हिंदी व्याकरण में समास वह विषय है जिससे बोर्ड परीक्षा से लेकर CTET, TET, UPSSSC, KVS जैसी परीक्षाओं तक हर बार प्रश्न आते हैं। इस लेख में समास को बिल्कुल आसान उदाहरणों से शुरू करके छहों भेदों तक समझाया गया है। शुरू में पूर्व पद, उत्तर पद, प्रधान पद, विग्रह, अव्यय, उपमान-उपमेय जैसे कठिन शब्द अलग से आसान भाषा में समझाए गए हैं। हर भेद के साथ उसकी पहचान और ढेर सारे उदाहरण हैं, और अंत में 120 बहुविकल्पीय प्रश्न तीन स्तरों (40-40) में उत्तर और कारण सहित दिए गए हैं। परीक्षा दें (टेस्ट दें)
समास को आसान भाषा में समझें
रोज़ की बोलचाल में हम लंबी बात को छोटा करके बोलते हैं। “राजा का पुत्र” कहने की जगह हम राजपुत्र कह देते हैं, “रसोई के लिए घर” की जगह रसोईघर, और “माता और पिता” की जगह माता-पिता।
यानी दो या अधिक शब्दों को जोड़कर, बीच के छोटे शब्दों (का, के लिए, और आदि) को हटाकर एक नया छोटा शब्द बना लेना ही समास है। ‘समास’ शब्द का अर्थ ही है — संक्षेप (छोटा करना)।
| लंबा रूप | हटाया गया शब्द | छोटा रूप (समस्त पद) |
|---|---|---|
| राजा का पुत्र | का | राजपुत्र |
| रसोई के लिए घर | के लिए | रसोईघर |
| माता और पिता | और | माता-पिता |
| तीन लोकों का समूह | का समूह | त्रिलोक |
| नीला है जो कमल | है जो | नीलकमल |
| शक्ति के अनुसार | के अनुसार | यथाशक्ति |
परिभाषा: दो या दो से अधिक शब्दों (पदों) के मेल से, उनके बीच के विभक्ति-चिह्नों या योजक शब्दों का लोप करके, जो नया स्वतंत्र शब्द बनता है, उसे समास कहते हैं।
समास के कठिन शब्द — आसान भाषा में
समास पढ़ते समय कई ऐसे शब्द आते हैं जिनसे बच्चे अक्सर उलझ जाते हैं — पूर्व पद, उत्तर पद, प्रधान पद, विग्रह, अव्यय, उपमान आदि। आगे पढ़ने से पहले इन्हें एक-एक करके आसान उदाहरण से समझ लें। पूरे लेख में यही शब्द बार-बार आएँगे।
1. पद
व्याकरण में वाक्य में प्रयोग हुए शब्द को पद कहते हैं। समास में ‘पद’ का सीधा अर्थ समझें — शब्द।
2. समस्त पद (सामासिक पद)
समास से जो नया छोटा शब्द बनता है, उसे समस्त पद या सामासिक पद कहते हैं। ‘समस्त’ का अर्थ है — मिला हुआ।
उदाहरण: राजा का पुत्र → राजपुत्र। यहाँ ‘राजपुत्र’ समस्त पद है।
3. पूर्व पद और उत्तर पद
‘पूर्व’ का अर्थ है पहले वाला और ‘उत्तर’ का अर्थ है बाद वाला (यहाँ ‘उत्तर’ का अर्थ जवाब या उत्तर दिशा नहीं है)। समस्त पद में पहला शब्द पूर्व पद और दूसरा शब्द उत्तर पद होता है।
| समस्त पद | पूर्व पद (पहला शब्द) | उत्तर पद (दूसरा शब्द) |
|---|---|---|
| राजपुत्र | राज (राजा) | पुत्र |
| रसोईघर | रसोई | घर |
| माता-पिता | माता | पिता |
| त्रिलोक | त्रि (तीन) | लोक |
| यथाशक्ति | यथा | शक्ति |
| लंबोदर | लंबा | उदर |
याद रखने की तरकीब: रेलगाड़ी के इंजन और डिब्बे की तरह सोचें — आगे वाला पूर्व पद, पीछे वाला उत्तर पद।
4. प्रधान पद (मुख्य पद)
समस्त पद में जिस शब्द पर अर्थ का ज़ोर होता है, जिसके बारे में असल में बात हो रही होती है, वही प्रधान पद है। इसे पहचानने के लिए खुद से पूछें — “यह आख़िर है क्या?”
| समस्त पद | प्रश्न: “यह है क्या?” | उत्तर | प्रधान पद |
|---|---|---|---|
| रसोईघर | रसोईघर क्या है? | एक घर | उत्तर पद (घर) |
| राजपुत्र | राजपुत्र कौन है? | एक पुत्र | उत्तर पद (पुत्र) |
| प्रतिदिन | प्रतिदिन का भाव क्या है? | ‘हर’ (प्रति) — हर दिन | पूर्व पद (प्रति) |
| माता-पिता | माता-पिता कौन हैं? | माता भी और पिता भी | दोनों पद |
| लंबोदर | लंबोदर कौन है? | न लंबा, न उदर — गणेश | कोई नहीं (तीसरा अर्थ) |
यही ‘प्रधान पद’ समास का भेद तय करता है — इसलिए यह सबसे ज़रूरी शब्द है।
5. समास-विग्रह
‘विग्रह’ का अर्थ है — अलग करना। समस्त पद को तोड़कर उसका पूरा अर्थ फिर से लिखना समास-विग्रह है। विग्रह करते समय बीच के हटाए गए शब्द (का, के लिए, और, जिसका आदि) वापस लिखे जाते हैं।
उदाहरण: रसोईघर → रसोई के लिए घर; सप्ताह → सात दिनों का समूह।
विग्रह और विच्छेद में अंतर: समास में विग्रह होता है (रसोई के लिए घर), संधि में विच्छेद होता है (विद्या + आलय)। विच्छेद में बीच में ‘+’ लगता है, विग्रह में पूरे शब्द लिखे जाते हैं।
6. लोप
लोप का अर्थ है — गायब हो जाना / हट जाना। समास बनाते समय बीच के छोटे शब्द (का, के लिए, और) हट जाते हैं — इसी को कहते हैं कि उनका ‘लोप’ हो गया।
7. विभक्ति / कारक-चिह्न
शब्दों को आपस में जोड़ने वाले छोटे शब्द — ने, को, से, के लिए, का/की/के, में, पर — कारक-चिह्न या विभक्ति कहलाते हैं। तत्पुरुष समास में इन्हीं का लोप होता है, और जो चिह्न हटा हो, उसी के नाम पर तत्पुरुष का भेद बनता है।
| कारक | चिह्न | आसान अर्थ | तत्पुरुष उदाहरण |
|---|---|---|---|
| कर्म | को | जिस पर काम का असर पड़े | शरणागत — शरण को आया |
| करण | से, के द्वारा | जिस साधन से काम हो | हस्तलिखित — हाथ से लिखा |
| संप्रदान | के लिए | जिसके लिए काम हो | रसोईघर — रसोई के लिए घर |
| अपादान | से (अलग होना) | जिससे कोई अलग हो | पथभ्रष्ट — पथ से भटका |
| संबंध | का, की, के | किसी का किसी से रिश्ता | राजपुत्र — राजा का पुत्र |
| अधिकरण | में, पर | जगह या आधार | वनवास — वन में वास |
8. अव्यय
अव्यय वे शब्द हैं जो कभी नहीं बदलते — लिंग, वचन या काल बदलने पर भी इनका रूप वैसा ही रहता है। जैसे — यथा, प्रति, आ, भर, बिना, बे, नि। ‘अव्यय’ = अ (नहीं) + व्यय (खर्च/बदलाव) = जो न बदले।
उदाहरण: “लड़का प्रतिदिन आता है”, “लड़की प्रतिदिन आती है”, “लड़के प्रतिदिन आते हैं” — ‘प्रतिदिन’ नहीं बदला। इसलिए यह अव्ययीभाव समास है।
9. विशेषण और विशेष्य
विशेषण वह शब्द है जो किसी की विशेषता (रंग, आकार, गुण) बताए, और विशेष्य वह शब्द है जिसकी विशेषता बताई जाए।
उदाहरण: नीलकमल में ‘नीला’ विशेषण है (रंग बता रहा है) और ‘कमल’ विशेष्य है (जिसका रंग बताया)। ऐसे जोड़े कर्मधारय समास बनाते हैं।
10. उपमान और उपमेय
जब किसी चीज़ की तुलना किसी दूसरी सुंदर/प्रसिद्ध चीज़ से की जाए — तो जिससे तुलना की जाए वह उपमान, और जिसकी तुलना की जाए वह उपमेय होता है।
उदाहरण: चंद्रमुख = चंद्र के समान मुख। यहाँ मुख की तुलना हो रही है — वह उपमेय है; चंद्र से तुलना हो रही है — वह उपमान है।
