अलंकार हिंदी व्याकरण और काव्य का ऐसा विषय है जिसके प्रश्न कक्षा 6 से बोर्ड परीक्षा और CTET, TET, UPSSSC, KVS जैसी परीक्षाओं तक हर बार आते हैं। इस लेख में पहले अलंकार को आसान उदाहरण से समझाया गया है, फिर उपमेय, उपमान, वाचक शब्द जैसे कठिन शब्द अलग से समझाए गए हैं। उसके बाद हर अलंकार की परिभाषा, पहचान और कई उदाहरण हैं, फिर शायरी में अलंकार (ग़ालिब, मीर, ज़ौक़, इक़बाल), फ़िल्मी गीतों में अलंकार (आधिकारिक YouTube लिंक सहित), और अंत में 120 बहुविकल्पीय प्रश्न तीन स्तरों (40-40) में उत्तर और कारण सहित दिए गए हैं। परीक्षा दें (टेस्ट दें)
अलंकार को आसान भाषा में समझें
जैसे गहने (आभूषण) पहनने से व्यक्ति की सुंदरता बढ़ जाती है, वैसे ही कुछ खास शब्दों और अर्थों के प्रयोग से कविता या वाक्य की सुंदरता बढ़ जाती है। ‘अलंकार’ शब्द का अर्थ ही है — आभूषण (गहना)।
| सादा वाक्य | अलंकार वाला वाक्य | क्या बदला |
|---|---|---|
| चाँद की किरणें सुंदर हैं। | चारु चंद्र की चंचल किरणें… | ‘च’ बार-बार आने से सुनने में मधुरता |
| उसका मुख सुंदर है। | उसका मुख चंद्रमा के समान सुंदर है। | चंद्रमा से तुलना करके सुंदरता दिखाई |
| पेड़ हिल रहे हैं। | पेड़ सिर हिलाकर स्वागत कर रहे हैं। | पेड़ों को मनुष्य की तरह दिखाया |
परिभाषा: काव्य की शोभा बढ़ाने वाले शब्द और अर्थ के चमत्कारपूर्ण प्रयोग को अलंकार कहते हैं।
अलंकार के कठिन शब्द — आसान भाषा में
अलंकार पढ़ते समय कुछ शब्द बार-बार आते हैं। आगे बढ़ने से पहले इन्हें एक-एक करके समझ लें।
1. काव्य / पद्य
कविता को काव्य या पद्य कहते हैं। अलंकार मुख्य रूप से कविता में पहचाने जाते हैं, पर ये गद्य (सामान्य वाक्यों) में भी हो सकते हैं।
2. वर्ण और आवृत्ति
वर्ण = अक्षर (क, च, म आदि)। आवृत्ति = बार-बार आना। जैसे ‘चारु चंद्र की चंचल किरणें’ में ‘च’ वर्ण की आवृत्ति है।
3. शब्दालंकार और अर्थालंकार
जहाँ सुंदरता शब्द की आवाज़ या रूप से आए — वह शब्दालंकार। पहचान: उस शब्द की जगह उसका पर्यायवाची रख दें तो चमत्कार खत्म हो जाता है। जहाँ सुंदरता अर्थ से आए — वह अर्थालंकार। पहचान: पर्यायवाची रखने पर भी चमत्कार बना रहता है।
उदाहरण: ‘कनक कनक ते सौ गुनी’ में ‘कनक’ की जगह ‘सोना’ रख दें तो खेल खत्म — शब्दालंकार (यमक)। ‘मुख चंद्रमा के समान है’ में ‘चंद्रमा’ की जगह ‘शशि’ रख दें तो भी तुलना वैसी ही रहती है — अर्थालंकार (उपमा)।
4. उपमेय
जिसकी तुलना की जाए, जिसकी बात हो रही है — वह उपमेय है। ‘मुख चंद्रमा के समान सुंदर है’ में मुख उपमेय है। (याद रखें: उपमेय = मेरा, जिसकी बात हो रही है।)
5. उपमान
जिससे तुलना की जाए — प्रायः कोई प्रसिद्ध सुंदर चीज़ — वह उपमान है। ऊपर के उदाहरण में चंद्रमा उपमान है। (याद रखें: उपमान = मानक, जिसे पैमाना माना।)
6. साधारण धर्म
वह गुण जो उपमेय और उपमान दोनों में एक जैसा हो। ‘मुख चंद्रमा के समान सुंदर है’ में ‘सुंदर’ साधारण धर्म है — सुंदरता दोनों में है।
7. वाचक शब्द
तुलना बताने वाले जोड़ने वाले शब्द — सा, सी, से, सम, सरिस, समान, जैसा, ज्यों (उपमा में) और मानो, मनु, मनहुँ, जनु, जानो (उत्प्रेक्षा में)।
| वाक्य | उपमेय | उपमान | साधारण धर्म | वाचक |
|---|---|---|---|---|
| मुख चंद्रमा के समान सुंदर है। | मुख | चंद्रमा | सुंदर | के समान |
| पीपर पात सरिस मन डोला। | मन | पीपर पात (पीपल का पत्ता) | डोला | सरिस |
| हरिपद कोमल कमल से। | हरिपद | कमल | कोमल | से |
| सागर-सा गंभीर हृदय। | हृदय | सागर | गंभीर | सा |
8. आरोप और अभेद
आरोप = एक चीज़ पर दूसरी चीज़ को चढ़ा देना। अभेद = कोई अंतर न दिखाना। रूपक अलंकार में उपमेय को उपमान ही बना दिया जाता है — ‘चरण-कमल’ अर्थात् चरण ही कमल हैं।
9. संभावना
संभावना = ‘ऐसा लगता है मानो…’ वाली कल्पना। उत्प्रेक्षा अलंकार इसी पर टिका है — ‘मुख मानो चंद्रमा है’।
10. लोक-सीमा
लोक-सीमा = जो दुनिया में सच में संभव हो, उसकी हद। जब बात इस हद से बहुत बढ़ाकर कही जाए, तो अतिशयोक्ति अलंकार होता है।
11. जड़ और चेतन
चेतन = जिसमें जान हो (मनुष्य, पशु)। जड़ = जिसमें जान न हो (पेड़, नदी, बादल, हवा)। जड़ चीज़ों को चेतन मनुष्य की तरह हँसता-बोलता दिखाना मानवीकरण है।
12. प्रस्तुत और अप्रस्तुत
प्रस्तुत = जिसकी असल में बात करनी है। अप्रस्तुत = जिसके बहाने बात कही गई। अन्योक्ति में कवि अप्रस्तुत (भौंरा-कली) के बहाने प्रस्तुत (राजा-रानी) की बात कहता है।
13. काकु
काकु = बोलने का लहजा (आवाज़ का उतार-चढ़ाव)। एक ही वाक्य अलग लहजे में बोलने से उलटा अर्थ दे सकता है — ‘आप तो बड़े ईमानदार हैं!’ (व्यंग्य में)। यह वक्रोक्ति में आता है।
अलंकार के भेद
| भेद | चमत्कार किससे | मुख्य अलंकार |
|---|---|---|
| 1. शब्दालंकार | शब्द (ध्वनि, रूप) से | अनुप्रास, यमक, श्लेष, पुनरुक्ति प्रकाश, वक्रोक्ति |
| 2. अर्थालंकार | अर्थ से | उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, अतिशयोक्ति, मानवीकरण, संदेह, भ्रांतिमान, दृष्टांत, विरोधाभास, विभावना, अन्योक्ति |
| 3. उभयालंकार | शब्द और अर्थ दोनों से | जहाँ दोनों तरह के अलंकार साथ हों |
शब्दालंकार
1. अनुप्रास अलंकार
जहाँ एक ही वर्ण (अक्षर) बार-बार आए और इससे पंक्ति सुनने में मधुर लगे, वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है।
पहचान: पंक्ति के कई शब्द एक ही अक्षर से शुरू होते हैं या उनमें एक ही अक्षर बार-बार आता है।
| उदाहरण | अलंकार कैसे है |
|---|---|
| चारु चंद्र की चंचल किरणें, खेल रही हैं जल-थल में। | ‘च’ वर्ण की आवृत्ति |
| तरनि-तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाए। | ‘त’ वर्ण की आवृत्ति |
| कल कानन कुंडल मोरपखा उर पै बनमाल बिराजति है। | ‘क’ वर्ण की आवृत्ति |
| मुदित महीपति मंदिर आए। | ‘म’ वर्ण की आवृत्ति |
| बंदऊँ गुरु पद पदुम परागा। | ‘प’ वर्ण की आवृत्ति |
| रघुपति राघव राजा राम। | ‘र’ वर्ण की आवृत्ति |
| कोमल कलित कमल की कलियाँ। | ‘क’ और ‘ल’ की आवृत्ति |
| सुंदर सुखद सुहानी संध्या। | ‘स’ वर्ण की आवृत्ति |
| अनुप्रास के भेद | पहचान |
|---|---|
| छेकानुप्रास | कई वर्ण एक ही क्रम में केवल एक बार दोहराए जाएँ |
| वृत्यानुप्रास | एक या अनेक वर्ण अनेक बार दोहराए जाएँ (सबसे आम रूप) |
| अंत्यानुप्रास | पंक्तियों के अंत में तुक (एक जैसी ध्वनि) मिले |
| लाटानुप्रास | शब्द या वाक्यांश दोहराया जाए, अर्थ वही रहे पर अन्वय (जोड़) बदलने से तात्पर्य बदल जाए |
| श्रुत्यानुप्रास | एक ही उच्चारण-स्थान (जैसे दंत्य त, थ, द, ध) के वर्ण बार-बार आएँ |
2. यमक अलंकार
जहाँ एक ही शब्द दो या अधिक बार आए और हर बार उसका अर्थ अलग हो, वहाँ यमक अलंकार होता है।
पहचान: एक शब्द कम-से-कम दो बार, और दोनों जगह अलग अर्थ।
| उदाहरण | अलंकार कैसे है |
|---|---|
| कनक कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय। या खाए बौराए नर, वा पाए बौराय।। | पहला कनक = धतूरा, दूसरा कनक = सोना |
| माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर। कर का मनका डारि दे, मन का मनका फेर।। | मनका = माला का दाना; मन का = हृदय का |
| तीन बेर खाती थीं, वे तीन बेर खाती हैं। | पहला बेर = बार (समय), दूसरा बेर = बेर का फल |
| काली घटा का घमंड घटा। | पहला घटा = बादल, दूसरा घटा = कम हुआ |
