'कारक एवं उपपद विभक्ति प्रकरणम्'
संस्कृत
वाक्य-रचना में शब्दों का क्रिया के साथ सीधा सम्बन्ध जोड़ने वाले तत्त्व को
'कारक' कहते हैं। 'कारक' शब्द
की व्युत्पत्ति 'कृ' धातु से 'ण्वुल्' (अक) प्रत्यय जुड़कर हुई है, जिसका शाब्दिक अर्थ है— 'करने वाला' या
'क्रिया को निष्पन्न करने वाला'। महर्षि पाणिनि के व्याकरण में कारक की परिभाषा देते हुए
कहा गया है—
"क्रियाजनकत्वं कारकत्वम्" अथवा "क्रियान्वयि कारकम्"
अर्थात्
वाक्य में जिसका क्रिया के साथ सीधा अन्वय (सम्बन्ध) होता है अथवा जो क्रिया की
सिद्धि में सहायक होता है, उसे
कारक कहते हैं।
1. संस्कृत में कारकों की संख्या एवं विभक्ति-व्यवस्था
संस्कृत
व्याकरण में विभक्तियाँ सात (7) होती हैं (प्रथमा से सप्तमी तक, तथा प्रथमा के अन्तर्गत ही सम्बोधन), परन्तु कारक केवल छह (6) ही माने जाते हैं। प्राचीन वैयाकरणों का प्रसिद्ध श्लोक है—
कर्त्ता कर्म च करणं च सम्प्रदानं तथैव च।
अपादानाधिकरणे इत्याहुः कारकाणि षट्॥
सात
विभक्तियों और छह कारकों का तुलनात्मक विवरण:
|
क्र.सं. |
विभक्तिः |
कारक का नाम |
कारक की परिभाषा (लक्षण) |
हिन्दी पहचान चिह्न |
|
1. |
प्रथमा |
कर्ता कारक |
क्रिया को स्वतन्त्र रूप से करने वाला (स्वतन्त्रः
कर्ता) |
ने (या चिह्न रहित) |
|
2. |
द्वितीया |
कर्म कारक |
कर्ता अपनी क्रिया द्वारा जिसे सबसे अधिक चाहता है (कर्तुरीप्सिततमं
कर्म) |
को |
|
3. |
तृतीया |
करण कारक |
क्रिया की सिद्धि में जो सबसे प्रमुख साधन हो (साधकतमं
करणम्) |
से, के द्वारा |
|
4. |
चतुर्थी |
सम्प्रदान कारक |
कर्ता जिसके लिए कुछ कार्य करता है या जिसे दान देता है |
के लिए, को |
|
5. |
पञ्चमी |
अपादान कारक |
जहाँ से कोई वस्तु अलग (पृथक्) होती है (ध्रुवमपायेऽपादानम्) |
से (अलग होने में) |
|
6. |
षष्ठी |
सम्बन्ध (अकारक) |
संज्ञा का संज्ञा से सम्बन्ध बताना (क्रिया से सीधा
सम्बन्ध नहीं) |
का, के, की, रा, रे, री |
|
7. |
सप्तमी |
अधिकरण कारक |
क्रिया के होने का आधार या स्थान (आधारोऽधिकरणम्) |
में, पर |
|
— |
सम्बोधनम् |
सम्बोधन (अकारक) |
किसी को पुकारने या सावधान करने के लिए (प्रथमा का ही
रूप) |
हे!, अरे!, भोः! |
महत्त्वपूर्ण
प्रश्न: 'षष्ठी
(सम्बन्ध)' और 'सम्बोधन' को कारक क्यों नहीं माना जाता?
एक
उदाहरण से समझें— "दशरथस्य पुत्रः रामः बाणेन लङ्कायां रावणाय क्रुध्यन् रथात्
रावणं हतवान्।"
यहाँ
'हतवान्' (मारा)
क्रिया से जुड़े प्रश्न पूछें:
- किसने मारा?
----
रामः
(कर्ता कारक)
- किसको मारा?
----
रावणम्
(कर्म कारक)
- किस साधन से
मारा? ----
बाणेन
(करण कारक)
- किसके लिए/किस
पर क्रोध करते हुए? ---- रावणाय (सम्प्रदान)
- कहाँ से (अलग
होकर) मारा? ----
रथात्
(अपादान कारक)
- कहाँ (किस स्थान
पर) मारा? ---- लङ्कायाम् (अधिकरण कारक)
- किन्तु
'दशरथस्य'
(दशरथ का) का 'हतवान्' (मारने की क्रिया) से कोई सीधा सम्बन्ध नहीं है!
दशरथ ने रावण को नहीं मारा;
'दशरथस्य'
का सम्बन्ध केवल 'पुत्रः रामः' (संज्ञा) से है। चूँकि सम्बन्ध और सम्बोधन का क्रिया
से सीधा अन्वय नहीं होता, इसलिए इन्हें कारक नहीं माना जाता,
यद्यपि इनमें क्रमशः षष्ठी और
प्रथमा विभक्ति लगती है।
2. विभक्ति के दो प्रकार: कारक विभक्ति एवं उपपद विभक्ति
संस्कृत
में शब्दों में लगने वाली विभक्तियाँ दो नियमों से निर्धारित होती हैं:
1. कारक विभक्ति: जब वाक्य में क्रिया के आधार पर या कारक-चिह्नों (ने, को, से, के लिए, में, पर) के आधार पर विभक्ति लगाई जाती है, तो उसे कारक विभक्ति कहते हैं। (जैसे— सः कलमेन लिखति में लिखने के साधन 'कलम' में
तृतीया विभक्ति)।
2. उपपद विभक्ति: जब वाक्य में किसी विशेष शब्द (अव्यय, संज्ञा, विशेषण
या विशेष धातु) के पास होने के कारण कोई निश्चित विभक्ति लगाई जाती है, तो उसे 'उपपद विभक्ति' कहते हैं। ('उप' = समीप
पठित,
'पद' = शब्द)।
o जैसे— सामान्य अर्थ में 'गाँव के चारों ओर' में 'के' चिह्न देखकर षष्ठी विभक्ति (ग्रामस्य) लगनी चाहिए थी, परन्तु 'परितः' (चारों ओर) उपपद होने के कारण यहाँ सदैव
द्वितीया विभक्ति (ग्रामं परितः) ही लगती है!