याद रखने की तरकीब: उपमेय = मेरा (जिसकी बात हो रही है, जैसे मुख); उपमान = मानक (जिसे पैमाना माना, जैसे चंद्र)।
11. संख्यावाचक
जो शब्द गिनती बताए — एक, दो (द्वि), तीन (त्रि), चार (चतुः/चौ), पाँच (पंच), सात (सप्त), नौ (नव), सौ (शत) — वह संख्यावाचक है। ऐसा शब्द पहले आए और अर्थ ‘समूह’ का हो तो द्विगु समास होता है।
12. योजक चिह्न (-)
दो शब्दों के बीच लगी छोटी रेखा (-) को योजक चिह्न कहते हैं — यह ‘जोड़ने’ का काम करती है। द्वंद्व समास में यह अक्सर ‘और’ की जगह लगती है: माता-पिता, सुख-दुख। (पर ध्यान दें — घर-घर जैसे दोहराए शब्दों में यह द्वंद्व नहीं, अव्ययीभाव है।)
13. पुनरुक्त शब्द
जब एक ही शब्द दोबारा आए — घर-घर, गाँव-गाँव, रातोंरात, हाथोंहाथ — तो उसे पुनरुक्त (फिर से कहा गया) शब्द कहते हैं। ऐसे शब्द प्रायः अव्ययीभाव समास होते हैं।
14. नञ् (निषेध)
‘नञ्’ का अर्थ है ‘नहीं’ वाला भाव (निषेध)। जब शब्द से पहले अ, अन्, ना लगकर ‘नहीं’ का अर्थ दें — असभ्य (न सभ्य), अनपढ़ (न पढ़ा), नापसंद (न पसंद) — तो वह नञ् तत्पुरुष होता है।
15. अन्य पद (तीसरा अर्थ)
जब दोनों शब्द मिलकर न पहले शब्द की बात करें, न दूसरे की, बल्कि किसी तीसरे व्यक्ति/वस्तु का नाम बताएँ, तो उस तीसरे को अन्य पद कहते हैं। जैसे — दशानन (दस + आनन) न ‘दस’ है, न ‘मुँह’; इसका अर्थ है रावण। यही बहुव्रीहि समास है।
16. समासों के नाम का अर्थ
मज़ेदार बात यह है कि ज़्यादातर समासों के नाम खुद अपने ही समास के उदाहरण हैं:
| समास का नाम | शब्दों का अर्थ | कैसे याद रखें |
|---|---|---|
| अव्ययीभाव | अव्यय + भाव = अव्यय हो जाना | पूरा शब्द अव्यय बन जाता है |
| तत्पुरुष | तत् (उसका) + पुरुष = उसका पुरुष | ‘का’ छिपा है — खुद तत्पुरुष |
| द्विगु | द्वि (दो) + गु (गाय) = दो गायें | पहला पद संख्या — खुद द्विगु |
| द्वंद्व | द्वंद्व = जोड़ा | दो बराबर शब्दों का जोड़ा |
| बहुव्रीहि | बहु (बहुत) + व्रीहि (धान) = बहुत धान है जिसके पास (धनी व्यक्ति) | तीसरे अर्थ (धनी) की ओर — खुद बहुव्रीहि |
| कर्मधारय | विशेषता (गुण) धारण करने वाला | विशेषण-विशेष्य का मेल |
याद रखें: संधि में वर्णों का मेल होता है और विच्छेद में ‘+’ लगता है (विद्या + आलय)। समास में शब्दों का मेल होता है और विग्रह में बीच के शब्द वापस आ जाते हैं (विद्या के लिए आलय)। एक ही शब्द में दोनों हो सकते हैं।
समास के भेद
समास के छह भेद हैं। कौन-सा भेद है, यह इस बात से तय होता है कि समस्त पद में कौन-सा पद प्रधान (मुख्य) है:
| भेद | प्रधान पद | पहचान | उदाहरण |
|---|---|---|---|
| 1. अव्ययीभाव | पहला (पूर्व) पद | पहला पद अव्यय (यथा, प्रति, आ, भर, बे, नि आदि) | यथाशक्ति, प्रतिदिन |
| 2. तत्पुरुष | दूसरा (उत्तर) पद | विग्रह में कारक-चिह्न (को, से, के लिए, का, में) आता है | राजपुत्र, रसोईघर |
| 3. कर्मधारय | दूसरा (उत्तर) पद | विशेषण-विशेष्य या उपमान-उपमेय (‘है जो’, ‘के समान’, ‘रूपी’) | नीलकमल, चंद्रमुख |
| 4. द्विगु | दूसरा (उत्तर) पद | पहला पद संख्या, अर्थ ‘समूह’ | त्रिलोक, सप्ताह |
| 5. द्वंद्व | दोनों पद | बीच में ‘और / या’ छिपा, प्रायः योजक चिह्न (-) | माता-पिता, सुख-दुख |
| 6. बहुव्रीहि | कोई नहीं, तीसरा (अन्य) अर्थ | पूरा पद किसी और व्यक्ति/वस्तु का नाम बताता है | लंबोदर (गणेश), दशानन (रावण) |
याद रखने का आसान तरीका: पहला पद प्रधान → अव्ययीभाव; दूसरा पद प्रधान → तत्पुरुष (और उसी परिवार के कर्मधारय, द्विगु); दोनों प्रधान → द्वंद्व; कोई नहीं, तीसरा अर्थ → बहुव्रीहि।
1. अव्ययीभाव समास
जिस समास में पहला पद अव्यय हो और प्रधान हो, तथा पूरा समस्त पद वाक्य में अव्यय (क्रियाविशेषण) की तरह काम करे, उसे अव्ययीभाव समास कहते हैं।
पहचान: शब्द की शुरुआत यथा, प्रति, आ, भर, बे, नि, अनु, उप जैसे शब्दों से होती है, या एक ही शब्द दोहराया जाता है (घर-घर, रातोंरात)। वाक्य में यह ‘कैसे, कब, कहाँ’ का उत्तर देता है — “वह प्रतिदिन पढ़ता है।”
| समस्त पद | समास-विग्रह |
|---|---|
| यथाशक्ति | शक्ति के अनुसार |
| यथासंभव | जैसा संभव हो |
| यथाक्रम | क्रम के अनुसार |
| यथाविधि | विधि के अनुसार |
| यथासमय | समय के अनुसार |
| यथाशीघ्र | जितना शीघ्र हो |
| यथेष्ट | इष्ट के अनुसार |
| प्रतिदिन | प्रत्येक दिन |
| प्रतिवर्ष | प्रत्येक वर्ष |
| प्रतिक्षण | प्रत्येक क्षण |
| प्रतिमास | प्रत्येक मास |
| प्रत्येक | एक-एक |
| आजीवन | जीवन भर |
| आजन्म | जन्म से लेकर |
| आमरण | मरण तक |
| आसमुद्र | समुद्र तक |
| भरपेट | पेट भरकर |
| भरसक | शक्ति भर |
| बेखटके | बिना खटके के |
| बेशक | बिना शक के |
| बेकाम | बिना काम के |
| निडर | बिना डर के |
| निस्संदेह | बिना संदेह के |
| अनजाने | बिना जाने |
| बखूबी | खूबी के साथ |
| अनुरूप | रूप के योग्य |
| उपकूल | कूल (किनारे) के समीप |
| हाथोंहाथ | हाथ ही हाथ में |
| दिनोंदिन | दिन ही दिन में |
| रातोंरात | रात ही रात में |
| बीचोंबीच | ठीक बीच में |
| घर-घर | प्रत्येक घर |
| गाँव-गाँव | प्रत्येक गाँव |
| एकाएक | अचानक |
2. तत्पुरुष समास
जिस समास में दूसरा (उत्तर) पद प्रधान हो और दोनों पदों के बीच का कारक-चिह्न (को, से, के लिए, से अलग, का/की/के, में/पर) लुप्त हो, उसे तत्पुरुष समास कहते हैं।
पहचान: विग्रह करने पर बीच में कोई कारक-चिह्न आता है। जो कारक-चिह्न आए, उसी के नाम से तत्पुरुष का उपभेद होता है। (कर्ता और संबोधन कारक से तत्पुरुष नहीं बनता।)
| उपभेद | लुप्त चिह्न | उदाहरण |
|---|---|---|
| कर्म तत्पुरुष | को | शरणागत — शरण को आया हुआ |
| करण तत्पुरुष | से, के द्वारा | रेखांकित — रेखा से अंकित |
| संप्रदान तत्पुरुष | के लिए | रसोईघर — रसोई के लिए घर |
| अपादान तत्पुरुष | से (अलग होने का भाव) | पथभ्रष्ट — पथ से भ्रष्ट |
| संबंध तत्पुरुष | का, की, के | राजपुत्र — राजा का पुत्र |
| अधिकरण तत्पुरुष | में, पर | वनवास — वन में वास |
(क) कर्म तत्पुरुष (‘को’ का लोप)
| समस्त पद | समास-विग्रह |
|---|---|
| शरणागत | शरण को आया हुआ |
| स्वर्गप्राप्त | स्वर्ग को प्राप्त |