| जेते तुम तारे, तेते नभ में न तारे हैं। | पहला तारे = उद्धार किए, दूसरा तारे = आकाश के तारे |
3. श्लेष अलंकार
जहाँ एक शब्द केवल एक बार आए, पर उसके एक से अधिक अर्थ निकलें और सभी अर्थ उस जगह ठीक बैठें, वहाँ श्लेष अलंकार होता है। ‘श्लेष’ का अर्थ है — चिपका हुआ (एक शब्द में कई अर्थ चिपके हैं)।
पहचान: शब्द एक बार, अर्थ अनेक।
| उदाहरण | अलंकार कैसे है |
|---|---|
| रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून। पानी गए न ऊबरै, मोती, मानुष, चून।। | अंतिम ‘पानी’ के तीन अर्थ — मोती के लिए चमक, मनुष्य के लिए इज़्ज़त, चूने के लिए जल |
| जो रहीम गति दीप की, कुल कपूत गति सोय। बारे उजियारो करै, बढ़े अँधेरो होय।। | बारे = जलाने पर / बचपन में; बढ़े = बुझने पर / बड़ा होने पर |
| चरन धरत चिंता करत, चितवत चारों ओर। सुबरन को खोजत फिरत, कवि, व्यभिचारी, चोर।। | सुबरन = कवि के लिए सुंदर वर्ण (शब्द), व्यभिचारी के लिए सुंदर रूप, चोर के लिए सोना |
| मंगन को देखि पट देत बार-बार है। | पट = वस्त्र (देना) और दरवाज़ा (बंद करना) |
यमक और श्लेष में अंतर: यमक में शब्द बार-बार आता है और हर बार अलग अर्थ देता है; श्लेष में शब्द एक बार आता है पर एक साथ कई अर्थ देता है।
4. पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार
जहाँ एक ही शब्द लगातार दोहराया जाए और अर्थ वही रहे, जिससे भाव में ज़ोर या सुंदरता आए, वहाँ पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार होता है।
| उदाहरण | अलंकार कैसे है |
|---|---|
| धीरे-धीरे चल रही थी ठंडी-ठंडी हवा। | ‘धीरे’ और ‘ठंडी’ दोहराए गए, अर्थ वही |
| घर-घर में दीप जले। | ‘घर’ दोहराया, अर्थ — हर घर |
| जहाँ-जहाँ पग पड़े संतन के, तहाँ-तहाँ बंटाढार। | ‘जहाँ’ और ‘तहाँ’ दोहराए गए |
| मीठी-मीठी बातें करके उसने सबका मन जीत लिया। | ‘मीठी’ दोहराया गया |
यमक और पुनरुक्ति प्रकाश में अंतर: दोनों में शब्द दोहराता है, पर यमक में अर्थ बदलता है और पुनरुक्ति प्रकाश में अर्थ वही रहता है।
5. वक्रोक्ति अलंकार
जहाँ बोलने वाले की बात का सुनने वाला जान-बूझकर दूसरा अर्थ निकाल ले — किसी शब्द के दूसरे अर्थ (श्लेष वक्रोक्ति) से या बोलने के लहजे (काकु वक्रोक्ति) से — वहाँ वक्रोक्ति अलंकार होता है। ‘वक्र + उक्ति’ = टेढ़ी बात।
| उदाहरण | अलंकार कैसे है |
|---|---|
| को तुम? हैं घनश्याम हम। तो बरसो कित जाय। | श्रीकृष्ण ने ‘घनश्याम’ (अपना नाम) कहा, सुनने वाली ने ‘घन’ = बादल समझकर कहा — तो जाकर कहीं बरसो। (श्लेष वक्रोक्ति) |
| आप तो बड़े ईमानदार हैं! | व्यंग्य के लहजे में बोलने पर अर्थ उलटा — बेईमान। (काकु वक्रोक्ति) |
अर्थालंकार
1. उपमा अलंकार
जहाँ किसी व्यक्ति या वस्तु (उपमेय) की तुलना किसी दूसरी प्रसिद्ध वस्तु (उपमान) से उनके किसी समान गुण के आधार पर की जाए, वहाँ उपमा अलंकार होता है।
पहचान: वाक्य में सा, सी, से, सम, सरिस, समान, जैसा, ज्यों जैसे वाचक शब्द। उपमा के चार अंग होते हैं — उपमेय, उपमान, साधारण धर्म, वाचक शब्द। चारों हों तो पूर्णोपमा, कोई अंग छूटा हो तो लुप्तोपमा।
| उदाहरण | अलंकार कैसे है |
|---|---|
| पीपर पात सरिस मन डोला। | मन (उपमेय) की तुलना पीपल के पत्ते (उपमान) से; डोला — धर्म; सरिस — वाचक |
| हरिपद कोमल कमल से। | हरिपद की तुलना कमल से; कोमल — धर्म; से — वाचक (पूर्णोपमा) |
| मुख चंद्रमा के समान सुंदर है। | मुख की तुलना चंद्रमा से |
| सागर-सा गंभीर हृदय। | हृदय की तुलना सागर से; गंभीर — धर्म |
| उसका मन दर्पण-सा साफ़ है। | मन की तुलना दर्पण से |
| बालक फूल-सा कोमल है। | बालक की तुलना फूल से |
| उसका शरीर लोहे जैसा मज़बूत है। | शरीर की तुलना लोहे से |
2. रूपक अलंकार
जहाँ उपमेय और उपमान में कोई अंतर न दिखाया जाए (अभेद), बल्कि उपमेय को ही उपमान बना दिया जाए, वहाँ रूपक अलंकार होता है।
पहचान: कोई वाचक शब्द (सा, समान) नहीं; प्रायः योजक चिह्न (-) या ‘रूपी’ शब्द — चरण-कमल, राम-रतन।
| उदाहरण | अलंकार कैसे है |
|---|---|
| चरण-कमल बंदौं हरि राई। | चरणों को ही कमल मान लिया |
| मैया मैं तो चंद्र-खिलौना लैहौं। | चंद्रमा को ही खिलौना मान लिया |
| पायो जी मैंने राम रतन धन पायो। | राम-नाम को ही रत्न-धन मान लिया |
| उदित उदयगिरि मंच पर, रघुबर बाल पतंग। | उदयगिरि को मंच और श्रीराम को बाल-सूर्य (पतंग) मान लिया |
| राम-नाम मनि-दीप धरु, जीह देहरीं द्वार। | राम-नाम को मणि-दीप मान लिया |
| भव-सागर से पार करो प्रभु। | संसार को ही सागर मान लिया |
| दुख-रजनी बीती, सुख-प्रभात आया। | दुख को रात और सुख को सुबह मान लिया |
3. उत्प्रेक्षा अलंकार
जहाँ उपमेय में उपमान की संभावना या कल्पना की जाए — ‘ऐसा लगता है मानो…’ — वहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार होता है।
पहचान: वाचक शब्द मानो, मानहुँ, मनु, मनहुँ, जनु, जानो।
| उदाहरण | अलंकार कैसे है |
|---|---|
| सोहत ओढ़े पीत पट, स्याम सलोने गात। मनहुँ नीलमनि सैल पर, आतप परयौ प्रभात।। | पीले वस्त्र ओढ़े साँवले श्रीकृष्ण ऐसे लगते हैं मानो नीलम के पर्वत पर सुबह की धूप पड़ी हो |
| उसका मुख मानो चंद्रमा है। | ‘मानो’ से मुख में चंद्रमा की संभावना |
| पेड़ झुके हुए हैं, मानो स्वागत कर रहे हों। | झुके पेड़ों में स्वागत की कल्पना |
| सिर पर सफ़ेद पगड़ी ऐसी लगती है मानो बर्फ़ जमी हो। | पगड़ी में बर्फ़ की संभावना |
| उसकी हँसी मानो झरना बह रहा हो। | हँसी में झरने की संभावना |
उपमा, रूपक और उत्प्रेक्षा एक साथ समझें:
मुख चंद्रमा के समान है — उपमा (तुलना)
मुख ही चंद्रमा है / मुख-चंद्र — रूपक (अभेद)
मुख मानो चंद्रमा है — उत्प्रेक्षा (संभावना)
4. अतिशयोक्ति अलंकार
जहाँ किसी बात को लोक-सीमा से बहुत बढ़ा-चढ़ाकर कहा जाए, वहाँ अतिशयोक्ति अलंकार होता है। (अतिशय = बहुत अधिक, उक्ति = कथन)
| उदाहरण | अलंकार कैसे है |
|---|---|
| हनूमान की पूँछ में, लगन न पाई आग। लंका सिगरी जल गई, गए निसाचर भाग।। | आग लगने से पहले ही लंका जल गई — असंभव बात |
| आँसुओं की नदी बह गई। | आँसुओं से नदी बनना असंभव |
| वह इतना ऊँचा है कि आसमान छू ले। | ऊँचाई को बहुत बढ़ाकर कहा |
| वह इतना दुबला है कि हवा उसे उड़ा ले जाए। | दुबलेपन को बढ़ाकर कहा |
5. मानवीकरण अलंकार
जहाँ जड़ प्रकृति (पेड़, नदी, बादल, हवा, सूरज आदि) को मनुष्य की तरह बोलते, हँसते, रोते, सोचते या काम करते दिखाया जाए, वहाँ मानवीकरण अलंकार होता है।
| उदाहरण | अलंकार कैसे है |
|---|---|
| फूल हँस रहे हैं। | फूलों को हँसता दिखाया |
| पेड़ सिर हिलाकर स्वागत कर रहे हैं। | पेड़ों को स्वागत करता दिखाया |
| नदी गीत गाती हुई बह रही है। | नदी को गाता दिखाया |
| सूरज ने आँखें खोलीं और धरती को जगाया। | सूरज को आँखें खोलता, जगाता दिखाया |
| बादल ने धरती को गले लगा लिया। | बादल को गले लगाता दिखाया |
| चाँद ने खिड़की से झाँककर देखा। | चाँद को झाँकता दिखाया |
| हवाएँ गुनगुनाती हैं, कलियाँ मुस्कुराती हैं। | हवा और कलियों को मनुष्य की तरह दिखाया |
6. संदेह अलंकार
जहाँ समानता के कारण यह तय न हो पाए कि यह उपमेय है या उपमान — मन में दुविधा बनी रहे — वहाँ संदेह अलंकार होता है।
| उदाहरण | अलंकार कैसे है |
|---|---|
| सारी बीच नारी है कि नारी बीच सारी है। सारी ही की नारी है कि नारी ही की सारी है।। | साड़ी और नारी में तय नहीं हो पा रहा |