विशेष
व्याकरणिक नियम (उपपदविभक्तेः कारकविभक्तिर्बलीयासी):
यदि
किसी एक ही शब्द पर 'उपपद
विभक्ति'
और 'कारक
विभक्ति'
दोनों के नियम एक साथ लागू हो रहे हों, तो कारक विभक्ति अधिक बलवती (शक्तिशाली) होती है
और वही लगाई जाती है। जैसे— 'नमः' अव्यय के
योग में चतुर्थी विभक्ति होती है (गुरवे नमः), परन्तु जब 'नम्' या 'नमस्कृ' क्रिया
(धातु) का प्रयोग होता है, तो कर्म
कारक बलीयान होने से द्वितीया विभक्ति ही लगती है (अहं गुरुं नमस्करोमि / गुरुं नमामि)।
3. प्रथमा विभक्ति: कारक एवं उपपद नियम
(क) मुख्य सूत्र एवं नियम
1. प्रातिपदिकार्थलिङ्गपरिमाणवचनमात्रे प्रथमा:
किसी शब्द का केवल अर्थ बताने (जैसे— कृष्णः, श्रीः, ज्ञानम्), लिङ्ग बताने (तटः, तटी, तटम्), नाप-तौल बताने (द्रोणो व्रीहिः) और संख्या बताने (एकः, द्वौ, बहवः)
में प्रथमा विभक्ति होती है।
2. स्वतन्त्रः कर्ता / कर्तरि प्रथमा:
कर्तृवाच्य के वाक्य में क्रिया को करने वाले स्वतन्त्र
कर्ता में सदैव प्रथमा विभक्ति होती है।
o उदाहरण: रामः वेदं पठति। बालिकाः उद्याने क्रीडन्ति।
3. कर्मणि प्रथमा (कर्मवाच्य में): कर्मवाच्य के वाक्य में कर्म में प्रथमा विभक्ति होती है।
o उदाहरण: मया ग्रन्थः पठ्यते।
4. सम्बोधने च: किसी को सम्बोधित करने या पुकारने में प्रथमा विभक्ति ही
प्रयुक्त होती है।
o उदाहरण: हे बालक! त्वं कुत्र गच्छसि? भोः छात्राः! सावधानाः भवत।
(ख) प्रथमा उपपद विभक्ति
- 'इति'
और
'नाम'
अव्यय शब्दों के योग में संज्ञा
का परिचय देते समय प्रथमा विभक्ति
होती है:
1. अयोध्यायां दशरथः इति नृपः आसीत्। (अयोध्या में दशरथ नामक राजा था।)
2. पुरा रन्तिदेवः नाम दयालुः भूपतिः अभवत्। (प्राचीन काल में रन्तिदेव नाम का
दयालु राजा हुआ।)
4. द्वितीया विभक्ति: कर्म कारक एवं समस्त उपपद नियम
(क) मुख्य कारक सूत्र एवं नियम
1. कर्तुरीप्सिततमं कर्म / कर्मणि द्वितीया:
कर्ता अपनी क्रिया के द्वारा जिस वस्तु को सबसे अधिक
प्राप्त करना चाहता है, उसकी 'कर्म' संज्ञा
होती है और कर्म में द्वितीया विभक्ति लगती है।
o उदाहरण: भक्तः ईश्वरं भजति। छात्रः विद्यालयं गच्छति। सः जलं पिबति।
2. अधिशीङ्स्थासां कर्म (अति महत्त्वपूर्ण):
यदि शी (सोना), स्था (ठहरना/बैठना)
और आस् (बैठना) धातुओं से पहले 'अधि' उपसर्ग जुड़ जाए (अधिशेते, अधितिष्ठति, अध्यास्ते), तो इनके आधार में सप्तमी न होकर द्वितीया विभक्ति होती है!
o उदाहरण: विष्णुः वैकुण्ठम् अधिशेते। (विष्णु वैकुण्ठ में सोते हैं।)
o उदाहरण: नृपः सिंहासनम् अधितिष्ठति / अध्यास्ते। (राजा सिंहासन पर बैठता है।)
3. उपान्वध्याङ्वसः: यदि 'वस्' (रहना) धातु से पहले उप, अनु, अधि, या आङ् (आ) उपसर्ग लग जाए (उपवसति, अनुवसति, अधिवसति, आवसति), तो
रहने के स्थान (आधार) में सप्तमी के स्थान पर द्वितीया विभक्ति होती है!
o उदाहरण: सज्जनः ग्रामम् अधिवसति। (सज्जन गाँव में रहता है। — यदि उपसर्ग न हो तो:
ग्रामे वसति)।
4. कालाध्वनोरत्यन्तसंयोगे: जब कोई कार्य लगातार कुछ समय तक या कुछ दूरी तक बिना रुके
चलता रहे,
तो उस समयवाची (काल) और दूरीवाची (अध्वन्) शब्द में
द्वितीया विभक्ति
होती है।
o उदाहरण: सः मासम् व्याकरणं पठति। (वह महीने भर लगातार व्याकरण पढ़ता है।)
o उदाहरण: नदी क्रोशं कुटिला अस्ति। (नदी एक कोस तक टेढ़ी है।)
5. अकथितं च (16 द्विकर्मक धातुएँ): संस्कृत में 16 धातुएँ द्विकर्मक होती हैं जिनमें दो कर्मों में द्वितीया
विभक्ति लगती है—
·
दुह् (दुहना) — गोपालः गां दुग्धं दोग्धि।
(ग्वाला गाय से दूध दुहता है।)
·
याच् (माँगना) — भिक्षुकः नृपं धनं याचते।
(भिखारी राजा से धन माँगता है।)
·
पच् (पकाना) — पाचकः तण्डुलान्
ओदनं पचति। (रसोइया चावलों से भात पकाता है।)
·
दण्ड् (दण्ड देना) — नृपः चौरं शतं दण्डयति।
(राजा चोर पर सौ मुद्राओं का दण्ड लगाता है।)
·
रुध् (रोकना) — गोपालः व्रजं गां रुणद्धि।
(ग्वाला बाड़े में गाय को रोकता है।)
·
प्रच्छ् (पूछना) — शिष्यः गुरुं
प्रश्नं पृच्छति। (शिष्य गुरु से प्रश्न पूछता है।)
·
चि (चुनना) — मालाकारः
वृक्षं पुष्पाणि अवचिनोति। (माली वृक्ष से फूल चुनता है।)
·
ब्रू (बोलना) — गुरुः
शिष्यं धर्मं ब्रूते। (गुरु शिष्य को धर्म बताता है।)
·
शास् (उपदेश देना) — आचार्यः छात्रं सत्यं शास्ति।
(आचार्य छात्र को सत्य का उपदेश देता है।)
·
जि (जीतना) — नृपः शत्रुं राज्यं
जयति। (राजा शत्रु से राज्य जीतता है।)
·
मथ् (मथना) — माता दधि नवनीतं मथ्नाति।
(माता दही से मक्खन मथती है।)
·
मुष् (चुराना) — चौरः धनिकं धनं मुष्णाति।
(चोर धनी से धन चुराता है।)
·
नी (ले जाना) — कृषकः ग्रामम्
अजाम् नयति। (किसान गाँव में बकरी ले जाता है।)
·
हृ (हरण करना) — चौरः कृपणं धनं हरति।
(चोर कंजूस से धन हरता है।)
·
कृष् (खींचना) — कृषकः क्षेत्रं जलं
कर्षति। (किसान खेत में जल खींचता है।)