| यशप्राप्त | यश को प्राप्त |
| ग्रामगत | ग्राम को गया हुआ |
| गगनचुंबी | गगन को चूमने वाला |
| चिड़ीमार | चिड़ियों को मारने वाला |
| जेबकतरा | जेब को कतरने वाला |
| गिरहकट | गिरह को काटने वाला |
| मुँहतोड़ | मुँह को तोड़ने वाला |
| कठफोड़वा | काठ को फोड़ने वाला |
| माखनचोर | माखन को चुराने वाला |
| ग्रंथकार | ग्रंथ को करने (रचने) वाला |
| रथचालक | रथ को चलाने वाला |
| परलोकगमन | परलोक को गमन |
(ख) करण तत्पुरुष (‘से / के द्वारा’ का लोप)
| समस्त पद | समास-विग्रह |
|---|---|
| रेखांकित | रेखा से अंकित |
| तुलसीकृत | तुलसी द्वारा कृत |
| अकालपीड़ित | अकाल से पीड़ित |
| हस्तलिखित | हस्त (हाथ) से लिखित |
| मनमाना | मन से माना |
| रोगग्रस्त | रोग से ग्रस्त |
| भुखमरा | भूख से मरा |
| शोकाकुल | शोक से आकुल |
| प्रेमातुर | प्रेम से आतुर |
| करुणापूर्ण | करुणा से पूर्ण |
| मदांध | मद से अंधा |
| बाणाहत | बाण से आहत |
| ईश्वरप्रदत्त | ईश्वर द्वारा प्रदत्त |
| मुँहमाँगा | मुँह से माँगा |
(ग) संप्रदान तत्पुरुष (‘के लिए’ का लोप)
| समस्त पद | समास-विग्रह |
|---|---|
| रसोईघर | रसोई के लिए घर |
| देशभक्ति | देश के लिए भक्ति |
| विद्यालय | विद्या के लिए आलय |
| देवालय | देव के लिए आलय |
| गुरुदक्षिणा | गुरु के लिए दक्षिणा |
| हथकड़ी | हाथ के लिए कड़ी |
| सभाभवन | सभा के लिए भवन |
| यज्ञशाला | यज्ञ के लिए शाला |
| पाठशाला | पाठ के लिए शाला |
| प्रयोगशाला | प्रयोग के लिए शाला |
| डाकगाड़ी | डाक के लिए गाड़ी |
| मालगोदाम | माल के लिए गोदाम |
| युद्धभूमि | युद्ध के लिए भूमि |
| स्नानघर | स्नान के लिए घर |
| आरामकुर्सी | आराम के लिए कुर्सी |
| राहखर्च | राह के लिए खर्च |
(घ) अपादान तत्पुरुष (‘से’ — अलग होने के अर्थ में — का लोप)
| समस्त पद | समास-विग्रह |
|---|---|
| पथभ्रष्ट | पथ से भ्रष्ट |
| देशनिकाला | देश से निकाला |
| धनहीन | धन से हीन |
| गुणहीन | गुण से हीन |
| जलहीन | जल से हीन |
| जन्मांध | जन्म से अंधा |
| ऋणमुक्त | ऋण से मुक्त |
| पापमुक्त | पाप से मुक्त |
| रोगमुक्त | रोग से मुक्त |
| पदच्युत | पद से च्युत |
| धर्मविमुख | धर्म से विमुख |
| कर्तव्यविमुख | कर्तव्य से विमुख |
| जातिबहिष्कृत | जाति से बहिष्कृत |
करण और अपादान में अंतर: दोनों में ‘से’ आता है। ‘से’ साधन (जिसके द्वारा काम हुआ) बताए तो करण (हस्तलिखित — हाथ से लिखा); ‘से’ अलग होना बताए तो अपादान (पथभ्रष्ट — पथ से अलग हुआ)।
(ङ) संबंध तत्पुरुष (‘का, की, के’ का लोप)
| समस्त पद | समास-विग्रह |
|---|---|
| राजपुत्र | राजा का पुत्र |
| राजकुमार | राजा का कुमार |
| राजमहल | राजा का महल |
| राष्ट्रपति | राष्ट्र का पति |
| सेनापति | सेना का पति |
| लखपति | लाखों का पति |
| करोड़पति | करोड़ों का पति |
| गंगाजल | गंगा का जल |
| जलधारा | जल की धारा |
| पवनपुत्र | पवन का पुत्र |
| घुड़दौड़ | घोड़ों की दौड़ |
| पनचक्की | पानी की चक्की |
| अमचूर | आम का चूर्ण |
| मृगछौना | मृग का छौना |
| देवमूर्ति | देव की मूर्ति |
| सूर्योदय | सूर्य का उदय |
| चरित्रचित्रण | चरित्र का चित्रण |
| ग्रामोद्धार | ग्राम का उद्धार |
| देशवासी | देश का वासी |
| वीरकन्या | वीर की कन्या |
(च) अधिकरण तत्पुरुष (‘में, पर’ का लोप)
| समस्त पद | समास-विग्रह |
|---|---|
| वनवास | वन में वास |
| आपबीती | आप पर बीती |
| ध्यानमग्न | ध्यान में मग्न |
| जलमग्न | जल में मग्न |
| शोकमग्न | शोक में मग्न |
| कार्यकुशल | कार्य में कुशल |
| कलाप्रवीण | कला में प्रवीण |
| घुड़सवार | घोड़े पर सवार |
| आत्मविश्वास | आत्मा पर विश्वास |
| गृहप्रवेश | गृह में प्रवेश |
| दानवीर | दान में वीर |
| सिरदर्द | सिर में दर्द |
| नराधम | नरों में अधम |
| पुरुषोत्तम | पुरुषों में उत्तम |
| कविश्रेष्ठ | कवियों में श्रेष्ठ |
(छ) नञ् तत्पुरुष (निषेध का भाव)
जब पहला पद ‘अ’, ‘अन्’, ‘ना’ आदि निषेध (नहीं) का अर्थ दे, तो उसे नञ् तत्पुरुष कहते हैं।
| समस्त पद | समास-विग्रह |
|---|---|
| असभ्य | न सभ्य |
| असंभव | न संभव |
| अधर्म | न धर्म |
| अज्ञान | न ज्ञान |
| अन्याय | न न्याय |
| अनुचित | न उचित |
| अकर्म | न कर्म |
| अनाचार | न आचार |
| अनिच्छा | न इच्छा |
| अनभिज्ञ | न अभिज्ञ |
| अनपढ़ | न पढ़ा |
| नापसंद | न पसंद |
| नालायक | न लायक |
3. कर्मधारय समास
जिस समास में उत्तर पद प्रधान हो और दोनों पदों में विशेषण-विशेष्य (नीला-कमल) या उपमान-उपमेय (चंद्र जैसा मुख) का संबंध हो, उसे कर्मधारय समास कहते हैं।
पहचान: विग्रह में ‘है जो’, ‘के समान’ या ‘रूपी’ आता है।
(क) विशेषण-विशेष्य वाले
| समस्त पद | समास-विग्रह |
|---|---|
| नीलकमल | नीला है जो कमल |
| नीलगगन | नीला है जो गगन |
| पीतांबर | पीला है जो अंबर |
| श्वेतांबर | श्वेत है जो अंबर |
| महात्मा | महान है जो आत्मा |
| महापुरुष | महान है जो पुरुष |
| महाराज | महान है जो राजा |
| परमानंद | परम है जो आनंद |
| सज्जन | सत् (अच्छा) है जो जन |
| दुर्जन | दुष्ट है जो जन |
| सद्गुण | सत् है जो गुण |
| नवयुवक | नव है जो युवक |
| कालीमिर्च | काली है जो मिर्च |
| अधमरा | आधा है जो मरा |
| लालटोपी | लाल है जो टोपी |
(ख) उपमान-उपमेय वाले (‘के समान’ / ‘रूपी’)
| समस्त पद | समास-विग्रह |
|---|---|
| चंद्रमुख | चंद्र के समान मुख |
| मुखचंद्र | मुख रूपी चंद्र |
| कमलनयन | कमल के समान नयन |
| घनश्याम | घन के समान श्याम |
| प्राणप्रिय | प्राणों के समान प्रिय |
| चरणकमल | कमल के समान चरण |
| करकमल | कमल के समान कर |
| देहलता | देह रूपी लता |
| विद्याधन | विद्या रूपी धन |
| भवसागर | भव (संसार) रूपी सागर |
| क्रोधाग्नि | क्रोध रूपी अग्नि |
| ज्ञानदीप | ज्ञान रूपी दीप |
| वचनामृत | वचन रूपी अमृत |
4. द्विगु समास
जिस समास का पहला पद संख्यावाचक हो और पूरा पद किसी समूह का बोध कराए, उसे द्विगु समास कहते हैं।
पहचान: शुरुआत में संख्या (एक, दो, त्रि, चौ, पंच, सप्त, नव, शत आदि) और विग्रह में ‘का समूह’।
| समस्त पद | समास-विग्रह |
|---|---|
| त्रिलोक | तीन लोकों का समूह |