| यह मुख है या चंद्रमा? | मुख और चंद्रमा में दुविधा |
7. भ्रांतिमान अलंकार
जहाँ समानता के कारण उपमेय को उपमान ही समझ लिया जाए (भ्रम हो जाए) और उसी के अनुसार काम भी किया जाए, वहाँ भ्रांतिमान अलंकार होता है।
| उदाहरण | अलंकार कैसे है |
|---|---|
| पाँय महावर दैन को, नाइन बैठी आय। फिरि-फिरि जानि महावरी, एड़ी मीड़त जाय।। | नाइन लाल एड़ी को ही महावर समझकर बार-बार रगड़ती है |
| रस्सी को साँप समझकर वह डरकर भागा। | रस्सी को साँप समझ लिया |
संदेह और भ्रांतिमान में अंतर: संदेह में मन दुविधा में रहता है (यह है या वह?); भ्रांतिमान में एक चीज़ को पक्का दूसरी चीज़ समझ लिया जाता है।
8. दृष्टांत अलंकार
जहाँ एक बात कहकर उसे समझाने के लिए उससे मिलती-जुलती दूसरी बात उदाहरण के रूप में रखी जाए (दोनों वाक्य अलग-अलग, बिंब-प्रतिबिंब की तरह), वहाँ दृष्टांत अलंकार होता है।
| उदाहरण | अलंकार कैसे है |
|---|---|
| करत-करत अभ्यास के, जड़मति होत सुजान। रसरी आवत जात ते, सिल पर परत निसान।। | अभ्यास से मूर्ख भी ज्ञानी — जैसे रस्सी के बार-बार आने-जाने से पत्थर पर निशान |
9. विरोधाभास अलंकार
जहाँ बात में विरोध दिखाई दे, पर गहराई से सोचने पर विरोध न रहे, वहाँ विरोधाभास अलंकार होता है। (विरोध + आभास = विरोध जैसा लगना)
| उदाहरण | अलंकार कैसे है |
|---|---|
| या अनुरागी चित्त की, गति समुझै नहिं कोय। ज्यों-ज्यों बूड़ै स्याम रँग, त्यों-त्यों उज्जलु होय।। | काले रंग में डूबकर उजला होना — विरोध लगता है, पर अर्थ है कृष्ण-भक्ति में डूबकर मन निर्मल होता है |
10. विभावना अलंकार
जहाँ कारण के बिना ही कार्य होता दिखाया जाए, वहाँ विभावना अलंकार होता है।
| उदाहरण | अलंकार कैसे है |
|---|---|
| बिनु पद चलै सुनै बिनु काना। कर बिनु करम करै बिधि नाना।। | पैर बिना चलना, कान बिना सुनना, हाथ बिना काम करना — ईश्वर का वर्णन |
11. अन्योक्ति अलंकार
जहाँ बात किसी और (अप्रस्तुत) के बहाने कही जाए, पर असल में किसी दूसरे (प्रस्तुत) को समझाना हो, वहाँ अन्योक्ति अलंकार होता है।
| उदाहरण | अलंकार कैसे है |
|---|---|
| नहिं पराग नहिं मधुर मधु, नहिं विकास इहि काल। अली कली ही सौं बँध्यो, आगे कौन हवाल।। | भौंरे (अली) और कली के बहाने राजा जयसिंह को समझाया गया, जो नई रानी के प्रेम में राज-काज भूल गए थे |
मिलते-जुलते अलंकारों में अंतर
| अलंकार | मुख्य पहचान | उदाहरण |
|---|---|---|
| उपमा | तुलना; वाचक — सा, सम, समान | मुख चंद्रमा के समान है |
| रूपक | अभेद; कोई वाचक नहीं | मुख-चंद्र |
| उत्प्रेक्षा | संभावना; वाचक — मानो, जनु | मुख मानो चंद्रमा है |
| संदेह | दुविधा | यह मुख है या चंद्रमा? |
| भ्रांतिमान | एक को दूसरा समझ लेना | मुख को चंद्रमा समझकर चकोर देखने लगा |
| यमक | एक शब्द कई बार, अर्थ अलग | कनक कनक ते सौ गुनी |
| श्लेष | एक शब्द एक बार, अर्थ अनेक | बिन पानी सब सून |
| पुनरुक्ति प्रकाश | एक शब्द दोहराया, अर्थ वही | धीरे-धीरे |
शायरी में अलंकार
उर्दू-हिंदी शायरी भी अलंकारों से भरी हुई है। नीचे ग़ालिब, मीर, ज़ौक़ और इक़बाल के प्रसिद्ध शेरों में अलंकार पहचानकर समझाए गए हैं। (यहाँ केवल वे पुरानी रचनाएँ दी गई हैं जो कॉपीराइट से मुक्त हैं।)
| अलंकार | शायर | शेर की पहली पंक्ति |
|---|---|---|
| उपमा | मीर तक़ी मीर | नाज़ुकी उस के लब की क्या कहिए |
| पुनरुक्ति प्रकाश + मानवीकरण | मीर तक़ी मीर | पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है |
| रूपक | मुहम्मद इक़बाल | सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोसिताँ हमारा |
| रूपक + मानवीकरण | मुहम्मद इक़बाल | पर्बत वो सब से ऊँचा हम-साया आसमाँ का |
| मानवीकरण | मुहम्मद इक़बाल | गोदी में खेलती हैं इस की हज़ारों नदियाँ |
| मानवीकरण | शेख़ इब्राहीम ज़ौक़ | लाई हयात आए क़ज़ा ले चली चले |
| मानवीकरण | मिर्ज़ा ग़ालिब | दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है |
| अतिशयोक्ति | मिर्ज़ा ग़ालिब | हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले |
| अतिशयोक्ति | मिर्ज़ा ग़ालिब | रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल |
| विरोधाभास | मिर्ज़ा ग़ालिब | बस-कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना |
उपमा — मीर तक़ी मीर
नाज़ुकी उस के लब की क्या कहिए
पंखुड़ी इक गुलाब की सी है
अलंकार कैसे है: होंठों (लब) की कोमलता की तुलना गुलाब की पंखुड़ी से की गई है। उपमेय — लब की नाज़ुकी, उपमान — गुलाब की पंखुड़ी, वाचक — ‘सी’, साधारण धर्म — कोमलता।
पुनरुक्ति प्रकाश + मानवीकरण — मीर तक़ी मीर
पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है
जाने न जाने गुल ही न जाने बाग़ तो सारा जाने है
अलंकार कैसे है: ‘पत्ता पत्ता’, ‘बूटा बूटा’ में शब्द दोहराए गए पर अर्थ वही — पुनरुक्ति प्रकाश। पत्तों, पौधों और बाग़ को मनुष्य की तरह हाल ‘जानते’ दिखाया — मानवीकरण।
रूपक — मुहम्मद इक़बाल
सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोसिताँ हमारा
हम बुलबुलें हैं इस की ये गुलसिताँ हमारा
अलंकार कैसे है: देशवासियों को ही ‘बुलबुलें’ और देश को ही ‘गुलसिताँ’ (बग़ीचा) कह दिया — कोई वाचक शब्द नहीं, अभेद है, इसलिए रूपक।
रूपक + मानवीकरण — मुहम्मद इक़बाल
पर्बत वो सब से ऊँचा हम-साया आसमाँ का
वो संतरी हमारा वो पासबाँ हमारा
अलंकार कैसे है: हिमालय को ‘संतरी’ और ‘पासबाँ’ (पहरेदार) बना दिया — रूपक; और पहाड़ को आसमान का ‘हम-साया’ (पड़ोसी) और पहरा देने वाला मनुष्य दिखाया — मानवीकरण।
मानवीकरण — मुहम्मद इक़बाल
गोदी में खेलती हैं इस की हज़ारों नदियाँ
गुलशन है जिन के दम से रश्क-ए-जिनाँ हमारा
अलंकार कैसे है: नदियों को बच्चों की तरह देश की ‘गोदी में खेलते’ दिखाया — जड़ प्रकृति पर मनुष्य जैसी क्रिया।
मानवीकरण — शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
लाई हयात आए क़ज़ा ले चली चले
अपनी ख़ुशी न आए न अपनी ख़ुशी चले
अलंकार कैसे है: ‘हयात’ (जीवन) को लाने वाली और ‘क़ज़ा’ (मृत्यु) को ले जाने वाली व्यक्ति की तरह दिखाया गया है।
मानवीकरण — मिर्ज़ा ग़ालिब
दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है
अलंकार कैसे है: शायर अपने दिल से किसी व्यक्ति की तरह बात कर रहा है और उसे ‘नादान’ कह रहा है।
अतिशयोक्ति — मिर्ज़ा ग़ालिब
हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले
अलंकार कैसे है: हर एक इच्छा पर ‘दम निकलना’ (जान निकल जाना) — इच्छाओं की तीव्रता को बहुत बढ़ाकर कहा गया है।
अतिशयोक्ति — मिर्ज़ा ग़ालिब
रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है
अलंकार कैसे है: दुख इतना गहरा हो कि आँखों से ख़ून टपके — यह बात लोक-सीमा से बढ़ाकर कही गई है।
विरोधाभास — मिर्ज़ा ग़ालिब
बस-कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना
आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसाँ होना
अलंकार कैसे है: ‘आदमी को इंसान होना नसीब नहीं’ — सुनने में उलटी बात लगती है, पर अर्थ है कि मनुष्य होकर भी सच्ची इंसानियत पाना कठिन है। विरोध का आभास, वास्तव में विरोध नहीं।
फ़िल्मी गीतों में अलंकार
अलंकार केवल पुरानी कविताओं में ही नहीं, हमारे पसंदीदा फ़िल्मी गानों में भी भरे पड़े हैं। नीचे हर अलंकार के लिए एक प्रसिद्ध गाना दिया गया है — गाने का नाम, फ़िल्म, उसका आधिकारिक YouTube लिंक और यह कि गाने में अलंकार कहाँ और कैसे है।