·
वह् (ढोना) — श्रमिकः
ग्रामं भारं वहति। (मजदूर गाँव में बोझ ढोता है।)
(ख) द्वितीया उपपद विभक्ति (समस्त शब्द एवं उदाहरण)
(सूत्र: - अभितःपरितःसमयानिकषाहाप्रतियोगेऽपि
तथा
उभसर्वतसोः कार्या
धिगुपर्यादिषु त्रिषु)
वाक्य
में निम्नलिखित शब्दों (उपपदों) के आने पर सम्बन्धित संज्ञा या सर्वनाम पद में
सदैव द्वितीया
विभक्ति लगती है:
|
क्र.सं. |
उपपद शब्दः |
हिन्दी अर्थ |
वाक्य में प्रयोग के सटीक उदाहरण (द्वितीया विभक्ति में) |
|
1. |
उभयतः |
दोनों ओर |
राजमार्गम् उभयतः वृक्षाः सन्ति। (सड़क के दोनों ओर पेड़ हैं।) नदीम् उभयतः हरिताः क्षेत्राः सन्ति। (नदी के दोनों ओर हरे खेत
हैं।) |
|
2. |
अभितः |
दोनों ओर / सामने |
आश्रमम् अभितः गावः चरन्ति। (आश्रम के दोनों ओर गायें चरती हैं।) |
|
3. |
परितः |
चारों ओर |
ग्रामं परितः वनानि सन्ति। (गाँव के चारों ओर वन हैं।) विद्यालयं परितः प्राचीरम् अस्ति। (विद्यालय के चारों ओर चारदीवारी
है।) |
|
4. |
सर्वतः |
सब ओर |
देवालयं सर्वतः भक्ताः तिष्ठन्ति। (मन्दिर के सब ओर भक्त खड़े
हैं।) पृथिवीं सर्वतः वायुः अस्ति। (पृथ्वी के सब ओर हवा है।) |
|
5. |
समया / निकषा |
समीप / पास |
नगरं समया / निकषा नदी वहति। (नगर के समीप नदी बहती है।) लङ्कां निकषा समुद्रः अस्ति। (लङ्का के पास समुद्र है।) |
|
6. |
प्रति |
की ओर / के प्रति |
छात्रः विद्यालयं प्रति गच्छति। (छात्र विद्यालय की ओर जाता है।) दीनं जनं प्रति दयाम् कुरु। (दीन व्यक्ति के प्रति दया करो।) |
|
7. |
अनु |
पीछे / के अनुसार |
रामम् अनु लक्ष्मणः वनम् अगच्छत्। (राम के पीछे लक्ष्मण वन
गया।) |
|
8. |
धिक् |
धिक्कार है! |
धिक् असत्यवादिनम्! (झूठ बोलने वाले को धिक्कार है!) धिक् देशद्रोहिणम्! (देशद्रोही को धिक्कार है!) |
|
9. |
हा |
हाय! (दुःख सूचक) |
हा दुर्जनम्! हा कृष्णाभक्तम्! (हाय दुर्जन! हाय कृष्ण के अभक्त!) |
|
10. |
विना |
के बिना |
परिश्रमं विना सफलता न मिलति। (परिश्रम के बिना सफलता नहीं मिलती।) ज्ञानं विना जीवनं व्यर्थम्। (नोट: 'विना' में द्वितीया, तृतीया, पञ्चमी तीनों लगती हैं) |
|
11. |
अन्तरा |
दो के बीच में |
त्वां मां च अन्तरा हरिः अस्ति। (तुम्हारे और मेरे बीच में हरि
हैं।) रामं श्यामं च अन्तरा मोहनः उपविशति। |
|
12. |
अन्तरेण |
के बिना / के विषय में |
धर्मम् अन्तरेण सुखं नास्ति। (धर्म के बिना सुख नहीं है।) |
|
13. |
उपरि-उपरि |
ठीक ऊपर (द्विरुक्ति) |
लोकम् उपरि-उपरि सूर्यः तपति। (केवल एक 'उपरि' हो तो षष्ठी लगती है!) |
|
14. |
अधोऽधः / अध्यधः |
ठीक नीचे / ठीक अन्दर |
भूमिम् अधोऽधः जलम् अस्ति। संसारम् अध्यधः ईश्वरः अस्ति। |
5. तृतीया विभक्ति: करण कारक एवं समस्त उपपद नियम
(क) मुख्य कारक सूत्र एवं नियम
1. साधकतमं करणम् / कर्तृकरणयोस्तृतीया:
क्रिया की सिद्धि में जो सबसे अधिक सहायक साधन होता है, उसे 'करण
कारक'
कहते हैं और उसमें तृतीया विभक्ति होती है। इसके अतिरिक्त
कर्मवाच्य और भाववाच्य के कर्ता (अनुक्त कर्ता) में भी तृतीया विभक्ति लगती है।
o उदाहरण (करण): वयं नेत्राभ्यां पश्यामः। बालकः कन्दुकेन क्रीडति। सः द्विचक्रिकया गच्छति।
o उदाहरण (कर्मवाच्य का कर्ता): रामेण बाणेन बाली हतः। बालिकया गीतं गीयते।
2. अपवर्गे तृतीया: जब लगातार समय या दूरी चलने के बाद कार्य पूर्ण हो जाए (फल की प्राप्ति हो जाए), तो समय और दूरी में द्वितीया न होकर तृतीया विभक्ति होती है।
o उदाहरण: सः मासेन व्याकरणम् अपठत्। (उसने एक महीने में व्याकरण पढ़कर समाप्त
कर लिया।)
3. हेतौ (कारण अर्थ में): जिस कारण या हेतु से कोई कार्य होता है, उसमें तृतीया विभक्ति होती है।
o उदाहरण: विद्या विनयेन शोभते। परिश्रमेण कार्यं सिध्यति। सः हर्षेण नृत्यति।
(ख) तृतीया उपपद विभक्ति (समस्त शब्द, सूत्र एवं उदाहरण)
वाक्य
में निम्नलिखित शब्दों या परिस्थितियों के होने पर सदैव तृतीया विभक्ति का प्रयोग किया जाता है:
|
क्र.सं. |
नियम / उपपद शब्दः |
हिन्दी अर्थ |
वाक्य में प्रयोग के सटीक उदाहरण (तृतीया विभक्ति में) |
|
1. |
सह, साकम्, समम्, सार्धम् (सूत्र: सहयुक्तेऽप्रधाने) |
के साथ |
पुत्रः पित्रा सह आपणं गच्छति। (पुत्र पिता के साथ बाजार जाता है।)
सीता रामेण साकं वनम् अगच्छत्। अहं मित्रैः समं/सार्धं क्रीडामि। |
|
2. |
येनाङ्गविकारः (अंग-विकार नियम) |
शरीर के जिस अंग में दोष/विकार हो |
सः भिक्षुकः नेत्रेण काणः अस्ति। (वह भिखारी एक आँख से काना है। —
दोनों आँखों से अंधा हो तो द्विवचन:
नेत्राभ्याम् अन्धः) वृद्धः कर्णाभ्यां बधिरः अस्ति। (बूढ़ा कानों से बहरा है।)
बालकः पादेन खञ्जः अस्ति। (लड़का पैर से लँगड़ा है।) सः पृष्ठेन कुब्जः (पीठ से कुबड़ा) तथा शिरसा खल्वाटः (सिर से गंजा) अस्ति। |
|
3. |
अलम् (निषेध अर्थ में) |
बस करो / मत करो |
अलं विवादेन! (विवाद मत करो!)