| त्रिभुवन | तीन भुवनों का समूह |
| त्रिफला | तीन फलों का समूह |
| त्रिवेणी | तीन वेणियों (नदियों) का समूह |
| त्रिकोण | तीन कोणों का समूह |
| चौराहा | चार राहों का समूह |
| चौमासा | चार मासों का समूह |
| चौपाई | चार पदों का समूह |
| चवन्नी | चार आनों का समूह |
| पंचवटी | पाँच वटों का समूह |
| पंचतत्व | पाँच तत्वों का समूह |
| पंचामृत | पाँच अमृतों का समूह |
| पंसेरी | पाँच सेरों का समूह |
| षट्कोण | छह कोणों का समूह |
| सप्ताह | सात दिनों का समूह |
| सप्तर्षि | सात ऋषियों का समूह |
| सतसई | सात सौ (दोहों) का समूह |
| अठन्नी | आठ आनों का समूह |
| अष्टाध्यायी | आठ अध्यायों का समूह |
| नवग्रह | नौ ग्रहों का समूह |
| नवरात्र | नौ रात्रियों का समूह |
| दोपहर | दो पहरों का समूह |
| शताब्दी | सौ अब्दों (वर्षों) का समूह |
| दशानन | दस आननों का समूह |
5. द्वंद्व समास
जिस समास में दोनों पद प्रधान हों और विग्रह करने पर बीच में ‘और’, ‘या’, ‘अथवा’ आए, उसे द्वंद्व समास कहते हैं।
पहचान: दोनों शब्दों के बीच प्रायः योजक चिह्न (-) होता है और दोनों शब्द बराबर महत्व के होते हैं — अक्सर जोड़े या विलोम।
| समस्त पद | समास-विग्रह |
|---|---|
| माता-पिता | माता और पिता |
| भाई-बहन | भाई और बहन |
| राधा-कृष्ण | राधा और कृष्ण |
| सीता-राम | सीता और राम |
| नर-नारी | नर और नारी |
| गंगा-यमुना | गंगा और यमुना |
| हरिहर | हरि और हर |
| दाल-रोटी | दाल और रोटी |
| अन्न-जल | अन्न और जल |
| घी-शक्कर | घी और शक्कर |
| हाथ-पैर | हाथ और पैर |
| रात-दिन | रात और दिन |
| सुख-दुख | सुख और दुख |
| पाप-पुण्य | पाप और पुण्य |
| ऊँच-नीच | ऊँच और नीच |
| जीवन-मरण | जीवन और मरण |
| राजा-रंक | राजा और रंक |
| भूख-प्यास | भूख और प्यास |
| लेन-देन | लेन और देन |
| आना-जाना | आना और जाना |
| देश-विदेश | देश और विदेश |
| अपना-पराया | अपना और पराया |
| यश-अपयश | यश और अपयश |
| छोटा-बड़ा | छोटा और बड़ा |
| भला-बुरा | भला या बुरा |
| धर्माधर्म | धर्म या अधर्म |
| थोड़ा-बहुत | थोड़ा या बहुत |
| लाभ-हानि | लाभ या हानि |
| खरा-खोटा | खरा या खोटा |
द्वंद्व के तीन रूप: (1) इतरेतर द्वंद्व — ‘और’ से जुड़े (माता-पिता); (2) वैकल्पिक द्वंद्व — ‘या’ से जुड़े (भला-बुरा, थोड़ा-बहुत); (3) समाहार द्वंद्व — दोनों मिलकर पूरे समूह का अर्थ दें (दाल-रोटी = भोजन, हाथ-पैर = शरीर के अंग)।
6. बहुव्रीहि समास
जिस समास में कोई भी पद प्रधान न हो, बल्कि दोनों पद मिलकर किसी तीसरे (अन्य) व्यक्ति या वस्तु की ओर संकेत करें, उसे बहुव्रीहि समास कहते हैं।
पहचान: विग्रह में ‘जिसका, जिसके, जिसकी, जो’ आता है और अंत में उस व्यक्ति का नाम लिखा जाता है — लंबोदर = लंबा है उदर जिसका, अर्थात् गणेश।
| समस्त पद | समास-विग्रह | अर्थ (कौन) |
|---|---|---|
| लंबोदर | लंबा है उदर जिसका | गणेश |
| गजानन | गज के समान आनन है जिसका | गणेश |
| एकदंत | एक है दाँत जिसका | गणेश |
| दशानन | दस हैं आनन जिसके | रावण |
| नीलकंठ | नीला है कंठ जिसका | शिव |
| त्रिलोचन | तीन हैं लोचन जिसके | शिव |
| त्रिनेत्र | तीन हैं नेत्र जिसके | शिव |
| चंद्रशेखर | चंद्र है शेखर (सिर) पर जिसके | शिव |
| मृत्युंजय | मृत्यु को जीत लिया है जिसने | शिव |
| शूलपाणि | शूल है पाणि में जिसके | शिव |
| पंचानन | पाँच हैं आनन जिसके | शिव |
| चक्रपाणि | चक्र है पाणि में जिसके | विष्णु |
| चतुर्भुज | चार हैं भुजाएँ जिसकी | विष्णु |
| पीतांबर | पीले हैं अंबर जिसके | श्रीकृष्ण |
| गिरिधर | गिरि को धारण करने वाला | श्रीकृष्ण |
| मुरलीधर | मुरली को धारण करने वाला | श्रीकृष्ण |
| घनश्याम | घन के समान श्याम है जो | श्रीकृष्ण |
| चतुरानन | चार हैं आनन जिसके | ब्रह्मा |
| वीणापाणि | वीणा है पाणि में जिसके | सरस्वती |
| हंसवाहिनी | हंस है वाहन जिसका | सरस्वती |
| षडानन | छह हैं आनन जिसके | कार्तिकेय |
| वज्रपाणि | वज्र है पाणि में जिसके | इंद्र |
| महावीर | महान है वीर जो | हनुमान |
| दिगंबर | दिशाएँ ही हैं अंबर जिसके | शिव / जैन मुनि |
| महादेव | देवों में महान है जो | शिव |
सबसे ज़्यादा उलझाने वाले शब्द
कुछ शब्द विग्रह के अनुसार दो अलग समासों में आते हैं। परीक्षा में प्रश्न के साथ दिया अर्थ या संदर्भ देखकर ही उत्तर चुनें।
कर्मधारय या बहुव्रीहि?
| शब्द | कर्मधारय (सामान्य अर्थ) | बहुव्रीहि (विशेष व्यक्ति) |
|---|---|---|
| नीलकंठ | नीला है जो कंठ | नीला है कंठ जिसका — शिव |
| पीतांबर | पीला है जो अंबर | पीले हैं अंबर जिसके — श्रीकृष्ण |
| घनश्याम | घन के समान श्याम | घन के समान श्याम है जो — श्रीकृष्ण |
| महादेव | महान है जो देव | देवों में महान है जो — शिव |
| कमलनयन | कमल के समान नयन | कमल के समान नयन हैं जिसके — विष्णु/राम |
द्विगु या बहुव्रीहि?
| शब्द | द्विगु (समूह) | बहुव्रीहि (विशेष व्यक्ति) |
|---|---|---|
| दशानन | दस आननों का समूह | दस हैं आनन जिसके — रावण |
| चतुर्भुज | चार भुजाओं का समूह (आकृति) | चार हैं भुजाएँ जिसकी — विष्णु |
| त्रिलोचन | तीन लोचनों का समूह | तीन हैं लोचन जिसके — शिव |
| पंचानन | पाँच आननों का समूह | पाँच हैं आनन जिसके — शिव |
सीधा नियम: विग्रह में किसी व्यक्ति/देवता का नाम आए (जिसका, जिसके…) तो बहुव्रीहि; केवल ‘है जो / के समान’ हो तो कर्मधारय; केवल ‘का समूह’ हो तो द्विगु।
आम गलतियाँ
| गलत समझ | सही बात |
|---|---|
| हर योजक चिह्न (-) वाला शब्द द्वंद्व है | नहीं — घर-घर, गाँव-गाँव (पुनरुक्त शब्द) अव्ययीभाव हैं। |
| जिसमें भी संख्या हो, वह द्विगु है | नहीं — दशानन (रावण), त्रिलोचन (शिव) अर्थ में बहुव्रीहि हैं। |
| ‘से’ आए तो हमेशा करण तत्पुरुष | अलग होने का भाव हो तो अपादान — पथभ्रष्ट, धनहीन। |
| विद्यालय में केवल संधि है | संधि (विद्या + आलय) भी है और संप्रदान तत्पुरुष समास (विद्या के लिए आलय) भी। |
बहुविकल्पीय प्रश्न — स्तर 1: आसान (कक्षा 6–8)
समास का भेद पहचानने और सीधा विग्रह चुनने वाले प्रश्न।
1. ‘समास’ शब्द का अर्थ है—
(क) अलगाव
(ख) विस्तार
(ग) संक्षेप
(घ) मेल
2. समास के कितने मुख्य भेद हैं?