ध्यान दें: गानों के बोल कॉपीराइट में होते हैं, इसलिए यहाँ बोल नहीं लिखे गए हैं। गाना सुनें और बताई गई बात पर ध्यान देकर पंक्ति खुद पहचानें — इससे अलंकार और अच्छी तरह याद रहेगा। सीधे लिंक संगीत कंपनियों के आधिकारिक चैनलों के हैं; कुछ गानों के लिए ‘YouTube पर खोजें’ का लिंक है, क्योंकि उनके वीडियो हर जगह नहीं चलते।
पुराने सदाबहार गाने
| अलंकार | गाना | फ़िल्म |
|---|---|---|
| अनुप्रास | तीतर के दो आगे तीतर | मेरा नाम जोकर (1970) |
| पुनरुक्ति प्रकाश | धीरे धीरे बोल कोई सुन ना ले | गोरा और काला (1972) |
| श्लेष | पन्ना की तमन्ना है | हीरा पन्ना (1973) |
| उपमा | गोरे गोरे चाँद से मुख पर | अनीता (1967) |
| रूपक | तू चंदा मैं चाँदनी | रेशमा और शेरा (1971) |
| उत्प्रेक्षा | एक लड़की को देखा | 1942: ए लव स्टोरी (1994) |
| संदेह | चौदहवीं का चाँद हो | चौदहवीं का चाँद (1960) |
| मानवीकरण | चंदा मामा दूर के | वचन (1955) |
| अतिशयोक्ति | मेरे देश की धरती | उपकार (1967) |
अनुप्रास — ‘तीतर के दो आगे तीतर’
फ़िल्म: मेरा नाम जोकर (1970)
सुनें: YouTube पर खोजें — सूची में संगीत कंपनी के आधिकारिक चैनल वाला वीडियो चुनें।
अलंकार कैसे है: यह गाना एक मज़ेदार पहेली जैसा है। इसमें ‘त’ वर्ण वाला एक ही शब्द बार-बार, जल्दी-जल्दी आता है, जिससे गाने में अनोखी लय और मधुरता आ जाती है।
बच्चों के लिए संकेत: गाते समय ध्यान दें कि ‘त’ की ध्वनि कितनी बार आती है। एक ही वर्ण की यह आवृत्ति अनुप्रास है।
पुनरुक्ति प्रकाश — ‘धीरे धीरे बोल कोई सुन ना ले’
फ़िल्म: गोरा और काला (1972)
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अलंकार कैसे है: गाने के मुखड़े में ही ‘धीरे’ शब्द लगातार दो बार आया है और दोनों बार उसका अर्थ एक ही है — धीमी आवाज़ में।
बच्चों के लिए संकेत: शब्द दोहराया गया पर अर्थ नहीं बदला — इसलिए यह यमक नहीं, पुनरुक्ति प्रकाश है।
श्लेष — ‘पन्ना की तमन्ना है’
फ़िल्म: हीरा पन्ना (1973)
सुनें: YouTube पर गाना सुनें (चैनल: Saregama Music) · लिंक न चले तो YouTube पर खोजें
अलंकार कैसे है: फ़िल्म के दो पात्रों के नाम हीरा और पन्ना हैं, और ये दोनों रत्नों (हीरा और पन्ना) के नाम भी हैं। गाने के मुखड़े में ये शब्द एक-एक बार आते हैं, पर दोनों अर्थ एक साथ निकलते हैं।
बच्चों के लिए संकेत: एक शब्द, एक बार, दो अर्थ (व्यक्ति का नाम + रत्न) — यही श्लेष है।
उपमा — ‘गोरे गोरे चाँद से मुख पर’
फ़िल्म: अनीता (1967)
सुनें: YouTube पर गाना सुनें (चैनल: Shemaroo (आधिकारिक)) · लिंक न चले तो YouTube पर खोजें
अलंकार कैसे है: मुखड़े में नायिका के चेहरे (मुख) की तुलना चाँद से की गई है और तुलना के लिए वाचक शब्द ‘से’ का प्रयोग हुआ है।
बच्चों के लिए संकेत: उपमेय — मुख, उपमान — चाँद, वाचक — से। चारों अंग पहचानने का अभ्यास कराएँ।
रूपक — ‘तू चंदा मैं चाँदनी’
फ़िल्म: रेशमा और शेरा (1971)
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अलंकार कैसे है: मुखड़े में नायिका प्रिय को सीधे ‘चंदा’ और स्वयं को ‘चाँदनी’ कहती है। यहाँ ‘के समान’ या ‘सा’ जैसा कोई वाचक शब्द नहीं है — व्यक्ति को ही चाँद बना दिया गया है।
बच्चों के लिए संकेत: तुलना नहीं, अभेद — इसलिए यह उपमा नहीं, रूपक है। बच्चों से पूछें: इसे उपमा बनाना हो तो क्या जोड़ेंगे? (उत्तर: ‘चंदा-सा’)
उत्प्रेक्षा — ‘एक लड़की को देखा’
फ़िल्म: 1942: ए लव स्टोरी (1994)
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अलंकार कैसे है: पूरे गाने में नायक बताता है कि लड़की को देखकर उसे “कैसा लगा”। हर पंक्ति ‘ऐसा लगा जैसे…’ के ढंग से एक नई कल्पना जोड़ती है — किसी सुंदर प्राकृतिक दृश्य की।
बच्चों के लिए संकेत: ‘ऐसा लगा जैसे’ — यानी संभावना, पक्की बात नहीं। यह उत्प्रेक्षा की पहचान है (मानो/जैसे… हो)।
संदेह — ‘चौदहवीं का चाँद हो’
फ़िल्म: चौदहवीं का चाँद (1960)
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अलंकार कैसे है: मुखड़े में नायक नायिका से पूछता है कि वह पूनम (चौदहवीं) का चाँद है या सूरज (आफ़ताब)। वह तय नहीं कर पा रहा — मन में दुविधा बनी है।
बच्चों के लिए संकेत: ‘यह है या वह?’ वाली दुविधा संदेह अलंकार है। भ्रांतिमान से अंतर समझाएँ — वहाँ भ्रम पक्का होता है।
मानवीकरण — ‘चंदा मामा दूर के’
फ़िल्म: वचन (1955)
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अलंकार कैसे है: इस प्रसिद्ध बाल-गीत में चाँद को ‘मामा’ कहा गया है और उसे मनुष्य की तरह खाना बनाते और बच्चों के साथ व्यवहार करते दिखाया गया है।
बच्चों के लिए संकेत: जड़ प्रकृति (चाँद) को मनुष्य का रिश्ता और मनुष्य जैसे काम देना — मानवीकरण। छोटी कक्षाओं के लिए सबसे आसान उदाहरण।
अतिशयोक्ति — ‘मेरे देश की धरती’
फ़िल्म: उपकार (1967)
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अलंकार कैसे है: देशभक्ति के इस गीत में कहा गया है कि देश की धरती सोना और हीरे-मोती उगलती है। धरती से सचमुच सोना-हीरे नहीं उगते — यह देश की समृद्धि को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर कहने का सुंदर ढंग है।
बच्चों के लिए संकेत: लोक-सीमा से बढ़ाकर कहना — अतिशयोक्ति।
नई पीढ़ी के गाने (2006 के बाद)
आज के बच्चे इन गानों को और जल्दी पहचानते हैं — इनमें भी वही अलंकार मिलते हैं:
| अलंकार | गाना | फ़िल्म |
|---|---|---|
| अनुप्रास | चंदा चमके | फ़ना (2006) |
| पुनरुक्ति प्रकाश | कभी कभी अदिति | जाने तू… या जाने ना (2008) |
| रूपक | तू ही मेरी शब है | गैंगस्टर (2006) |
| मानवीकरण | चाँद सिफ़ारिश | फ़ना (2006) |
| मानवीकरण | सूरज की बाहों में | ज़िंदगी ना मिलेगी दोबारा (2011) |
| मानवीकरण | हवा हवा | मुबारकाँ (2017) |
| अतिशयोक्ति | बादल पे पाँव हैं | चक दे! इंडिया (2007) |
अनुप्रास — ‘चंदा चमके’
फ़िल्म: फ़ना (2006)
सुनें: YouTube पर गाना सुनें (चैनल: YRF (आधिकारिक)) · लिंक न चले तो YouTube पर खोजें
अलंकार कैसे है: इस बाल-गीत के मुखड़े में ‘च’ वर्ण से शुरू होने वाले शब्द लगातार आते हैं — चंदा, चमके और फिर चमक की ध्वनि। इससे गाने में खनक और लय पैदा होती है।
बच्चों के लिए संकेत: मुखड़ा गाकर गिनवाएँ कि ‘च’ कितनी बार आया — यही वर्ण की आवृत्ति अनुप्रास है। (इस गाने में चाँद से बातें भी हैं — यानी मानवीकरण भी।)
पुनरुक्ति प्रकाश — ‘कभी कभी अदिति’
फ़िल्म: जाने तू… या जाने ना (2008)
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अलंकार कैसे है: गाने के नाम में ही ‘कभी’ शब्द दो बार लगातार आया है और दोनों बार अर्थ एक ही है — कभी-कभार, कुछ समय।
बच्चों के लिए संकेत: शब्द दोहराया पर अर्थ नहीं बदला — पुनरुक्ति प्रकाश। पुराने गाने ‘धीरे धीरे बोल’ से तुलना कराएँ।
रूपक — ‘तू ही मेरी शब है’
फ़िल्म: गैंगस्टर (2006)
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अलंकार कैसे है: मुखड़े में गायक प्रिय व्यक्ति को सीधे अपनी ‘शब’ (रात), सुबह और दिन कहता है। ‘के समान’ जैसा कोई वाचक शब्द नहीं है — व्यक्ति को ही रात-सुबह-दिन बना दिया गया है।
बच्चों के लिए संकेत: अभेद — इसलिए रूपक। एक व्यक्ति पर कई उपमान (रात, सुबह, दिन) — बच्चों से पूछें, इसे उपमा कैसे बनाएँगे?