अलं कोलाहलेन! (शोर मत करो!) अलं चिन्तया / हसितेन! |
|
4. |
इत्थम्भूतलक्षणे (पहचान सूचक चिह्न) |
जिस चिह्न से किसी की पहचान हो |
सः जटाभिः तापसः प्रतीयते। (वह जटाओं से तपस्वी प्रतीत होता है।)
सः पुस्तकेन छात्रः ज्ञायते। (वह पुस्तक से छात्र जान पड़ता है।) |
|
5. |
किम् / कोऽर्थः / किं प्रयोजनम् / किं कार्यम् |
क्या लाभ / क्या प्रयोजन |
मूर्खेण पुत्रेण किम्? (मूर्ख पुत्र से क्या लाभ?)
अनीत्या अर्जितेन धनेन कोऽर्थः? (अनीति से कमाए धन से क्या लाभ?) |
|
6. |
हीनः / रहितः / शून्यः |
से रहित / बिना |
विद्यया हीनः नरः पशुतुल्यः भवति। (विद्या से हीन मनुष्य पशु समान
है।)
ज्ञानेन रहितः जनः आदरं न लभते। |
|
7. |
विना |
के बिना |
जलेन विना मीनाः न जीवन्ति। (जल के बिना मछलियाँ नहीं जीतीं।)
उद्यमेन विना कार्याणि न सिध्यन्ति। |
|
8. |
सदृशः / समः / तुल्यः |
के समान / बराबर |
रामेण सदृशः (या रामस्य सदृशः) नृपः नास्ति।
मात्रा समं (माता के समान) किमपि तीर्थं नास्ति। |
|
9. |
प्रकृत्यादिभ्यः (स्वभाव/नाम/जाति) |
स्वभाव से, नाम से, सुख से आदि |
सः प्रकृत्या / स्वभावेन साधुः अस्ति। (वह स्वभाव से सज्जन है।)
सः नाम्ना गोपालः, जात्या ब्राह्मणः च अस्ति। सः सुखेन जीवति। |
6. चतुर्थी विभक्ति: सम्प्रदान कारक एवं समस्त उपपद नियम
(क) मुख्य कारक सूत्र एवं नियम
1. कर्मणा यमभिप्रैति स सम्प्रदानम् / चतुर्थी सम्प्रदाने:
कर्ता अपने दान आदि कर्म द्वारा जिसे सन्तुष्ट करना चाहता
है (जिसे कोई वस्तु सदा के लिए दी जाती है) या जिसके लिए कोई कार्य किया जाता है, उसकी 'सम्प्रदान' संज्ञा होती है और उसमें चतुर्थी विभक्ति लगती है।
o उदाहरण: नृपः निर्धनाय वस्त्रं यच्छति। (राजा निर्धन को वस्त्र देता है।)
o उदाहरण: मेघाः परोपकाराय जलम् वर्षन्ति। (बादल परोपकार के लिए जल बरसाते हैं।)
2. तादर्थ्ये चतुर्थी वाच्या (प्रयोजन या तुमर्थ में):
जिस उद्देश्य या प्रयोजन के लिए कोई कार्य किया जाता है
(अर्थात् जहाँ 'तुमुन्' प्रत्यय का अर्थ छिपा हो, जैसे— पढ़ने के लिए = पठितुम् = पठनाय), वहाँ चतुर्थी विभक्ति होती है।
o उदाहरण: छात्राः अध्ययनाय (पठितुम्) विद्यालयं गच्छन्ति।
o उदाहरण: माता स्नानाय (स्नातुम्) नदीं गच्छति। मुक्तिये (मुक्तोः) हरिं भजति।
(ख) चतुर्थी उपपद विभक्ति (समस्त शब्द, धातुएँ एवं उदाहरण)
वाक्य
में निम्नलिखित अव्यय शब्दों या धातुओं का प्रयोग होने पर सम्बन्धित पद में सदैव
चतुर्थी विभक्ति
लगती है:
|
क्र.सं. |
उपपद शब्द / धातुः |
हिन्दी अर्थ |
वाक्य में प्रयोग के सटीक उदाहरण (चतुर्थी विभक्ति में) |
|
1. |
नमः (सूत्र: नमःस्वस्ति...) |
नमस्कार हो |
गणेशाय नमः। गुरवे नमः। सरस्वत्यै नमः। मातृभ्यः नमः।
(सावधानी: यदि 'नम्/प्रणम्' धातु हो, तो द्वितीया लगती है— सः गुरुं नमति) |
|
2. |
स्वस्ति |
कल्याण हो |
प्रजाभ्यः स्वस्ति। छात्रेभ्यः स्वस्ति। सर्वेभ्यः स्वस्ति। |
|
3. |
स्वाहा |
देवताओं को आहुति |
अग्नये स्वाहा। इन्द्राय स्वाहा। सूर्याय स्वाहा। |
|
4. |
स्वधा |
पितरों को तर्पण |
पितृभ्यः स्वधा। |
|
5. |
वषट् |
देव-हवि समर्पण |
इन्द्राय वषट्। पूष्णे वषट्। |
|
6. |
अलम् (पर्याप्त/समर्थ अर्थ में) |
के लिए पर्याप्त / समर्थ |
भीमः दुर्योधनाय अलम्। (भीम दुर्योधन के लिए पर्याप्त है।)
रामः रावणाय अलम्। मल्लः मल्लाय अलम्। |
|
7. |
रुच् (रोचते) / स्वद् (रुच्यर्थानां प्रीयमाणः) |
अच्छा लगना (जिसे अच्छा लगे) |
बालकाय मोदकं रोचते। (बालक को लड्डू अच्छा लगता है।)
मह्यं संस्कृतं रोचते। (मुझे संस्कृत अच्छी लगती है।) हरये भक्तिः रोचते। |
|
8. |
क्रुध्, द्रुह्, ईर्ष्य्, असूय् (क्रुधद्रुहेर्ष्या...) |