(क) चार
(ख) पाँच
(ग) तीन
(घ) छह
3. ‘माता-पिता’ में कौन-सा समास है?
(क) अव्ययीभाव
(ख) द्वंद्व
(ग) कर्मधारय
(घ) तत्पुरुष
4. ‘राजपुत्र’ का सही समास-विग्रह है—
(क) राजा है जो पुत्र
(ख) राजा और पुत्र
(ग) राजा का पुत्र
(घ) राजा के लिए पुत्र
5. ‘त्रिलोक’ में कौन-सा समास है?
(क) बहुव्रीहि
(ख) द्विगु
(ग) द्वंद्व
(घ) कर्मधारय
6. ‘नीलकमल’ में कौन-सा समास है?
(क) द्वंद्व
(ख) अव्ययीभाव
(ग) कर्मधारय
(घ) बहुव्रीहि
7. ‘यथाशक्ति’ में कौन-सा समास है?
(क) तत्पुरुष
(ख) द्विगु
(ग) कर्मधारय
(घ) अव्ययीभाव
8. ‘दशानन’ (रावण के अर्थ में) में कौन-सा समास है?
(क) अव्ययीभाव
(ख) बहुव्रीहि
(ग) द्वंद्व
(घ) तत्पुरुष
9. ‘रसोईघर’ का सही समास-विग्रह है—
(क) रसोई का घर
(ख) रसोई और घर
(ग) रसोई के लिए घर
(घ) रसोई में घर
10. समास से बने नए शब्द को क्या कहते हैं?
(क) संधि पद
(ख) विग्रह
(ग) उपसर्ग
(घ) समस्त पद
11. समस्त पद को तोड़कर पूरा अर्थ लिखना कहलाता है—
(क) पद-परिचय
(ख) समास-विग्रह
(ग) संधि-विच्छेद
(घ) वर्ण-विच्छेद
12. ‘सुख-दुख’ में कौन-सा समास है?
(क) अव्ययीभाव
(ख) द्विगु
(ग) कर्मधारय
(घ) द्वंद्व
13. ‘प्रतिदिन’ में कौन-सा समास है?
(क) द्विगु
(ख) कर्मधारय
(ग) अव्ययीभाव
(घ) तत्पुरुष
14. ‘चौराहा’ में कौन-सा समास है?
(क) द्वंद्व
(ख) अव्ययीभाव
(ग) द्विगु
(घ) तत्पुरुष
15. ‘देशभक्ति’ का सही समास-विग्रह है—
(क) देश की भक्ति करने वाला
(ख) देश में भक्ति
(ग) देश और भक्ति
(घ) देश के लिए भक्ति
16. ‘महात्मा’ में कौन-सा समास है?
(क) कर्मधारय
(ख) द्विगु
(ग) द्वंद्व
(घ) अव्ययीभाव
17. ‘लंबोदर’ में कौन-सा समास है?
(क) बहुव्रीहि
(ख) अव्ययीभाव
(ग) द्वंद्व
(घ) द्विगु
18. ‘पाठशाला’ में कौन-सा समास है?
(क) अव्ययीभाव
(ख) तत्पुरुष
(ग) द्वंद्व
(घ) द्विगु
19. ‘रात-दिन’ में कौन-सा समास है?
(क) बहुव्रीहि
(ख) द्वंद्व
(ग) तत्पुरुष
(घ) द्विगु
20. ‘सप्ताह’ में कौन-सा समास है?
(क) अव्ययीभाव
(ख) कर्मधारय
(ग) द्वंद्व
(घ) द्विगु
21. ‘आजीवन’ में कौन-सा समास है?
(क) अव्ययीभाव
(ख) कर्मधारय
(ग) तत्पुरुष
(घ) द्विगु
22. ‘गंगाजल’ का सही समास-विग्रह है—
(क) गंगा के लिए जल
(ख) गंगा का जल
(ग) गंगा से जल
(घ) गंगा और जल
23. ‘नीलकंठ’ (शिव के अर्थ में) में कौन-सा समास है?
(क) अव्ययीभाव
(ख) द्विगु
(ग) द्वंद्व
(घ) बहुव्रीहि
24. ‘असभ्य’ में कौन-सा समास है?
(क) द्विगु
(ख) नञ् तत्पुरुष
(ग) बहुव्रीहि
(घ) द्वंद्व
25. ‘भाई-बहन’ में कौन-सा समास है?
(क) कर्मधारय
(ख) द्वंद्व
(ग) तत्पुरुष
(घ) द्विगु
26. ‘पंचवटी’ में कौन-सा समास है?
(क) कर्मधारय
(ख) द्वंद्व
(ग) तत्पुरुष
(घ) द्विगु
27. ‘सेनापति’ का सही समास-विग्रह है—
(क) सेना का पति
(ख) सेना के लिए पति
(ग) सेना है जो पति
(घ) सेना और पति
28. ‘चंद्रमुख’ का सही समास-विग्रह है—
(क) चंद्र के समान मुख
(ख) चंद्र और मुख
(ग) चंद्र का मुख
(घ) चंद्र में मुख
29. ‘यथासमय’ में कौन-सा समास है?
(क) कर्मधारय
(ख) तत्पुरुष
(ग) द्विगु
(घ) अव्ययीभाव
30. ‘हस्तलिखित’ का सही समास-विग्रह है—
(क) हस्त के लिए लिखित
(ख) हस्त से लिखित
(ग) हस्त और लिखित
(घ) हस्त में लिखित
31. ‘गजानन’ में कौन-सा समास है?
(क) अव्ययीभाव
(ख) द्वंद्व
(ग) द्विगु
(घ) बहुव्रीहि
32. द्वंद्व समास में विग्रह करने पर प्रायः कौन-सा शब्द आता है?
(क) और
(ख) के लिए
(ग) का
(घ) जिसका
33. ‘नवग्रह’ में कौन-सा समास है?
(क) कर्मधारय
(ख) द्वंद्व
(ग) द्विगु
(घ) अव्ययीभाव
34. ‘वनवास’ का सही समास-विग्रह है—
(क) वन का वास
(ख) वन और वास
(ग) वन में वास
(घ) वन के लिए वास
35. ‘अनपढ़’ में कौन-सा समास है?
(क) अव्ययीभाव
(ख) द्विगु
(ग) नञ् तत्पुरुष
(घ) द्वंद्व
36. ‘सज्जन’ में कौन-सा समास है?
(क) द्वंद्व
(ख) अव्ययीभाव
(ग) कर्मधारय
(घ) द्विगु
37. ‘पथभ्रष्ट’ का सही समास-विग्रह है—
(क) पथ से भ्रष्ट
(ख) पथ के लिए भ्रष्ट
(ग) पथ का भ्रष्ट
(घ) पथ और भ्रष्ट
38. ‘दाल-रोटी’ में कौन-सा समास है?
(क) बहुव्रीहि
(ख) द्विगु
(ग) अव्ययीभाव
(घ) द्वंद्व
39. ‘चक्रपाणि’ में कौन-सा समास है?
(क) बहुव्रीहि
(ख) द्वंद्व
(ग) द्विगु
(घ) अव्ययीभाव
40. ‘भरपेट’ में कौन-सा समास है?
(क) अव्ययीभाव
(ख) कर्मधारय
(ग) द्विगु
(घ) तत्पुरुष
इस स्तर के उत्तर और कारण लेख के अंत में ‘उत्तर कुंजी’ में दिए गए हैं — पहले ख़ुद हल करें, फिर मिलाएँ।
बहुविकल्पीय प्रश्न — स्तर 2: मध्यम (कक्षा 9–10, बोर्ड परीक्षा)
बोर्ड परीक्षा जैसे प्रश्न — तत्पुरुष के उपभेद, सही विग्रह और प्रधान पद की पहचान।
1. ‘शरणागत’ में तत्पुरुष का कौन-सा भेद है?
(क) कर्म तत्पुरुष
(ख) संप्रदान तत्पुरुष
(ग) करण तत्पुरुष
(घ) अपादान तत्पुरुष
2. ‘रेखांकित’ में तत्पुरुष का कौन-सा भेद है?
(क) कर्म तत्पुरुष
(ख) संबंध तत्पुरुष
(ग) करण तत्पुरुष
(घ) अपादान तत्पुरुष
3. ‘विद्यालय’ में तत्पुरुष का कौन-सा भेद है?
(क) अपादान तत्पुरुष
(ख) करण तत्पुरुष
(ग) संप्रदान तत्पुरुष
(घ) कर्म तत्पुरुष
4. ‘धनहीन’ में तत्पुरुष का कौन-सा भेद है?
(क) संबंध तत्पुरुष
(ख) अधिकरण तत्पुरुष
(ग) अपादान तत्पुरुष
(घ) करण तत्पुरुष
5. ‘राष्ट्रपति’ में तत्पुरुष का कौन-सा भेद है?