मानवीकरण — ‘चाँद सिफ़ारिश’
फ़िल्म: फ़ना (2006)
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अलंकार कैसे है: मुखड़े में कल्पना है कि अगर चाँद ‘सिफ़ारिश’ करता — यानी मनुष्य की तरह किसी के पक्ष में बात करता। चाँद को मनुष्य जैसा काम दिया गया है।
बच्चों के लिए संकेत: जड़ (चाँद) को सिफ़ारिश करने वाला मनुष्य बना दिया — मानवीकरण।
मानवीकरण — ‘सूरज की बाहों में’
फ़िल्म: ज़िंदगी ना मिलेगी दोबारा (2011)
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अलंकार कैसे है: गाने के नाम में ही सूरज की ‘बाहें’ बताई गई हैं। सूरज की बाहें नहीं होतीं — उसे मनुष्य की तरह अपनी बाहों में भरने वाला दिखाया गया है।
बच्चों के लिए संकेत: सूरज (जड़ प्रकृति) को मनुष्य के अंग (बाहें) देना — मानवीकरण।
मानवीकरण — ‘हवा हवा’
फ़िल्म: मुबारकाँ (2017)
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अलंकार कैसे है: इस गाने में गायक हवा को पुकारकर उससे बात करता है और उससे ख़ुशबू बिखेरने को कहता है — मानो हवा कोई व्यक्ति हो जो बात सुनकर काम कर देगी।
बच्चों के लिए संकेत: हवा से मनुष्य की तरह बात करना और काम करवाना — मानवीकरण। (‘हवा’ के दोहराव में पुनरुक्ति प्रकाश भी है।)
अतिशयोक्ति — ‘बादल पे पाँव हैं’
फ़िल्म: चक दे! इंडिया (2007)
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अलंकार कैसे है: जीत की ख़ुशी में खिलाड़ियों को लगता है कि उनके पाँव बादलों पर हैं। सचमुच कोई बादल पर पाँव नहीं रख सकता — यह ख़ुशी को बहुत बढ़ाकर कहने का ढंग है।
बच्चों के लिए संकेत: लोक-सीमा से बढ़ाकर कहना — अतिशयोक्ति। पुराने ‘मेरे देश की धरती’ से तुलना कराएँ।
कक्षा-गतिविधि: हर बच्चा अपना कोई पसंदीदा गाना चुने, उसकी एक पंक्ति कक्षा में गाकर सुनाए और बताए कि उसमें कौन-सा अलंकार है — उपमेय-उपमान क्या है, वाचक शब्द कौन-सा है, या कौन-सा वर्ण दोहराया गया है। बच्चे अक्सर गानों में मानवीकरण (चाँद, बादल, हवा से बातें) और उपमा (चाँद-सा, फूल-सा) सबसे जल्दी ढूँढ लेते हैं।
यमक पर एक बात: फ़िल्मी गानों में यमक के उदाहरण कम मिलते हैं और जो मिलते हैं उनमें अर्थ को लेकर मतभेद रहता है, इसलिए यमक के लिए ऊपर दिए कबीर और बिहारी के दोहे ही सबसे अच्छे उदाहरण हैं।
बहुविकल्पीय प्रश्न — स्तर 1: आसान (कक्षा 6–8)
अलंकार की पहचान और उपमा के अंगों से जुड़े सीधे प्रश्न।
1. ‘अलंकार’ शब्द का शाब्दिक अर्थ है—
(क) संगीत
(ख) कविता
(ग) आभूषण
(घ) सुगंध
2. अलंकार के मुख्य भेद कितने हैं?
(क) तीन
(ख) चार
(ग) पाँच
(घ) दो
3. ‘चारु चंद्र की चंचल किरणें’ — इस पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
(क) यमक
(ख) अनुप्रास
(ग) रूपक
(घ) उपमा
4. ‘पीपर पात सरिस मन डोला’ — इस पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
(क) उत्प्रेक्षा
(ख) अनुप्रास
(ग) उपमा
(घ) रूपक
5. ‘चरण-कमल बंदौं हरि राई’ — इस पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
(क) यमक
(ख) रूपक
(ग) उपमा
(घ) उत्प्रेक्षा
6. ‘कनक कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय’ — इस पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
(क) अनुप्रास
(ख) उपमा
(ग) यमक
(घ) श्लेष
7. जहाँ एक ही वर्ण बार-बार आए, वहाँ कौन-सा अलंकार होता है?
(क) यमक
(ख) उपमा
(ग) श्लेष
(घ) अनुप्रास
8. जहाँ एक शब्द बार-बार आए और हर बार अर्थ अलग हो, वहाँ कौन-सा अलंकार होता है?
(क) पुनरुक्ति प्रकाश
(ख) यमक
(ग) श्लेष
(घ) अनुप्रास
9. जहाँ ‘सा, सी, सम, समान’ से तुलना की जाए, वहाँ कौन-सा अलंकार होता है?
(क) रूपक
(ख) उत्प्रेक्षा
(ग) उपमा
(घ) अतिशयोक्ति
10. ‘मुख चंद्रमा के समान सुंदर है’ — इसमें उपमेय क्या है?
(क) चंद्रमा
(ख) के समान
(ग) सुंदर
(घ) मुख
11. ‘मुख चंद्रमा के समान सुंदर है’ — इसमें उपमान क्या है?
(क) के समान
(ख) चंद्रमा
(ग) मुख
(घ) सुंदर
12. ‘मुख चंद्रमा के समान सुंदर है’ — इसमें वाचक शब्द क्या है?
(क) सुंदर
(ख) मुख
(ग) चंद्रमा
(घ) के समान
13. ‘मुख चंद्रमा के समान सुंदर है’ — इसमें साधारण धर्म क्या है?
(क) के समान
(ख) चंद्रमा
(ग) सुंदर
(घ) मुख
14. ‘फूल हँस रहे हैं’ — इस पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
(क) उपमा
(ख) यमक
(ग) मानवीकरण
(घ) अनुप्रास
15. ‘मैया मैं तो चंद्र-खिलौना लैहौं’ — इस पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
(क) उपमा
(ख) श्लेष
(ग) उत्प्रेक्षा
(घ) रूपक
16. ‘तरनि-तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाए’ — इस पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
(क) अनुप्रास
(ख) यमक
(ग) रूपक
(घ) मानवीकरण
17. रूपक अलंकार में उपमेय और उपमान के बीच क्या दिखाया जाता है?
(क) अभेद (कोई अंतर नहीं)
(ख) विरोध
(ग) केवल तुलना
(घ) संदेह
18. ‘हरिपद कोमल कमल से’ — इस पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
(क) अतिशयोक्ति
(ख) उपमा
(ग) रूपक
(घ) यमक
19. ‘पायो जी मैंने राम रतन धन पायो’ — इस पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
(क) मानवीकरण
(ख) रूपक
(ग) अनुप्रास
(घ) उपमा
20. ‘कल कानन कुंडल मोरपखा’ — इस पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
(क) रूपक
(ख) यमक
(ग) श्लेष
(घ) अनुप्रास
21. ‘नदी गीत गाती हुई बह रही है’ — इस पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
(क) मानवीकरण
(ख) रूपक
(ग) उपमा
(घ) उत्प्रेक्षा
22. ‘काली घटा का घमंड घटा’ — इस पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
(क) श्लेष
(ख) यमक
(ग) मानवीकरण
(घ) उपमा
23. उपमा अलंकार के कितने अंग होते हैं?
(क) पाँच
(ख) दो
(ग) तीन
(घ) चार
24. ‘मुदित महीपति मंदिर आए’ — इस पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
(क) उपमा
(ख) अनुप्रास
(ग) उत्प्रेक्षा
(घ) यमक
25. ‘सीता का मुख कमल-सा कोमल है’ — इस पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
(क) उत्प्रेक्षा
(ख) उपमा
(ग) रूपक
(घ) मानवीकरण
26. ‘हनूमान की पूँछ में, लगन न पाई आग। लंका सिगरी जल गई’ — इस पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
(क) यमक
(ख) मानवीकरण
(ग) उपमा
(घ) अतिशयोक्ति
27. जहाँ शब्द के कारण चमत्कार हो, वह कहलाता है—
(क) शब्दालंकार
(ख) अर्थालंकार
(ग) रस
(घ) उभयालंकार
28. जहाँ अर्थ के कारण चमत्कार हो, वह कहलाता है—
(क) अर्थालंकार
(ख) शब्दालंकार
(ग) उभयालंकार
(घ) छंद
29. उपमा अलंकार किस वर्ग में आता है?
(क) उभयालंकार
(ख) शब्दालंकार
(ग) किसी में नहीं
(घ) अर्थालंकार
30. अनुप्रास अलंकार किस वर्ग में आता है?
(क) अर्थालंकार
(ख) शब्दालंकार
(ग) उभयालंकार
(घ) किसी में नहीं
31. ‘पेड़ सिर हिलाकर स्वागत कर रहे हैं’ — इस पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
(क) अनुप्रास
(ख) उत्प्रेक्षा
(ग) उपमा
(घ) मानवीकरण
32. ‘तीन बेर खाती थीं, वे तीन बेर खाती हैं’ — इस पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
(क) यमक
(ख) अनुप्रास
(ग) श्लेष
(घ) पुनरुक्ति प्रकाश
33. ‘राम-नाम मनि-दीप धरु, जीह देहरीं द्वार’ — इस पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
(क) यमक
(ख) उपमा
(ग) रूपक
(घ) उत्प्रेक्षा
34. ‘उसका शरीर लोहे जैसा मज़बूत है’ — इस पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
(क) रूपक
(ख) मानवीकरण
(ग) उपमा
(घ) अतिशयोक्ति
35. ‘सूरज ने आँखें खोलीं और धरती को जगाया’ — इस पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
(क) अतिशयोक्ति
(ख) रूपक
(ग) मानवीकरण
(घ) उपमा
36. उत्प्रेक्षा अलंकार के वाचक शब्द कौन-से हैं?
(क) सा, सी, सम
(ख) का, की, के
(ग) मानो, जनु, मनहुँ
(घ) और, या
37. ‘उसका हृदय फूल-सा कोमल है’ — इस पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
(क) उपमा
(ख) उत्प्रेक्षा
(ग) रूपक
(घ) श्लेष
38. ‘भव-सागर से पार करो प्रभु’ — इस पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
(क) अतिशयोक्ति
(ख) उपमा
(ग) यमक
(घ) रूपक
39. ‘रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून’ — इस पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
(क) श्लेष
(ख) यमक
(ग) अनुप्रास
(घ) उपमा
40. मानवीकरण अलंकार में क्या किया जाता है?