क्रोध, द्रोह, ईर्ष्या, निन्दा करना (जिस पर क्रोध किया जाए) |
स्वामी सेवकाय क्रुध्यति। (स्वामी नौकर पर क्रोध करता है।)
दुर्जनः सज्जनाय द्रुह्यति / ईर्ष्यति / असूयति।
(अपवाद: यदि क्रुध्/द्रुह् में उपसर्ग हो जैसे 'अभिक्रुध्यति', तो द्वितीया होती है) |
|
9. |
दा (यच्छति / ददाति) |
देना (जिसे दिया जाए) |
धनिकः याचकाय धनं ददाति। माता शिशवे दुग्धं यच्छति। |
|
10. |
कथ्, निवेद्, उपदिश् |
कहना, निवेदन, उपदेश देना |
शिष्यः गुरवे सत्यं कथयति / निवेदयति।
गुरुः शिष्येभ्यः धर्मम् उपदिशति। |
|
11. |
स्पृह् (स्पृहयति) (स्पृहेरीप्सितः) |
इच्छा करना / चाहना |
बालिका पुष्पेभ्यः स्पृहयति। (लड़की फूलों की इच्छा करती है।)
सज्जनः ज्ञानाय स्पृहयति। |
|
12. |
प्रति + श्रु / आ + श्रु |
वचन देना (प्रतिज्ञा करना) |
रामः विभीषणाय राज्यं प्रतिशृणोति। (राम विभीषण को राज्य का वचन देते हैं।) |
7. पञ्चमी विभक्ति: अपादान कारक एवं समस्त उपपद नियम
(क) मुख्य कारक सूत्र एवं नियम
1. ध्रुवमपायेऽपादानम् / अपादाने पञ्चमी: 'अपाय' का
अर्थ है विश्लेषण या अलग होना। जब कोई वस्तु किसी स्थिर (ध्रुव) स्थान से अलग होती
है,
तो उस स्थिर अवधिभूत कारक को 'अपादान' कहते हैं और उसमें पञ्चमी विभक्ति होती है।
o उदाहरण: वृक्षात् पत्राणि पतन्ति। (वृक्ष से पत्ते गिरते हैं।)
o उदाहरण: आकाशात् जलं पतति। अश्वात् सैनिकः अपतत्। छात्रः विद्यालयात् गृहम् आगच्छति।
(ख) पञ्चमी उपपद विभक्ति (समस्त शब्द, धातुएँ, सूत्र एवं उदाहरण)
वाक्य
में निम्नलिखित धातुओं या अव्यय पदों का प्रयोग होने पर सदैव पञ्चमी विभक्ति लगती है:
|
क्र.सं. |
नियम / उपपद / धातुः |
हिन्दी अर्थ |
वाक्य में प्रयोग के सटीक उदाहरण (पञ्चमी विभक्ति में) |
|
1. |
भी (बिभेति) एवं त्रै / रक्ष् (भीत्रार्थानां भयहेतुः) |
डरना एवं रक्षा करना (जिससे डरा/बचाया जाए) |
बालकः सिंहात् / सर्पात् बिभेति। (बालक शेर/साँप से डरता है।)
सज्जनः पापात् बिभेति।
सैनिकः शत्रोः (या शत्रुभ्यः) देशं रक्षति / त्रायते। |
|
2. |
बहिः |
के बाहर |
ग्रामात् बहिः उद्यानम् अस्ति। (गाँव के बाहर बगीचा है।)
कक्षायाः बहिः मा भ्रम। (कक्षा के बाहर मत घूमो।) |
|
3. |
प्र + भू (प्रभवति) / उद् + गम् (भुवः प्रभवः) |
उत्पन्न होना / निकलना (उद्गम स्थान में) |
गङ्गा हिमालयात् प्रभवति / निर्गच्छति। (गङ्गा हिमालय से निकलती है।) |
|
4. |
जन् (जायते) (जनिकर्तुः प्रकृतिः) |
जन्म लेना / पैदा होना (मूल कारण में) |
क्रोधात् सम्मोहः भवति, कामात् क्रोधः अभिजायते।
बीजात् अङ्कुरः जायते। (बीज से अंकुर उत्पन्न होता है।) |
|
5. |
आख्यातोपयोगे (नियमपूर्वक पढ़ना) |
जिससे नियमपूर्वक विद्या सीखी जाए |
छात्राः उपाध्यायात् / गुरोः / आचार्यात्
संस्कृतं पठन्ति / अधीते। |
|
6. |
प्रभृति / आरभ्य |
से लेकर |
सः बाल्यात् प्रभृति / आरभ्य अत्र वसति। (वह बचपन से लेकर यहाँ रहता है।) |
|
7. |
पूर्वम् / प्राक् |
से पहले |
भोजनात् पूर्वं हस्तौ प्रक्षालय। (भोजन से पहले हाथ धोओ।)
ग्रामात् प्राक् नदी वहति। |
|
8. |
परम् / अनन्तरम् / पश्चात् / ऊर्ध्वम् |
के बाद |
पठनात् अनन्तरं (परं) सः क्रीडति। (पढ़ने के बाद वह खेलता है।)
चैत्रात् परं वैशाखः आगच्छति। |
|
9. |
ऋते / विना |
के बिना |
ज्ञानात् ऋते (विना) मुक्तिः न भवति। परिश्रमात् ऋते विद्या न लभ्यते। |
|
10. |
पृथक् / नाना |
से अलग |
रामात् पृथक् सीता न अवसत्। (राम से अलग सीता नहीं रहीं।) |
|
11. |
प्रमाद्, विरम्, जुगुप्स् |
आलस्य, रुकना, घृणा करना |
सः धर्मात् / स्वाध्यायात् न प्रमाद्यति। पापात् जुगुप्सते / विरमति। |
