः' और क्रिया 'उत्पतन्ति' बहुवचन
में हैं)।
2. मातुः (षष्ठी
एकवचन - माता के चरणों में)।
3. पुष्पाणि (प्रथमा बहुवचन, नपुंसकलिङ्ग, 'ष्' के कारण 'ण')।
4. भवती (प्रथमा
एकवचन स्त्रीलिङ्ग, क्रिया 'गच्छति' एकवचन
है)।
5. विदुषाम् (षष्ठी बहुवचन - विद्वानों का सम्मान)।
6. अनेन ('बालकेन' में
पुल्लिङ्ग तृतीया एकवचन है, अतः
विशेषण 'इदम्' में
भी तृतीया एकवचन 'अनेन')।
7. रामेण ('सह' के योग में तृतीया एकवचन, 'र्' के कारण 'ण')।
8. फले (क्रिया
'पततः' द्विवचन
है,
अतः प्रथमा द्विवचन 'फले')।
9. अस्माकम् (षष्ठी बहुवचन - हमारा देश)।
10. मुनये ('यच्छति' देने के योग में चतुर्थी एकवचन)।
अभ्यासः
3:
रेखाङ्कितपदानि संशोध्य
वाक्यानि पुनः लिखत (अशुद्धि-संशोधनम्)—
1. सः बालेण सह क्रीडति। ------- शुद्धम्: सः बालेन सह क्रीडति।
('बाल' में र, ष, ऋ नहीं
है,
अतः 'ण' नहीं होगा)।
2. अहं द्वे फलाः खादामि। ------- शुद्धम्: अहं द्वे फले खादामि।
('फल' नपुंसकलिङ्ग
द्विवचन है)।
3. भवान् कुत्र गच्छसि? ------- शुद्धम्: भवान् कुत्र गच्छति? (या त्वम् कुत्र गच्छसि?
क्योंकि 'भवान्' के
साथ प्रथम पुरुष आता है)।
4. बालकाः नद्याः तरन्ति। ------- शुद्धम्: बालकाः नद्याम् तरन्ति।
(नदी में तैरते हैं -
अधिकरण में सप्तमी)।
5. कवयः कालिदासः श्रेष्ठः अस्ति। ------- शुद्धम्: कविषु (या
कवीनाम्) कालिदासः श्रेष्ठः अस्ति।
(बहुत में से एक को
श्रेष्ठ बताने में सप्तमी या षष्ठी बहुवचन होता है)।