(क) संबंध तत्पुरुष
(ख) करण तत्पुरुष
(ग) संप्रदान तत्पुरुष
(घ) कर्म तत्पुरुष
6. ‘ध्यानमग्न’ में तत्पुरुष का कौन-सा भेद है?
(क) कर्म तत्पुरुष
(ख) करण तत्पुरुष
(ग) संप्रदान तत्पुरुष
(घ) अधिकरण तत्पुरुष
7. ‘गगनचुंबी’ का सही समास-विग्रह है—
(क) गगन को चूमने वाला
(ख) गगन से चूमने वाला
(ग) गगन में चुंबी
(घ) गगन और चुंबी
8. ‘जन्मांध’ का सही समास-विग्रह है—
(क) जन्म और अंधा
(ख) जन्म से अंधा
(ग) जन्म के लिए अंधा
(घ) जन्म का अंधा
9. ‘पीतांबर’ का सही समास-विग्रह है—
(क) पीला है जो अंबर
(ख) पीला और अंबर
(ग) पीले के लिए अंबर
(घ) पीले का अंबर
10. ‘घनश्याम’ का सही समास-विग्रह है—
(क) घन के समान श्याम
(ख) घन का श्याम
(ग) घन और श्याम
(घ) घन से श्याम
11. ‘त्रिभुवन’ का सही समास-विग्रह है—
(क) तीन भुवनों वाला
(ख) तीन है जो भुवन
(ग) तीन और भुवन
(घ) तीन भुवनों का समूह
12. ‘नर-नारी’ का सही समास-विग्रह है—
(क) नर की नारी
(ख) नर के लिए नारी
(ग) नर है जो नारी
(घ) नर और नारी
13. ‘यथाविधि’ का सही समास-विग्रह है—
(क) जैसी विधि वाला
(ख) विधि के अनुसार
(ग) विधि और यथा
(घ) विधि का पालन
14. ‘चतुर्भुज’ (विष्णु के अर्थ में) में कौन-सा समास है?
(क) द्वंद्व
(ख) तत्पुरुष
(ग) द्विगु
(घ) बहुव्रीहि
15. जिस समास में पहला पद प्रधान होता है, वह है—
(क) तत्पुरुष
(ख) द्वंद्व
(ग) बहुव्रीहि
(घ) अव्ययीभाव
16. जिस समास में दोनों पद प्रधान होते हैं, वह है—
(क) कर्मधारय
(ख) अव्ययीभाव
(ग) द्विगु
(घ) द्वंद्व
17. जिस समास में कोई भी पद प्रधान नहीं होता, वह है—
(क) द्विगु
(ख) तत्पुरुष
(ग) द्वंद्व
(घ) बहुव्रीहि
18. ‘क्रोधाग्नि’ का सही समास-विग्रह है—
(क) क्रोध रूपी अग्नि
(ख) क्रोध की अग्नि वाला
(ग) क्रोध से अग्नि
(घ) क्रोध और अग्नि
19. ‘नराधम’ का सही समास-विग्रह है—
(क) नरों में अधम
(ख) नर और अधम
(ग) नर के लिए अधम
(घ) नर का अधम
20. ‘अकालपीड़ित’ में तत्पुरुष का कौन-सा भेद है?
(क) अपादान तत्पुरुष
(ख) अधिकरण तत्पुरुष
(ग) करण तत्पुरुष
(घ) कर्म तत्पुरुष
21. ‘देशनिकाला’ में तत्पुरुष का कौन-सा भेद है?
(क) अपादान तत्पुरुष
(ख) संप्रदान तत्पुरुष
(ग) करण तत्पुरुष
(घ) संबंध तत्पुरुष
22. ‘घुड़सवार’ का सही समास-विग्रह है—
(क) घोड़े के लिए सवार
(ख) घोड़े पर सवार
(ग) घोड़े का सवार
(घ) घोड़ा और सवार
23. ‘शताब्दी’ में कौन-सा समास है?
(क) द्वंद्व
(ख) बहुव्रीहि
(ग) द्विगु
(घ) तत्पुरुष
24. ‘हरिहर’ का सही समास-विग्रह है—
(क) हर के लिए हरि
(ख) हरि और हर
(ग) हरि का हर
(घ) हरि है जो हर
25. ‘निडर’ में कौन-सा समास है?
(क) द्विगु
(ख) द्वंद्व
(ग) कर्मधारय
(घ) अव्ययीभाव
26. ‘भवसागर’ में कौन-सा समास है?
(क) अव्ययीभाव
(ख) कर्मधारय
(ग) द्विगु
(घ) द्वंद्व
27. ‘मृत्युंजय’ में कौन-सा समास है?
(क) द्विगु
(ख) बहुव्रीहि
(ग) अव्ययीभाव
(घ) द्वंद्व
28. ‘हथकड़ी’ का सही समास-विग्रह है—
(क) हाथ के लिए कड़ी
(ख) हाथ की कड़ी
(ग) हाथ और कड़ी
(घ) हाथ से कड़ी
29. ‘तुलसीकृत’ का सही समास-विग्रह है—
(क) तुलसी में कृत
(ख) तुलसी द्वारा कृत
(ग) तुलसी और कृत
(घ) तुलसी के लिए कृत
30. ‘माखनचोर’ में तत्पुरुष का कौन-सा भेद है?
(क) संबंध तत्पुरुष
(ख) कर्म तत्पुरुष
(ग) अपादान तत्पुरुष
(घ) करण तत्पुरुष
31. ‘ऋणमुक्त’ में तत्पुरुष का कौन-सा भेद है?
(क) अधिकरण तत्पुरुष
(ख) संप्रदान तत्पुरुष
(ग) अपादान तत्पुरुष
(घ) करण तत्पुरुष
32. ‘आपबीती’ का सही समास-विग्रह है—
(क) आप से बीती
(ख) आप और बीती
(ग) आप पर बीती
(घ) आप की बीती
33. ‘नवयुवक’ में कौन-सा समास है?
(क) द्विगु
(ख) कर्मधारय
(ग) अव्ययीभाव
(घ) द्वंद्व
34. ‘चौमासा’ में कौन-सा समास है?
(क) अव्ययीभाव
(ख) कर्मधारय
(ग) द्वंद्व
(घ) द्विगु
35. ‘अन्न-जल’ में कौन-सा समास है?
(क) अव्ययीभाव
(ख) द्विगु
(ग) द्वंद्व
(घ) तत्पुरुष
36. ‘वीणापाणि’ में बहुव्रीहि समास है। यह किसके लिए आता है?
(क) सरस्वती
(ख) लक्ष्मी
(ग) पार्वती
(घ) दुर्गा
37. ‘रातोंरात’ में कौन-सा समास है?
(क) द्वंद्व
(ख) तत्पुरुष
(ग) अव्ययीभाव
(घ) द्विगु
38. ‘अनुचित’ में कौन-सा समास है?
(क) कर्मधारय
(ख) अव्ययीभाव
(ग) द्वंद्व
(घ) नञ् तत्पुरुष
39. ‘पुरुषोत्तम’ में तत्पुरुष का कौन-सा भेद है?
(क) करण तत्पुरुष
(ख) अधिकरण तत्पुरुष
(ग) कर्म तत्पुरुष
(घ) संबंध तत्पुरुष
40. ‘कमलनयन’ का सही समास-विग्रह है—
(क) कमल और नयन
(ख) कमल के समान नयन
(ग) कमल का नयन
(घ) कमल में नयन
इस स्तर के उत्तर और कारण लेख के अंत में ‘उत्तर कुंजी’ में दिए गए हैं — पहले ख़ुद हल करें, फिर मिलाएँ।
बहुविकल्पीय प्रश्न — स्तर 3: कठिन (कक्षा 11–12, CTET/TET और प्रतियोगी परीक्षाएँ)
प्रतियोगी परीक्षाओं जैसे प्रश्न — कर्मधारय-बहुव्रीहि का भेद, ‘कौन-सा नहीं है’, सुमेलन और कथन-कारण।
1. ‘नीलकंठ’ में कर्मधारय समास कब माना जाएगा?
(क) जब अर्थ ‘नीला है जो कंठ’ हो
(ख) जब अर्थ ‘शिव’ हो
(ग) जब अर्थ ‘मोर’ हो
(घ) हर स्थिति में
2. ‘पीतांबर’ का बहुव्रीहि वाला विग्रह है—
(क) पीला है जो अंबर
(ख) पीले का अंबर
(ग) पीला और अंबर
(घ) पीले हैं अंबर जिसके (श्रीकृष्ण)
3. निम्नलिखित में से कौन-सा शब्द द्विगु नहीं है (दिए गए अर्थ में)?
(क) त्रिलोक
(ख) त्रिलोचन (शिव)
(ग) सप्ताह
(घ) नवरात्र
4. ‘दशानन’ का द्विगु वाला विग्रह है—
(क) दस और आनन
(ख) दस हैं आनन जिसके
(ग) दस आननों का समूह
(घ) दस है जो आनन
5. कौन-सा युग्म सही सुमेलित नहीं है?