|
12. |
दो में तुलना (तरप् प्रत्यय) (पञ्चमी विभक्ते) |
से श्रेष्ठ / से बढ़कर |
धनात् विद्या श्रेष्ठतरा अस्ति। रामात् श्यामः चतुरतरः अस्ति।
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गात् अपि गरीयसी। |
8. षष्ठी विभक्ति: सम्बन्ध एवं समस्त उपपद नियम
(क) मुख्य सूत्र एवं नियम
1. षष्ठी शेषे: कारक और प्रातिपदिकार्थ से भिन्न जो 'शेष' है—
अर्थात् एक संज्ञा/सर्वनाम का दूसरे संज्ञा पद से स्वामित्व, जन्य-जनक, अङ्ग-अङ्गी आदि सम्बन्ध बताने के लिए षष्ठी विभक्ति होती है।
o उदाहरण: इदं रामस्य पुस्तकम् अस्ति। वृक्षस्य शाखाः हरिताः सन्ति। गङ्गायाः जलं पवित्रम् अस्ति।
2. षष्ठी हेतुप्रयोगे: जब वाक्य में 'हेतु' (कारण)
शब्द का स्पष्ट प्रयोग किया जाए, तब
कारण और 'हेतु' दोनों
में षष्ठी विभक्ति होती है।
o उदाहरण: सः अन्नस्य हेतोः वसति। (वह अन्न के कारण रहता है।)
(ख) षष्ठी उपपद विभक्ति (समस्त दिशा, स्थान एवं काल सूचक शब्द)
वाक्य
में निम्नलिखित अव्यय या शब्दों का प्रयोग होने पर सम्बन्धित पद में सदैव
षष्ठी विभक्ति
लगती है:
|
क्र.सं. |
उपपद शब्दः |
हिन्दी अर्थ |
वाक्य में प्रयोग के सटीक उदाहरण (षष्ठी विभक्ति में) |
|
1. |
उपरि |
के ऊपर |
वृक्षस्य उपरि वानराः कूर्दन्ति। (वृक्ष के ऊपर बन्दर कूद रहे हैं।)
भवनस्य उपरि ध्वजः राजते। |
|
2. |
अधः / नीचेः |
के नीचे |
वृक्षस्य अधः पथिकाः विश्राम्यन्ति। (वृक्ष के नीचे यात्री विश्राम करते हैं।)
भूमेः अधः खनिजपदार्थाः सन्ति। |
|
3. |
पुरतः / अग्रे / समक्षम् |
के सामने / आगे |
विद्यालयस्य पुरतः क्रीडाक्षेत्रम् अस्ति। (विद्यालय के सामने खेल का मैदान है।)
गुरोः समक्षम् / अग्रे सत्यं वद। |
|
4. |
पृष्ठतः / पश्चात् |
के पीछे |
गृहस्य पृष्ठतः सुन्दरं उद्यानम् अस्ति। (घर के पीछे सुन्दर बगीचा है।)
रक्षकस्य पृष्ठतः चोरः धावति। |
|
5. |
वामतः |
के बाईं ओर |
देवालयस्य वामतः धर्मशाला अस्ति। (मन्दिर के बाईं ओर धर्मशाला है।) |
|
6. |
दक्षिणतः |
के दाईं ओर |
राजमार्गस्य दक्षिणतः आपणः अस्ति। (सड़क के दाईं ओर दुकान है।) |
|
7. |
अन्तः / मध्ये |
के अन्दर / बीच में |
कूपस्य अन्तः शीतलं जलम् अस्ति। (कुएँ के अन्दर ठण्डा पानी है।)
ग्रामस्य मध्ये सरोवरः अस्ति। |
|
8. |
समीपे / निकटे / पार्श्वे |
के पास / निकट |
नद्याः समीपे / तीरे आश्रमः अस्ति। (ध्यान दें: 'निकषा/समया' में द्वितीया होती है, पर 'समीपे/निकटे' में षष्ठी!) |
|
9. |
कृते / अर्थे |
के लिए |
माता बालकस्य कृते भोजनं पचति। (माता बालक के लिए भोजन पकाती है।) |
|
10. |
तुल्यः / सदृशः / समः |
के समान (तृतीया व षष्ठी दोनों) |
कर्णस्य (या कर्णेन) तुल्यः दानी कोऽपि नास्ति। |
|
11. |
अधीगर्थदयेशां कर्मणि |
स्मृ (दुःख से याद करना), दय् (दया), ईश् (स्वामी) |
शिशुः मातुः स्मरति। (बच्चा माँ को याद करता है।)
सज्जनः दीनानां दयते। |
|
12. |
निर्धारण (समूह में श्रेष्ठ) |
बहुतों में से एक की विशेषता बताना |
कवीनां (या कविषु) कालिदासः श्रेष्ठः।
छात्राणां मोहनः पटुतमः अस्ति। |
9. सप्तमी विभक्ति: अधिकरण कारक एवं समस्त उपपद नियम
(क) मुख्य कारक सूत्र एवं नियम
1. आधारोऽधिकरणम् / सप्तम्यधिकरणे च: कर्ता और कर्म के द्वारा की जाने वाली क्रिया का जो आधार
(स्थान या समय) होता है, उसकी 'अधिकरण' संज्ञा
होती है और उसमें सप्तमी विभक्ति लगती है।
o आधार के तीन भेद एवं उदाहरण:
1.
औपश्लेषिक
आधार (संयोग मूलक):
·
बालकः
आसन्दे (कुर्सी पर) उपविशति।
·
वृक्षे
खगाः वसन्ति।
2.
वैषयिक
आधार (विषय या रुचि मूलक):
·
मम
मोक्षे / संस्कृते
इच्छा अस्ति। (मेरी मोक्ष/संस्कृत में इच्छा है।)
3.