(क) जड़ प्रकृति पर मनुष्य जैसी क्रियाओं का आरोप
(ख) एक वर्ण की आवृत्ति
(ग) एक शब्द के अनेक अर्थ
(घ) दो चीज़ों की तुलना
इस स्तर के उत्तर और कारण लेख के अंत में ‘उत्तर कुंजी’ में दिए गए हैं — पहले ख़ुद हल करें, फिर मिलाएँ।
बहुविकल्पीय प्रश्न — स्तर 2: मध्यम (कक्षा 9–10, बोर्ड परीक्षा)
बोर्ड परीक्षा जैसे प्रश्न — श्लेष, उत्प्रेक्षा, अतिशयोक्ति, मानवीकरण और मिलते-जुलते अलंकारों की पहचान।
1. ‘सोहत ओढ़े पीत पट, स्याम सलोने गात। मनहुँ नीलमनि सैल पर, आतप परयौ प्रभात।।’ — इस पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
(क) उत्प्रेक्षा
(ख) रूपक
(ग) उपमा
(घ) अतिशयोक्ति
2. ‘सोहत ओढ़े पीत पट, स्याम सलोने गात’ में उपमेय क्या है?
(क) पीला कपड़ा
(ख) प्रभात की धूप
(ग) श्रीकृष्ण का साँवला शरीर
(घ) नीलमणि का पर्वत
3. ‘पानी गए न ऊबरै, मोती, मानुष, चून’ — मोती के संदर्भ में ‘पानी’ का अर्थ है—
(क) आँसू
(ख) जल
(ग) चमक (आब)
(घ) इज़्ज़त
4. इसी दोहे में मनुष्य (मानुष) के संदर्भ में ‘पानी’ का अर्थ है—
(क) जल
(ख) पसीना
(ग) इज़्ज़त (प्रतिष्ठा)
(घ) चमक
5. इसी दोहे में चूने (चून) के संदर्भ में ‘पानी’ का अर्थ है—
(क) जल
(ख) इज़्ज़त
(ग) रंग
(घ) चमक
6. ‘कनक कनक ते सौ गुनी’ में ‘कनक’ के दो अर्थ हैं—
(क) गेहूँ और धतूरा
(ख) सोना और चाँदी
(ग) सोना और पीतल
(घ) धतूरा और सोना
7. यमक और श्लेष में मुख्य अंतर है—
(क) यमक में शब्द कई बार आता है, श्लेष में एक बार
(ख) यमक अर्थालंकार है, श्लेष नहीं
(ग) श्लेष में शब्द कई बार आता है
(घ) दोनों में कोई अंतर नहीं
8. ‘उदित उदयगिरि मंच पर, रघुबर बाल पतंग’ — इस पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
(क) यमक
(ख) रूपक
(ग) उत्प्रेक्षा
(घ) उपमा
9. ‘चरन धरत चिंता करत, चितवत चारों ओर। सुबरन को खोजत फिरत, कवि, व्यभिचारी, चोर।।’ — इस पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
(क) श्लेष
(ख) यमक
(ग) उपमा
(घ) रूपक
10. इस दोहे में कवि के संदर्भ में ‘सुबरन’ का अर्थ है—
(क) सुंदर वर्ण (अच्छे शब्द)
(ख) सुंदर रूप
(ग) सोना
(घ) अच्छा रंग
11. उत्प्रेक्षा अलंकार में क्या होता है?
(क) कारण बिना कार्य
(ख) केवल वर्ण की आवृत्ति
(ग) उपमेय-उपमान में अभेद
(घ) उपमेय में उपमान की संभावना
12. ‘उसका मुख मानो चंद्रमा है’ — इस पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
(क) उपमा
(ख) रूपक
(ग) संदेह
(घ) उत्प्रेक्षा
13. अतिशयोक्ति अलंकार की पहचान है—
(क) तुलना करना
(ख) बात को लोक-सीमा से बढ़ाकर कहना
(ग) प्रकृति को मनुष्य बनाना
(घ) वर्ण की आवृत्ति
14. ‘उसकी आवाज़ इतनी तेज़ थी कि आसमान फट गया’ — इस पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
(क) उपमा
(ख) उत्प्रेक्षा
(ग) मानवीकरण
(घ) अतिशयोक्ति
15. ‘बादल ने धरती को गले लगा लिया’ — इस पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
(क) रूपक
(ख) उत्प्रेक्षा
(ग) अतिशयोक्ति
(घ) मानवीकरण
16. ‘मुख-चंद्र देखकर सब मोहित हो गए’ — इस पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
(क) उत्प्रेक्षा
(ख) संदेह
(ग) उपमा
(घ) रूपक
17. ‘घर-घर में दीप जले’ — इस पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
(क) अनुप्रास
(ख) यमक
(ग) श्लेष
(घ) पुनरुक्ति प्रकाश
18. निम्नलिखित में से कौन-सा उपमा का वाचक शब्द नहीं है?
(क) मानो
(ख) समान
(ग) सरिस
(घ) सा
19. ‘उसके नेत्र मानो कमल हों’ — इस पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
(क) उत्प्रेक्षा
(ख) उपमा
(ग) भ्रांतिमान
(घ) रूपक
20. रूपक अलंकार की पहचान है—
(क) ‘सा, सम’ वाचक शब्द
(ख) ‘मानो, जनु’ वाचक शब्द
(ग) उपमेय पर उपमान का आरोप, वाचक शब्द नहीं
(घ) वर्ण की आवृत्ति
21. ‘सागर-सा गंभीर हृदय’ — इस पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
(क) उपमा
(ख) उत्प्रेक्षा
(ग) रूपक
(घ) अतिशयोक्ति
22. ‘आसमान रूपी आँगन में तारों के दीप जले’ — इस पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
(क) उत्प्रेक्षा
(ख) रूपक
(ग) उपमा
(घ) मानवीकरण
23. ‘वह इतना दुबला है कि हवा उसे उड़ा ले जाए’ — इस पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
(क) मानवीकरण
(ख) उत्प्रेक्षा
(ग) अतिशयोक्ति
(घ) उपमा
24. श्लेष अलंकार मुख्य रूप से किस वर्ग में आता है?
(क) छंद
(ख) शब्दालंकार
(ग) अर्थालंकार
(घ) रस
25. उत्प्रेक्षा अलंकार किस वर्ग में आता है?
(क) रस
(ख) शब्दालंकार
(ग) छंद
(घ) अर्थालंकार
26. ‘हवाएँ गुनगुनाती हैं, कलियाँ मुस्कुराती हैं’ — इस पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
(क) रूपक
(ख) मानवीकरण
(ग) उपमा
(घ) अनुप्रास
27. ‘मंगन को देखि पट देत बार-बार है’ — इस पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
(क) यमक
(ख) श्लेष
(ग) उपमा
(घ) पुनरुक्ति प्रकाश
28. ‘जो रहीम गति दीप की, कुल कपूत गति सोय। बारे उजियारो करै, बढ़े अँधेरो होय।।’ — इस पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
(क) श्लेष
(ख) यमक
(ग) अतिशयोक्ति
(घ) उपमा
29. ‘यह मुख है या चंद्रमा?’ — इस पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
(क) उपमा
(ख) संदेह
(ग) रूपक
(घ) भ्रांतिमान
30. ‘पाँय महावर दैन को, नाइन बैठी आय। फिरि-फिरि जानि महावरी, एड़ी मीड़त जाय।।’ — इस पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
(क) संदेह
(ख) भ्रांतिमान
(ग) उत्प्रेक्षा
(घ) उपमा
31. संदेह और भ्रांतिमान में मुख्य अंतर है—
(क) संदेह शब्दालंकार है
(ख) भ्रांतिमान में वाचक ‘सा’ आता है
(ग) संदेह में दुविधा रहती है, भ्रांतिमान में एक को दूसरा समझ लिया जाता है
(घ) दोनों एक ही हैं
32. ‘करत-करत अभ्यास के, जड़मति होत सुजान। रसरी आवत जात ते, सिल पर परत निसान।।’ — इसमें कौन-सा अलंकार है?
(क) यमक
(ख) संदेह
(ग) दृष्टांत
(घ) उपमा
33. ‘बंदऊँ गुरु पद पदुम परागा’ — इस पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
(क) यमक
(ख) अनुप्रास
(ग) उपमा
(घ) श्लेष
34. ‘रघुपति राघव राजा राम’ — इस पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
(क) रूपक
(ख) पुनरुक्ति प्रकाश
(ग) यमक
(घ) अनुप्रास
35. ‘चाँद ने खिड़की से झाँककर देखा’ — इस पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
(क) उपमा
(ख) उत्प्रेक्षा
(ग) मानवीकरण
(घ) रूपक
36. ‘आँसुओं की नदी बह गई’ — इस पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
(क) अतिशयोक्ति
(ख) रूपक
(ग) मानवीकरण
(घ) उपमा
37. ‘दुख-रजनी बीती, सुख-प्रभात आया’ — इस पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
(क) उपमा
(ख) मानवीकरण
(ग) रूपक
(घ) उत्प्रेक्षा
38. उत्प्रेक्षा में ‘मनु, जनु, मनहुँ, जानो’ जैसे शब्द क्या कहलाते हैं?