(क) देशभक्ति — संप्रदान तत्पुरुष
(ख) यथाशक्ति — अव्ययीभाव
(ग) पथभ्रष्ट — करण तत्पुरुष
(घ) चक्रपाणि — बहुव्रीहि
6. ‘मनमाना’ में तत्पुरुष का कौन-सा भेद है?
(क) संबंध तत्पुरुष
(ख) करण तत्पुरुष
(ग) अपादान तत्पुरुष
(घ) अधिकरण तत्पुरुष
7. ‘घुड़दौड़’ में तत्पुरुष का कौन-सा भेद है?
(क) संप्रदान तत्पुरुष
(ख) कर्म तत्पुरुष
(ग) संबंध तत्पुरुष
(घ) अधिकरण तत्पुरुष
8. ‘कठफोड़वा’ का सही समास-विग्रह है—
(क) काठ का फोड़ा
(ख) काठ से फोड़ने वाला
(ग) काठ और फोड़वा
(घ) काठ को फोड़ने वाला
9. कर्मधारय और बहुव्रीहि में मुख्य अंतर क्या है?
(क) बहुव्रीहि में कोई अन्य (तीसरा) पद प्रधान होता है
(ख) दोनों में कोई अंतर नहीं
(ग) बहुव्रीहि में पहला पद संख्या होता है
(घ) कर्मधारय में दोनों पद प्रधान होते हैं
10. ‘प्राणप्रिय’ का सही समास-विग्रह है—
(क) प्राण और प्रिय
(ख) प्राण के लिए प्रिय
(ग) प्राणों के समान प्रिय
(घ) प्राण से प्रिय
11. ‘त्रिफला’ में कौन-सा समास है?
(क) बहुव्रीहि
(ख) द्वंद्व
(ग) कर्मधारय
(घ) द्विगु
12. ‘अधमरा’ में कौन-सा समास है?
(क) तत्पुरुष
(ख) कर्मधारय
(ग) अव्ययीभाव
(घ) द्विगु
13. निम्नलिखित में से किस शब्द में अव्ययीभाव समास है?
(क) हथकड़ी
(ख) हाथ-पैर
(ग) हाथोंहाथ
(घ) हस्तलिखित
14. निम्नलिखित में से किस शब्द में द्वंद्व समास है?
(क) धर्मशाला
(ख) धर्माधर्म
(ग) धर्मात्मा
(घ) धर्मविमुख
15. ‘धर्मविमुख’ में तत्पुरुष का कौन-सा भेद है?
(क) अपादान तत्पुरुष
(ख) संप्रदान तत्पुरुष
(ग) करण तत्पुरुष
(घ) संबंध तत्पुरुष
16. ‘गिरिधर’ में कौन-सा समास है?
(क) द्वंद्व
(ख) अव्ययीभाव
(ग) बहुव्रीहि
(घ) द्विगु
17. ‘सतसई’ का सही समास-विग्रह है—
(क) सात सौ (दोहों) का समूह
(ख) सात और सई
(ग) सात सौ है जो
(घ) सात सौ वाला कवि
18. ‘विद्याधन’ में कौन-सा समास है?
(क) अव्ययीभाव
(ख) कर्मधारय
(ग) द्विगु
(घ) द्वंद्व
19. ‘उपकूल’ में कौन-सा समास है?
(क) द्विगु
(ख) द्वंद्व
(ग) कर्मधारय
(घ) अव्ययीभाव
20. ‘कार्यकुशल’ में तत्पुरुष का कौन-सा भेद है?
(क) करण तत्पुरुष
(ख) संबंध तत्पुरुष
(ग) कर्म तत्पुरुष
(घ) अधिकरण तत्पुरुष
21. ‘देवालय’ शब्द के बारे में सही कथन है—
(क) इसमें द्वंद्व समास है
(ख) इसमें दीर्घ संधि और संप्रदान तत्पुरुष समास दोनों हैं
(ग) इसमें बहुव्रीहि समास है
(घ) इसमें केवल संधि है
22. ‘गुरुदक्षिणा’ में तत्पुरुष का कौन-सा भेद है?
(क) करण तत्पुरुष
(ख) कर्म तत्पुरुष
(ग) संबंध तत्पुरुष
(घ) संप्रदान तत्पुरुष
23. निम्नलिखित में से किस शब्द में नञ् तत्पुरुष है?
(क) अनुरूप
(ख) अनुचर
(ग) अनुकूल
(घ) अनभिज्ञ
24. ‘त्रिवेणी’ में कौन-सा समास है?
(क) द्वंद्व
(ख) अव्ययीभाव
(ग) द्विगु
(घ) बहुव्रीहि
25. ‘एकदंत’ (गणेश के अर्थ में) में कौन-सा समास है?
(क) कर्मधारय
(ख) द्विगु
(ग) द्वंद्व
(घ) बहुव्रीहि
26. ‘पंचामृत’ का सही समास-विग्रह है—
(क) पाँच है जो अमृत
(ख) पाँच और अमृत
(ग) पाँच अमृत हैं जिसके
(घ) पाँच अमृतों का समूह
27. ‘जलमग्न’ में तत्पुरुष का कौन-सा भेद है?
(क) संबंध तत्पुरुष
(ख) अधिकरण तत्पुरुष
(ग) अपादान तत्पुरुष
(घ) करण तत्पुरुष
28. ‘जेबकतरा’ में तत्पुरुष का कौन-सा भेद है?
(क) कर्म तत्पुरुष
(ख) अधिकरण तत्पुरुष
(ग) संबंध तत्पुरुष
(घ) करण तत्पुरुष
29. ‘लेन-देन’ में कौन-सा समास है?
(क) द्वंद्व
(ख) कर्मधारय
(ग) अव्ययीभाव
(घ) द्विगु
30. ‘चरणकमल’ का सही समास-विग्रह है—
(क) चरण का कमल
(ख) कमल के समान चरण
(ग) चरण में कमल
(घ) चरण और कमल
31. ‘भुखमरा’ का सही समास-विग्रह है—
(क) भूख के लिए मरा
(ख) भूख का मरा
(ग) भूख से मरा
(घ) भूख और मरा
32. ‘यथेष्ट’ में कौन-सा समास है?
(क) तत्पुरुष
(ख) अव्ययीभाव
(ग) कर्मधारय
(घ) द्वंद्व
33. ‘षडानन’ (कार्तिकेय के अर्थ में) में कौन-सा समास है?
(क) द्वंद्व
(ख) बहुव्रीहि
(ग) कर्मधारय
(घ) द्विगु
34. कौन-सा युग्म सही सुमेलित नहीं है?
(क) गृहप्रवेश — कर्म तत्पुरुष
(ख) महादेव (शिव) — बहुव्रीहि
(ग) पाप-पुण्य — द्वंद्व
(घ) नवरात्र — द्विगु
35. निम्नलिखित में से किस शब्द में बहुव्रीहि समास है?
(क) नीलगगन
(ख) राजहंस
(ग) गंगाजल
(घ) हंसवाहिनी
36. ‘दोपहर’ में कौन-सा समास है?
(क) अव्ययीभाव
(ख) द्विगु
(ग) बहुव्रीहि
(घ) द्वंद्व
37. कथन (A): ‘पीतांबर’ कर्मधारय भी हो सकता है और बहुव्रीहि भी।
कारण (R): बहुव्रीहि में समस्त पद किसी अन्य (तीसरे) अर्थ की ओर संकेत करता है।
(क) A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या करता है।
(ख) A और R दोनों सही हैं लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं करता।
(ग) A सही है, R गलत है।
(घ) A गलत है, R सही है।
38. कथन (A): ‘चौराहा’ में बहुव्रीहि समास है।
कारण (R): द्विगु में पहला पद संख्यावाचक होता है।
(क) A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या करता है।
(ख) A और R दोनों सही हैं लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं करता।
(ग) A सही है, R गलत है।
(घ) A गलत है, R सही है।
39. कथन (A): ‘माता-पिता’ में द्वंद्व समास है।
कारण (R): द्वंद्व में दोनों पद प्रधान होते हैं और विग्रह में ‘और’ आता है।
(क) A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या करता है।
(ख) A और R दोनों सही हैं लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं करता।
(ग) A सही है, R गलत है।
(घ) A गलत है, R सही है।
40. कथन (A): ‘प्रतिदिन’ में अव्ययीभाव समास है।
कारण (R): अव्ययीभाव में दोनों पद प्रधान होते हैं।
(क) A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या करता है।
(ख) A और R दोनों सही हैं लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं करता।
(ग) A सही है, R गलत है।
(घ) A गलत है, R सही है।
इस स्तर के उत्तर और कारण लेख के अंत में ‘उत्तर कुंजी’ में दिए गए हैं — पहले ख़ुद हल करें, फिर मिलाएँ।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न: समास किसे कहते हैं?