अभिव्यापक
आधार (सब जगह व्याप्त):
·
तिलेषु
तैलम् अस्ति। (तिलों में तेल है।)
·
दुग्धे
घृतम् अस्ति।
·
सर्वस्मिन्
आत्मा अस्ति।
2. यस्य च भावेन भावलक्षणम् (सति सप्तमी):
जब एक कार्य के होने पर दूसरा कार्य हो, तो पहले हो चुके कार्य के कर्ता और क्रिया दोनों में
सप्तमी विभक्ति
लगती है।
o उदाहरण: सूर्ये उदिते कमलं विकसति। (सूर्य के उगने पर कमल खिलता है।)
o उदाहरण: रामे वनं गते दशरथः प्राणान् अत्यजत्। (राम के वन जाने पर दशरथ ने प्राण
त्याग दिए।)
(ख) सप्तमी उपपद विभक्ति (समस्त शब्द, धातुएँ एवं उदाहरण)
वाक्य
में निम्नलिखित विशेषण शब्दों या धातुओं का प्रयोग होने पर सदैव
सप्तमी विभक्ति
लगती है:
|
क्र.सं. |
उपपद शब्द / धातुः |
हिन्दी अर्थ |
वाक्य में प्रयोग के सटीक उदाहरण (सप्तमी विभक्ति में) |
|
1. |
निपुणः, कुशलः, प्रवीणः, दक्षः, चतुरः, पटुः, पण्डितः |
चतुर / होशियार / कुशल |
अर्जुनः धनुर्विद्यायाम् निपुणः आसीत्। (अर्जुन धनुर्विद्या में निपुण था।)
एषा बालिका नृत्ये / गायने कुशला / प्रवीणा अस्ति।
सः संस्कृतभाषणे दक्षः / पटुः अस्ति। |
|
2. |
स्निह् (स्निह्यति) |
स्नेह / प्रेम करना |
माता पुत्रे / सुतायाम् अतीव स्निह्यति। (माता पुत्र/पुत्री से बहुत स्नेह करती
है।)
गुरुः शिष्येषु स्निह्यति। |
|
3. |
विश्वस् (विश्वसिति) |
विश्वास करना |
अहं स्वकीये मित्रे विश्वसिमि। (मैं अपने मित्र पर विश्वास करता हूँ।)
सठेषु (दुर्जनेषु) नैव विश्वसेत्। |
|
4. |
संलग्नः, तत्परः, रतः, आसक्तः, व्यापृतः |
लगा हुआ / मग्न |
छात्राः अध्ययने / स्वकार्ये संलग्नाः / तत्पराः सन्ति।
मुनयः ईश्वरभक्तौ रताः भवन्ति। |
|
5. |
श्रद्धा, आदरः, भक्तिः, अनुरागः, अभिलाषा, रुचिः |
श्रद्धा, आदर, प्रेम, रुचि होना |
मम पितरि महती श्रद्धा अस्ति। (मेरी पिता में बहुत श्रद्धा है।)
तस्य सङ्गीते / देशसेवायाम् अनुरागः / रुचिः अस्ति। |
|
6. |
क्षिप् (क्षिपति) / मुच् (मुञ्चति) |
फेंकना / बाण छोड़ना (लक्ष्य में सप्तमी) |
व्याधः मृगे बाणं क्षिपति / मुञ्चति। (शिकारी हिरण पर बाण चलाता है।) |
|
7. |
यतश्च निर्धारणम् (तमप् प्रत्यय / श्रेष्ठ) |
समूह में सबसे श्रेष्ठ (सप्तमी बहुवचन) |
नदीषु गङ्गा पवित्रतमा अस्ति। (नदियों में गङ्गा सबसे पवित्र
है।)
पर्वतेषु हिमालयः उच्चतमः। छात्रेषु रमेशः श्रेष्ठः अस्ति। |
10. परीक्षा हेतु विशेष 'भ्रम-निवारण सारणी' (तुलनात्मक अध्ययन)
कक्षा
परीक्षा में छात्र मिलते-जुलते अर्थ वाले शब्दों में अक्सर गलत विभक्ति लगा देते
हैं। इस तालिका को ध्यान से समझें:
|
क्र. |
भ्रम की स्थिति (समानार्थी शब्द) |
पहला नियम एवं उदाहरण |
दूसरा नियम एवं उदाहरण |
|
1. |
प्रणाम करना: 'नमः' बनाम 'नम्' धातु |
'नमः' (अव्यय) = चतुर्थी विभक्ति उदा: गुरवे नमः। जनकाय नमः। |
'नम् / प्रणम्' (धातु) = द्वितीया विभक्ति उदा: सः गुरुं नमति / प्रणमति। |
|
2. |
'अलम्' अव्यय के दो अर्थ |
निषेध (मत करो) = तृतीया विभक्ति उदा: अलं विवादेन। अलं
कोलाहलेन। |
पर्याप्त / समर्थ = चतुर्थी विभक्ति उदा: रामः रावणाय अलम्। |
|
3. |
दिशा/स्थान सूचक '-तः' वाले शब्द |
उभयतः, अभितः, परितः, सर्वतः = द्वितीया उदा: विद्यालयं परितः वृक्षाः सन्ति। |
पुरतः, पृष्ठतः, वामतः, दक्षिणतः = षष्ठी उदा: विद्यालयस्य पुरतः उद्यानम् अस्ति। |
|
4. |
'पास / समीप' अर्थ वाले शब्द |
समया, निकषा = द्वितीया विभक्ति उदा: ग्रामं निकषा नदी वहति। |
समीपे, निकटे, पार्श्वे = षष्ठी विभक्ति उदा: ग्रामस्य समीपे नदी वहति। |
|
5. |
'के लिए' अर्थ वाले शब्द |
चतुर्थी विभक्ति (सामान्य या दा धातु) उदा: बालकाय दुग्धम् आनय। |
'कृते' (उपपद) = षष्ठी विभक्ति उदा: बालकस्य कृते दुग्धम् आनय। |
|
6. |
'अन्दर' बनाम 'बाहर' |
अन्तः (अन्दर) = षष्ठी विभक्ति उदा: गृहस्य अन्तः माता अस्ति। |
बहिः (बाहर) = पञ्चमी विभक्ति उदा: गृहात् बहिः बालकः खेलति। |
|
7. |
'ऊपर / नीचे' (एक बार बनाम दो बार) |
उपरि, अधः (एक बार) = षष्ठी विभक्ति उदा: वृक्षस्य उपरि खगाः, अधः पथिकः। |
उपरि-उपरि, अधोऽधः (दो बार) = द्वितीया उदा: लोकम् उपरि-उपरि सूर्यः अस्ति। |
|
8. |
तुलना करना (तरप् बनाम तमप्) |
दो में तुलना (तरप्) = पञ्चमी एकवचन उदा: रामात् श्यामः पटुतरः अस्ति। |
बहुतों में श्रेष्ठ (तमप्) = सप्तमी/षष्ठी बहु. उदा: छात्रेषु / छात्राणां श्यामः पटुतमः। |
|
9. |
'विना' (बिना) का विशेष नियम |
द्वितीया, तृतीया और पञ्चमी तीनों शुद्ध हैं! उदा: ज्ञानं विना / ज्ञानेन विना / ज्ञानात् विना। |
'ऋते' (बिना) = केवल पञ्चमी विभक्ति! उदा: ज्ञानात् ऋते सुखं न लभ्यते। |
11. विस्तृत अभ्यास के प्रश्न (वर्णनात्मक अभ्यास - उत्तर सहित)
अभ्यासः
1:
रेखाङ्कितपदेषु प्रयुक्तं
विभक्तिं तत्कारणं च लिखत—
(रेखाङ्कित पदों में प्रयुक्त विभक्ति और उसका कारण लिखिए —
सीबीएसई बोर्ड पैटर्न)
1. विद्यालयं परितः वृक्षाः सन्ति।
2. बालकः कुक्कुरात् बिभेति।
3. पिता पुत्राय क्रुध्यति।
4. सीता रामेण सह वनम् अगच्छत्।
5. वृक्षस्य उपरि वानरः तिष्ठति।
6. सः बालकः कर्णेन बधिरः अस्ति।
7. अग्नये स्वाहा।
8. माता शिशौ स्निह्यति।
9. गृहात् बहिः उद्यानम् अस्ति।
10. कविषु कालिदासः श्रेष्ठः अस्ति।
उत्तराणि
(अभ्यासः 1):
1.