(क) उपमान
(ख) उपमेय
(ग) साधारण धर्म
(घ) वाचक शब्द
39. ‘उसकी हँसी मानो झरना बह रहा हो’ — इस पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
(क) मानवीकरण
(ख) उत्प्रेक्षा
(ग) रूपक
(घ) उपमा
40. कथन (A): ‘चरण-कमल बंदौं हरि राई’ में रूपक अलंकार है।
कारण (R): रूपक में उपमेय और उपमान में अभेद दिखाया जाता है।
(क) A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या करता है।
(ख) A और R दोनों सही हैं लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं करता।
(ग) A सही है, R गलत है।
(घ) A गलत है, R सही है।
इस स्तर के उत्तर और कारण लेख के अंत में ‘उत्तर कुंजी’ में दिए गए हैं — पहले ख़ुद हल करें, फिर मिलाएँ।
बहुविकल्पीय प्रश्न — स्तर 3: कठिन (कक्षा 11–12, CTET/TET और प्रतियोगी परीक्षाएँ)
प्रतियोगी परीक्षाओं जैसे प्रश्न — विरोधाभास, विभावना, अन्योक्ति, वक्रोक्ति, सुमेलन और कथन-कारण।
1. ‘या अनुरागी चित्त की, गति समुझै नहिं कोय। ज्यों-ज्यों बूड़ै स्याम रँग, त्यों-त्यों उज्जलु होय।।’ — इस पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
(क) विभावना
(ख) विरोधाभास
(ग) श्लेष
(घ) उत्प्रेक्षा
2. ‘नहिं पराग नहिं मधुर मधु, नहिं विकास इहि काल। अली कली ही सौं बँध्यो, आगे कौन हवाल।।’ — इस पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
(क) अन्योक्ति
(ख) रूपक
(ग) उत्प्रेक्षा
(घ) दृष्टांत
3. ‘को तुम? हैं घनश्याम हम। तो बरसो कित जाय।’ — इस पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
(क) यमक
(ख) संदेह
(ग) उपमा
(घ) वक्रोक्ति
4. ‘बिनु पद चलै सुनै बिनु काना। कर बिनु करम करै बिधि नाना।।’ — इस पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
(क) विरोधाभास
(ख) विभावना
(ग) अतिशयोक्ति
(घ) अन्योक्ति
5. ‘सारी बीच नारी है कि नारी बीच सारी है’ — इस पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
(क) यमक
(ख) भ्रांतिमान
(ग) संदेह
(घ) उत्प्रेक्षा
6. ‘पीपर पात सरिस मन डोला’ में साधारण धर्म क्या है?
(क) सरिस
(ख) मन
(ग) डोला
(घ) पीपर पात
7. ‘पीपर पात सरिस मन डोला’ में वाचक शब्द क्या है?
(क) मन
(ख) सरिस
(ग) डोला
(घ) पात
8. ‘मनहुँ नीलमनि सैल पर, आतप परयौ प्रभात’ में उपमान क्या है?
(क) मनहुँ
(ख) पीला वस्त्र
(ग) नीलमणि पर्वत पर पड़ी सुबह की धूप
(घ) श्रीकृष्ण का शरीर
9. निम्नलिखित में से कौन-सा शब्दालंकार नहीं है?
(क) यमक
(ख) अनुप्रास
(ग) श्लेष
(घ) उपमा
10. निम्नलिखित में से कौन-सा अर्थालंकार नहीं है?
(क) यमक
(ख) अतिशयोक्ति
(ग) उत्प्रेक्षा
(घ) रूपक
11. इनमें से किस वाक्य में उत्प्रेक्षा अलंकार है?
(क) मुख चंद्रमा के समान है
(ख) यह मुख है या चंद्रमा
(ग) मुख मानो चंद्रमा है
(घ) मुख-चंद्र
12. कौन-सा युग्म सही सुमेलित नहीं है?
(क) कनक कनक ते सौ गुनी — यमक
(ख) पीपर पात सरिस मन डोला — उपमा
(ग) चरण-कमल बंदौं हरि राई — रूपक
(घ) हनूमान की पूँछ में लगन न पाई आग — मानवीकरण
13. ‘मंगन को देखि पट देत बार-बार है’ में ‘पट’ के दो अर्थ हैं—
(क) पट्टी और कपड़ा
(ख) वस्त्र और दरवाज़ा
(ग) परदा और खिड़की
(घ) पत्ता और पेड़
14. ‘बारे उजियारो करै, बढ़े अँधेरो होय’ में ‘बारे’ के दो अर्थ हैं—
(क) बारिश और बादल
(ख) बालक और बूढ़ा
(ग) जलाने पर और बचपन में
(घ) बार-बार और बाहर
15. इसी दोहे में ‘बढ़े’ के दो अर्थ हैं—
(क) आगे जाना और रुकना
(ख) बुझने पर और बड़ा होने पर
(ग) जलना और चमकना
(घ) बढ़ना और घटना
16. किस अलंकार में उपमेय पर उपमान का ‘आरोप’ होता है?
(क) रूपक
(ख) अनुप्रास
(ग) उपमा
(घ) संदेह
17. किस अलंकार में ‘संभावना’ मुख्य होती है?
(क) रूपक
(ख) यमक
(ग) उत्प्रेक्षा
(घ) उपमा
18. किस अलंकार में ‘लोक-सीमा का उल्लंघन’ होता है?
(क) अतिशयोक्ति
(ख) मानवीकरण
(ग) उपमा
(घ) श्लेष
19. जहाँ कारण के बिना कार्य हो, वहाँ कौन-सा अलंकार होता है?
(क) दृष्टांत
(ख) विभावना
(ग) अतिशयोक्ति
(घ) विरोधाभास
20. जहाँ विरोध दिखे पर वास्तव में विरोध न हो, वहाँ कौन-सा अलंकार होता है?
(क) वक्रोक्ति
(ख) संदेह
(ग) विभावना
(घ) विरोधाभास
21. दृष्टांत अलंकार में दो वाक्यों का संबंध होता है—
(क) उपमेय-उपमान के अभेद का
(ख) कारण बिना कार्य का
(ग) संदेह का
(घ) बिंब-प्रतिबिंब (उदाहरण) का
22. ‘पाँय महावर दैन को…’ दोहे में भ्रम किस बात का है?
(क) नाइन को रानी समझना
(ख) लाल एड़ी को महावर समझना
(ग) पैर को कमल समझना
(घ) महावर को खून समझना
23. ‘अली कली ही सौं बँध्यो’ — इस अन्योक्ति में ‘अली’ (भौंरा) किसका प्रतीक है?
(क) प्रजा
(ख) नई रानी
(ग) कवि बिहारी
(घ) राजा जयसिंह
24. इसी दोहे में ‘कली’ किसका प्रतीक है?
(क) राजा
(ख) कवि
(ग) मंत्री
(घ) नवविवाहिता रानी
25. कथन (A): ‘रहिमन पानी राखिए…’ दोहे में यमक अलंकार है।
कारण (R): इस दोहे में ‘पानी’ के मोती, मनुष्य और चूने के संदर्भ में अलग-अलग अर्थ हैं।
(क) A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या करता है।
(ख) A और R दोनों सही हैं लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं करता।
(ग) A सही है, R गलत है।
(घ) A गलत है, R सही है।
26. कथन (A): ‘मुख मानो चंद्रमा है’ में उत्प्रेक्षा अलंकार है।
कारण (R): इसमें ‘मानो’ वाचक से संभावना व्यक्त की गई है।
(क) A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या करता है।
(ख) A और R दोनों सही हैं लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं करता।
(ग) A सही है, R गलत है।
(घ) A गलत है, R सही है।
27. कथन (A): ‘तीन बेर खाती थीं, वे तीन बेर खाती हैं’ में श्लेष अलंकार है।
कारण (R): ‘बेर’ शब्द दो बार अलग-अलग अर्थों में आया है।
(क) A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या करता है।
(ख) A और R दोनों सही हैं लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं करता।
(ग) A सही है, R गलत है।
(घ) A गलत है, R सही है।
28. कथन (A): ‘हनूमान की पूँछ में लगन न पाई आग’ में अतिशयोक्ति अलंकार है।
कारण (R): इसमें बात को लोक-सीमा से बढ़ाकर कहा गया है।
(क) A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या करता है।
(ख) A और R दोनों सही हैं लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं करता।
(ग) A सही है, R गलत है।
(घ) A गलत है, R सही है।
29. वक्रोक्ति अलंकार में क्या होता है?
(क) उपमेय में उपमान की संभावना
(ख) जड़ को चेतन बनाना
(ग) सुनने वाला कहने वाले की बात का दूसरा अर्थ निकाल लेता है
(घ) एक वर्ण की आवृत्ति
30. जहाँ शब्द और अर्थ दोनों का चमत्कार हो, उसे कहते हैं—
(क) अर्थालंकार
(ख) शब्दालंकार
(ग) रस
(घ) उभयालंकार
31. ‘उपमेय’ किसे कहते हैं?
(क) समान गुण को
(ख) जिससे तुलना की जाए
(ग) तुलना बताने वाले शब्द को
(घ) जिसकी तुलना की जाए
32. जब उपमा के चारों अंगों में से कोई अंग लुप्त हो, तो उसे कहते हैं—
(क) पूर्णोपमा
(ख) लुप्तोपमा
(ग) रूपक
(घ) मालोपमा
33. ‘हरिपद कोमल कमल से’ में कौन-सी उपमा है?
(क) पूर्णोपमा
(ख) उपमा नहीं है
(ग) लुप्तोपमा
(घ) मालोपमा
34. जहाँ पंक्तियों के अंत में तुक मिले, वहाँ अनुप्रास का कौन-सा भेद है?
(क) अंत्यानुप्रास
(ख) श्रुत्यानुप्रास
(ग) लाटानुप्रास
(घ) छेकानुप्रास
35. यमक और पुनरुक्ति प्रकाश में मुख्य अंतर है—
(क) पुनरुक्ति अर्थालंकार है
(ख) यमक में दोहराए शब्द का अर्थ बदलता है, पुनरुक्ति में वही रहता है
(ग) यमक में शब्द एक ही बार आता है
(घ) दोनों में अर्थ बदलता है
36. निम्नलिखित में से किस वाक्य में मानवीकरण अलंकार है?
(क) काली घटा का घमंड घटा
(ख) मुख चंद्रमा-सा सुंदर है
(ग) सूरज की किरणें धरती को जगा रही हैं
(घ) चरण-कमल बंदौं
37. निम्नलिखित में से कौन-सा उपमा का वाचक शब्द है?
(क) जनु
(ख) सरिस
(ग) मनहुँ
(घ) मानो
38. ‘चरन धरत चिंता करत, चितवत चारों ओर’ — इस पंक्ति में श्लेष के अतिरिक्त कौन-सा अलंकार है?
(क) उपमा
(ख) अनुप्रास
(ग) रूपक
(घ) यमक
39. ‘आप तो बड़े ईमानदार हैं!’ (व्यंग्य में) — इसमें कौन-सा अलंकार है?
(क) काकु वक्रोक्ति
(ख) अतिशयोक्ति
(ग) उपमा
(घ) श्लेष
40. ‘रस्सी को साँप समझकर वह डरकर भागा’ — इस पंक्ति में कौन-सा अलंकार है?
(क) उपमा
(ख) संदेह
(ग) उत्प्रेक्षा
(घ) भ्रांतिमान
इस स्तर के उत्तर और कारण लेख के अंत में ‘उत्तर कुंजी’ में दिए गए हैं — पहले ख़ुद हल करें, फिर मिलाएँ।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न: अलंकार किसे कहते हैं?