उत्तर: दो या अधिक शब्दों के बीच के चिह्नों का लोप करके बने नए छोटे शब्द को समास कहते हैं, जैसे — राजा का पुत्र = राजपुत्र।
प्रश्न: समास के कितने भेद हैं?
उत्तर: छह — अव्ययीभाव, तत्पुरुष, कर्मधारय, द्विगु, द्वंद्व और बहुव्रीहि।
प्रश्न: समास और संधि में क्या अंतर है?
उत्तर: संधि वर्णों का मेल है (विद्या + आलय), समास शब्दों का मेल है (विद्या के लिए आलय)।
प्रश्न: कर्मधारय और बहुव्रीहि में कैसे पहचानें?
उत्तर: कर्मधारय में दूसरा पद प्रधान होता है (नीला है जो कंठ), बहुव्रीहि में पूरा पद किसी तीसरे का नाम बताता है (नीला है कंठ जिसका — शिव)।
प्रश्न: द्विगु समास की पहचान क्या है?
उत्तर: पहला पद संख्या हो और विग्रह में ‘का समूह’ आए, जैसे — सप्ताह = सात दिनों का समूह।
उत्तर कुंजी (उत्तर और कारण)
स्तर 1: आसान (कक्षा 6–8)
1. (ग) — समास का अर्थ है छोटा करना (संक्षेप)।
2. (घ) — अव्ययीभाव, तत्पुरुष, कर्मधारय, द्विगु, द्वंद्व, बहुव्रीहि।
3. (ख) — माता और पिता — दोनों पद प्रधान।
4. (ग) — का का लोप — संबंध तत्पुरुष।
5. (ख) — तीन लोकों का समूह; पहला पद संख्या।
6. (ग) — नीला है जो कमल — विशेषण-विशेष्य।
7. (घ) — शक्ति के अनुसार; पहला पद ‘यथा’ अव्यय।
8. (ख) — दस हैं आनन जिसके — रावण (तीसरा अर्थ)।
9. (ग) — के लिए का लोप — संप्रदान तत्पुरुष।
10. (घ) — इसे समस्त पद या सामासिक पद कहते हैं।
11. (ख) — समास में विग्रह, संधि में विच्छेद।
12. (घ) — सुख और दुख।
13. (ग) — प्रत्येक दिन; पहला पद ‘प्रति’ अव्यय।
14. (ग) — चार राहों का समूह।
15. (घ) — संप्रदान तत्पुरुष।
16. (क) — महान है जो आत्मा।
17. (क) — लंबा है उदर जिसका — गणेश।
18. (ख) — पाठ के लिए शाला — संप्रदान तत्पुरुष।
19. (ख) — रात और दिन।
20. (घ) — सात दिनों का समूह।
21. (क) — जीवन भर; पहला पद ‘आ’।
22. (ख) — संबंध तत्पुरुष।
23. (घ) — नीला है कंठ जिसका — शिव।
24. (ख) — न सभ्य — निषेध का भाव।
25. (ख) — भाई और बहन।
26. (घ) — पाँच वटों का समूह।
27. (क) — संबंध तत्पुरुष।
28. (क) — उपमान-उपमेय — कर्मधारय।
29. (घ) — समय के अनुसार।
30. (ख) — से (साधन) — करण तत्पुरुष।
31. (घ) — गज के समान आनन है जिसका — गणेश।
32. (क) — माता-पिता = माता और पिता।
33. (ग) — नौ ग्रहों का समूह।
34. (ग) — अधिकरण तत्पुरुष।
35. (ग) — न पढ़ा — निषेध।
36. (ग) — सत् (अच्छा) है जो जन।
37. (क) — से (अलग होना) — अपादान तत्पुरुष।
38. (घ) — दाल और रोटी।
39. (क) — चक्र है पाणि में जिसके — विष्णु।
40. (क) — पेट भरकर; पहला पद ‘भर’।
स्तर 2: मध्यम (कक्षा 9–10, बोर्ड परीक्षा)
1. (क) — शरण को आया हुआ।
2. (ग) — रेखा से अंकित (साधन)।
3. (ग) — विद्या के लिए आलय।
4. (ग) — धन से हीन (अलग होना)।
5. (क) — राष्ट्र का पति।
6. (घ) — ध्यान में मग्न।
7. (क) — कर्म तत्पुरुष।
8. (ख) — अपादान तत्पुरुष।
9. (क) — कर्मधारय (सामान्य अर्थ में)।
10. (क) — उपमान-उपमेय — कर्मधारय (सामान्य अर्थ)।
11. (घ) — द्विगु।
12. (घ) — द्वंद्व।
13. (ख) — अव्ययीभाव।
14. (घ) — चार हैं भुजाएँ जिसकी — विष्णु।
15. (घ) — अव्ययीभाव में पूर्व पद प्रधान।
16. (घ) — द्वंद्व में दोनों पद प्रधान।
17. (घ) — बहुव्रीहि में अन्य (तीसरा) पद प्रधान।
18. (क) — कर्मधारय (रूपक)।
19. (क) — अधिकरण तत्पुरुष।
20. (ग) — अकाल से पीड़ित (कारण/साधन)।
21. (क) — देश से निकाला (अलग करना)।
22. (ख) — अधिकरण तत्पुरुष।
23. (ग) — सौ वर्षों का समूह।
24. (ख) — द्वंद्व।
25. (घ) — बिना डर के।
26. (ख) — भव रूपी सागर।
27. (ख) — मृत्यु को जीत लिया है जिसने — शिव।
28. (क) — संप्रदान तत्पुरुष।
29. (ख) — करण तत्पुरुष।
30. (ख) — माखन को चुराने वाला।
31. (ग) — ऋण से मुक्त (अलग होना)।
32. (ग) — अधिकरण तत्पुरुष।
33. (ख) — नव है जो युवक।
34. (घ) — चार मासों का समूह।
35. (ग) — अन्न और जल।
36. (क) — वीणा है पाणि में जिसके — सरस्वती।
37. (ग) — रात ही रात में; पुनरुक्त पद।
38. (घ) — न उचित।
39. (ख) — पुरुषों में उत्तम।
40. (ख) — कर्मधारय (सामान्य अर्थ)।
स्तर 3: कठिन (कक्षा 11–12, CTET/TET और प्रतियोगी परीक्षाएँ)
1. (क) — सामान्य अर्थ में कर्मधारय; विशेष व्यक्ति के अर्थ में बहुव्रीहि।
2. (घ) — अन्य (तीसरा) अर्थ — श्रीकृष्ण।
3. (ख) — त्रिलोचन — तीन हैं लोचन जिसके — बहुव्रीहि।
4. (ग) — केवल ‘का समूह’ — द्विगु।
5. (ग) — पथभ्रष्ट (पथ से भ्रष्ट) अपादान तत्पुरुष है।
6. (ख) — मन से माना।
7. (ग) — घोड़ों की दौड़।
8. (घ) — कर्म तत्पुरुष।
9. (क) — कर्मधारय में उत्तर पद प्रधान, बहुव्रीहि में अन्य पद।
10. (ग) — कर्मधारय (उपमान-उपमेय)।
11. (घ) — तीन फलों का समूह।
12. (ख) — आधा है जो मरा।
13. (ग) — हाथ ही हाथ में — पुनरुक्त, अव्यय की तरह।
14. (ख) — धर्म या अधर्म।
15. (क) — धर्म से विमुख।
16. (ग) — गिरि को धारण करने वाला — श्रीकृष्ण।
17. (क) — द्विगु।
18. (ख) — विद्या रूपी धन।
19. (घ) — कूल के समीप; ‘उप’ अव्यय।
20. (घ) — कार्य में कुशल।
21. (ख) — देव + आलय (संधि); देव के लिए आलय (समास)।
22. (घ) — गुरु के लिए दक्षिणा।
23. (घ) — न अभिज्ञ — निषेध।
24. (ग) — तीन वेणियों का समूह।
25. (घ) — एक है दाँत जिसका — गणेश।
26. (घ) — द्विगु।
27. (ख) — जल में मग्न।
28. (क) — जेब को कतरने वाला।
29. (क) — लेन और देन।
30. (ख) — कर्मधारय।
31. (ग) — करण तत्पुरुष।
32. (ख) — इष्ट के अनुसार।
33. (ख) — छह हैं आनन जिसके — कार्तिकेय।
34. (क) — गृहप्रवेश (गृह में प्रवेश) अधिकरण तत्पुरुष है।
35. (घ) — हंस है वाहन जिसका — सरस्वती।
36. (ख) — दो पहरों का समूह।
37. (क) — सामान्य अर्थ में कर्मधारय, श्रीकृष्ण के अर्थ में बहुव्रीहि — यही R बताता है।
38. (घ) — चौराहा द्विगु है, इसलिए A गलत; R सही।
39. (क) — R ही द्वंद्व की पहचान है।
40. (ग) — A सही; पर अव्ययीभाव में पहला पद प्रधान होता है, इसलिए R गलत।