द्वितीया
विभक्तिः — 'परितः' अव्यय के योग में (परितः योगे द्वितीया)।
2.
पञ्चमी
विभक्तिः — 'भी' (बिभेति) धातु के योग में (भीत्रार्थानां भयहेतुः / भी
धातु योगे पञ्चमी)।
3.
चतुर्थी
विभक्तिः — 'क्रुध्' (क्रुध्यति) धातु के योग में (क्रुध् धातु योगे चतुर्थी)।
4.
तृतीया
विभक्तिः — 'सह' अव्यय के योग में (सह योगे तृतीया)।
5.
षष्ठी
विभक्तिः — 'उपरि' अव्यय के योग में (उपरि योगे षष्ठी)।
6.
तृतीया
विभक्तिः — अंग-विकार के योग में
(येनाङ्गविकारः)।
7.
चतुर्थी
विभक्तिः — 'स्वाहा' अव्यय के योग में (स्वाहा योगे चतुर्थी)।
8.
सप्तमी
विभक्तिः — 'स्निह्' (स्निह्यति) धातु के योग में (स्निह् धातु योगे सप्तमी)।
9.
पञ्चमी
विभक्तिः — 'बहिः' अव्यय के योग में (बहिः योगे पञ्चमी)।
10. सप्तमी विभक्तिः — निर्धारण
अर्थ में / 'श्रेष्ठः' के योग में (यतश्च निर्धारणम्)।
अभ्यासः
2:
कोष्ठके प्रदत्तशब्देषु
समुचितां विभक्तिं प्रयुज्य रिक्तस्थानानि पूरयत—
(कोष्ठक में दिए गए शब्दों में उचित विभक्ति लगाकर रिक्त
स्थान भरिए)
1. ....................
(गुरु) नमः।
2. अहं .................... (गुरु) नमामि।
3. अलं .................... (कोलाहल)! शान्तं तिष्ठत।
4. गङ्गा .................... (हिमालय) प्रभवति।
5. ....................
(नदी) उभयतः हरिताः वृक्षाः सन्ति।
6. ....................
(भोजन) पूर्वं हस्तौ प्रक्षालय।
7. मम मित्रं .................... (गणित) निपुणः अस्ति।
8. ....................
(देवालय) पुरतः भक्ताः तिष्ठन्ति।
9. ....................
(शिशु) मोदकं रोचते।
10. ....................
(परिश्रम) विना विद्या न लभ्यते।
उत्तराणि
(अभ्यासः 2):
1. गुरवे ('नमः' के योग में चतुर्थी एकवचन)।
2. गुरुम् ('नम्' धातु के
योग में कर्म कारक द्वितीया एकवचन)।
3. कोलाहलेन (निषेधार्थक 'अलम्' के
योग में तृतीया एकवचन)।
4. हिमालयात् ('प्रभवति' निकलने
के योग में पञ्चमी एकवचन)।
5. नदीम् ('उभयतः' के योग में द्वितीया एकवचन)।
6. भोजनात् ('पूर्वम्' के
योग में पञ्चमी एकवचन)।
7. गणिते ('निपुणः' के योग में सप्तमी एकवचन)।
8. देवालयस्य ('पुरतः' के
योग में षष्ठी एकवचन)।
9. शिशवे ('रोचते' अच्छा लगने के योग में चतुर्थी एकवचन)।
10. परिश्रमं / परिश्रमेण / परिश्रमात् ('विना' के
योग में द्वितीया, तृतीया
या पञ्चमी तीनों में से कोई भी एक रूप शुद्ध है)।
अभ्यासः
3:
अशुद्ध-रेखाङ्कितपदानि
संशोध्य वाक्यानि पुनः लिखत—
1.
पुत्री
माता सह आपणं गच्छति।
2.
ग्रामस्य
परितः क्षेत्राणि सन्ति।
3.
बालकः
सिंहेन बिभेति।
4.
पिता
पुत्रे क्रुध्यति।
5.
सः
नेत्रात् काणः अस्ति।
उत्तराणि
(अभ्यासः 3):
1.
पुत्री
माता सह आपणं गच्छति। ---- शुद्धम्: पुत्री मात्रा सह आपणं गच्छति। ('सह' योगे
तृतीया)।
2.
ग्रामस्य
परितः क्षेत्राणि सन्ति। ---- शुद्धम्:
ग्रामं परितः क्षेत्राणि सन्ति। ('परितः' योगे
द्वितीया)।
3.
बालकः
सिंहेन बिभेति। ---- शुद्धम्: बालकः सिंहात् बिभेति। ('भी' योगे पञ्चमी)।
4.
पिता
पुत्रे क्रुध्यति। ---- शुद्धम्: पिता पुत्राय क्रुध्यति। ('क्रुध्' योगे
चतुर्थी)।
5.
सः
नेत्रात् काणः अस्ति। ---- शुद्धम्: सः नेत्रेण काणः अस्ति। (अंगविकार में तृतीया)।