उत्तर: काव्य की शोभा बढ़ाने वाले शब्द और अर्थ के चमत्कार को अलंकार कहते हैं। ‘अलंकार’ का अर्थ है आभूषण।
प्रश्न: अलंकार के कितने भेद हैं?
उत्तर: मुख्य रूप से दो — शब्दालंकार और अर्थालंकार। दोनों के मेल को उभयालंकार कहते हैं।
प्रश्न: उपमा और रूपक में क्या अंतर है?
उत्तर: उपमा में तुलना होती है और ‘सा, समान’ जैसे वाचक शब्द आते हैं (मुख चंद्रमा के समान है); रूपक में उपमेय को ही उपमान बना दिया जाता है (मुख-चंद्र)।
प्रश्न: यमक और श्लेष में क्या अंतर है?
उत्तर: यमक में एक शब्द बार-बार आकर अलग-अलग अर्थ देता है; श्लेष में एक शब्द एक ही बार आकर कई अर्थ देता है।
प्रश्न: उत्प्रेक्षा अलंकार की पहचान क्या है?
उत्तर: जहाँ ‘मानो, मनु, जनु, मनहुँ, जानो’ जैसे शब्दों से किसी चीज़ में दूसरी चीज़ की संभावना की जाए।
उत्तर कुंजी (उत्तर और कारण)
स्तर 1: आसान (कक्षा 6–8)
1. (ग) — अलंकार = गहना, जो काव्य की शोभा बढ़ाए।
2. (घ) — शब्दालंकार और अर्थालंकार (दोनों का मेल उभयालंकार)।
3. (ख) — ‘च’ वर्ण की आवृत्ति।
4. (ग) — मन की तुलना पीपल के पत्ते से; वाचक ‘सरिस’।
5. (ख) — चरण को ही कमल मान लिया।
6. (ग) — कनक = धतूरा और सोना।
7. (घ) — वर्ण की आवृत्ति — अनुप्रास।
8. (ख) — शब्द की आवृत्ति, अर्थ भिन्न — यमक।
9. (ग) — वाचक शब्द से तुलना — उपमा।
10. (घ) — जिसकी तुलना हो रही है — मुख।
11. (ख) — जिससे तुलना की गई — चंद्रमा।
12. (घ) — तुलना बताने वाला शब्द।
13. (ग) — दोनों में समान गुण — सुंदरता।
14. (ग) — फूलों को मनुष्य की तरह हँसता दिखाया।
15. (घ) — चंद्रमा को ही खिलौना मान लिया।
16. (क) — ‘त’ वर्ण की आवृत्ति।
17. (क) — उपमेय को ही उपमान बना दिया जाता है।
18. (ख) — हरिपद की तुलना कमल से; वाचक ‘से’।
19. (ख) — राम-नाम को ही रत्न-धन मान लिया।
20. (घ) — ‘क’ वर्ण की आवृत्ति।
21. (क) — नदी को गाता दिखाया।
22. (ख) — घटा = बादल और कम होना।
23. (घ) — उपमेय, उपमान, साधारण धर्म, वाचक शब्द।
24. (ख) — ‘म’ वर्ण की आवृत्ति।
25. (ख) — वाचक ‘सा’ से तुलना।
26. (घ) — आग लगने से पहले लंका जलना — बहुत बढ़ाकर कहना।
27. (क) — शब्द बदलने पर चमत्कार खत्म हो जाता है।
28. (क) — पर्यायवाची रखने पर भी चमत्कार बना रहता है।
29. (घ) — चमत्कार तुलना के अर्थ में है।
30. (ख) — चमत्कार वर्ण की ध्वनि में है।
31. (घ) — पेड़ों को मनुष्य की तरह स्वागत करता दिखाया।
32. (क) — बेर = बार और बेर का फल।
33. (ग) — राम-नाम को ही मणि-दीप मान लिया।
34. (ग) — वाचक ‘जैसा’ से तुलना।
35. (ग) — सूरज को मनुष्य की तरह दिखाया।
36. (ग) — मानो, मनु, जनु, मनहुँ, जानो — संभावना के वाचक।
37. (क) — वाचक ‘सा’।
38. (घ) — संसार को ही सागर मान लिया।
39. (क) — ‘पानी’ के अनेक अर्थ — चमक, इज़्ज़त, जल।
40. (क) — प्रकृति को मनुष्य की तरह दिखाना।
स्तर 2: मध्यम (कक्षा 9–10, बोर्ड परीक्षा)
1. (क) — ‘मनहुँ’ से संभावना।
2. (ग) — जिसकी बात हो रही है — श्याम सलोना शरीर।
3. (ग) — मोती की चमक को पानी कहते हैं।
4. (ग) — मनुष्य का पानी — मान-सम्मान।
5. (क) — चूना पानी के बिना काम का नहीं।
6. (घ) — धतूरे से सौ गुना नशा सोने में।
7. (क) — यमक — आवृत्ति; श्लेष — एक शब्द, अनेक अर्थ।
8. (ख) — उदयगिरि को मंच और राम को बाल-सूर्य मान लिया।
9. (क) — ‘सुबरन’ के तीन अर्थ।
10. (क) — कवि अच्छे शब्द खोजता है।
11. (घ) — मानो… वाली कल्पना।
12. (घ) — ‘मानो’ से संभावना।
13. (ख) — अतिशय (बहुत) + उक्ति (कथन)।
14. (घ) — असंभव बात — आसमान फटना।
15. (घ) — बादल को मनुष्य की तरह गले लगाते दिखाया।
16. (घ) — मुख को ही चंद्र मान लिया।
17. (घ) — ‘घर’ दोहराया, अर्थ वही।
18. (क) — ‘मानो’ उत्प्रेक्षा का वाचक है।
19. (क) — ‘मानो’ से संभावना।
20. (ग) — अभेद — चरण-कमल।
21. (क) — वाचक ‘सा’, धर्म ‘गंभीर’।
22. (ख) — ‘रूपी’ से अभेद — आसमान को आँगन मान लिया।
23. (ग) — दुबलेपन को बहुत बढ़ाकर कहा।
24. (ख) — चमत्कार शब्द के अनेक अर्थ में है।
25. (घ) — चमत्कार संभावना के अर्थ में है।
26. (ख) — हवा और कलियों को मनुष्य की तरह दिखाया।
27. (ख) — पट = वस्त्र और दरवाज़ा।
28. (क) — बारे और बढ़े के दो-दो अर्थ।
29. (ख) — दुविधा बनी हुई है।
30. (ख) — एड़ी को महावर समझ लिया।
31. (ग) — दुविधा बनाम पक्का भ्रम।
32. (ग) — पहली बात को दूसरी बात के उदाहरण से समझाया।
33. (ख) — ‘प’ वर्ण की आवृत्ति।
34. (घ) — ‘र’ वर्ण की आवृत्ति।
35. (ग) — चाँद को झाँकता दिखाया।
36. (क) — आँसुओं से नदी बनना असंभव।
37. (ग) — दुख को रात, सुख को सुबह मान लिया।
38. (घ) — संभावना बताने वाले जोड़ने वाले शब्द।
39. (ख) — ‘मानो’ से संभावना।
40. (क) — चरणों को ही कमल मान लेना — अभेद।
स्तर 3: कठिन (कक्षा 11–12, CTET/TET और प्रतियोगी परीक्षाएँ)
1. (ख) — काले रंग में डूबकर उजला होना — विरोध का आभास।
2. (क) — भौंरे-कली के बहाने राजा को संदेश।
3. (घ) — ‘घनश्याम’ का दूसरा अर्थ (बादल) लेकर उत्तर।
4. (ख) — कारण (पैर, कान, हाथ) के बिना कार्य।
5. (ग) — साड़ी और नारी में दुविधा।
6. (ग) — हिलना-डोलना दोनों में समान।
7. (ख) — सरिस = समान।
8. (ग) — जिसकी संभावना की गई — नीलम पर्वत पर धूप।
9. (घ) — उपमा अर्थालंकार है।
10. (क) — यमक शब्दालंकार है।
11. (ग) — ‘मानो’ — संभावना। बाकी क्रमशः उपमा, रूपक, संदेह।
12. (घ) — हनूमान की पूँछ वाला दोहा अतिशयोक्ति है।
13. (ख) — माँगने वाले को कपड़ा देता है / दरवाज़ा बंद कर देता है।
14. (ग) — दीपक जलाने पर / कुपुत्र बचपन में।
15. (ख) — दीपक बुझने पर / कुपुत्र बड़ा होने पर अँधेरा।
16. (क) — उपमेय को ही उपमान बना देना।
17. (ग) — मानो… वाली कल्पना।
18. (क) — बात को असंभव हद तक बढ़ाना।
19. (ख) — विभावना की परिभाषा।
20. (घ) — विरोध + आभास।
21. (घ) — एक बात, फिर उसका मिलता-जुलता उदाहरण।
22. (ख) — एड़ी की लालिमा को महावर समझकर रगड़ती रहती है।
23. (घ) — प्रसिद्ध प्रसंग — राजा को राज-काज की याद दिलाना।
24. (घ) — कली — नई, कम उम्र की रानी।
25. (घ) — अंतिम ‘पानी’ एक ही बार में तीन अर्थ दे रहा है — श्लेष; इसलिए A गलत, R सही।
26. (क) — R ही A का कारण है।
27. (घ) — शब्द दो बार, अर्थ अलग — यमक; A गलत, R सही।
28. (क) — R ही अतिशयोक्ति की पहचान है।
29. (ग) — वक्र (टेढ़ी) + उक्ति (बात)।
30. (घ) — उभय = दोनों।
31. (घ) — जिसकी बात हो रही है।
32. (ख) — लुप्त = छिपा हुआ।
33. (क) — चारों अंग — हरिपद, कमल, कोमल, से।
34. (क) — अंत्य = अंत का।
35. (ख) — कनक-कनक बनाम धीरे-धीरे।
36. (ग) — किरणों को जगाने वाली मनुष्य जैसी क्रिया करते दिखाया।
37. (ख) — बाकी तीनों उत्प्रेक्षा के वाचक हैं।
38. (ख) — ‘च’ वर्ण की आवृत्ति।
39. (क) — लहजे से उलटा अर्थ।
40. (घ) — रस्सी को पक्का साँप समझ लिया।
